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Affordable Housing : सरकार ने साल 2017 में किफायती मकानों की परिभाषा तय करते हुए सभी के लिए घर उपलब्‍ध कराने का लक्ष्‍य रखा था. रियल एस्‍टेट सेक्‍टर का कहना है कि अब इसकी लिमिट और परिभाषा दोनों में बदलाव होना जरूरी है. सरकार को किफायती मकानों की कीमत 45 लाख से बढ़ाकर 90 लाख कर देनी चाहिए.

बदलने वाली है किफायती मकान की परिभाषा, अब शहरों में कोई नहीं खरीद रहा ऐसा घरZoom

रियल एस्‍टेट सेक्‍टर ने किफायती मकानों की परिभाषा बदलने की जरूरत बताई है.

नई दिल्‍ली. सरकार ने सभी को घर दिलाने की योजना के तहत अफोर्डेबल हाउसिंग स्‍कीम शुरू की थी. इसमें होम लोन पर ब्‍याज सब्सिडी के साथ बिल्‍डर्स को भी जीएसटी में राहत दी जा रही है. लेकिन, पिछले कुछ साल में रियल एस्‍टेट सेक्‍टर में जिस तरह महंगाई ने सेंधमारी की है, ऐसा लग रहा है कि अब अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा बदलने का वक्‍त आ गया है. संपत्ति सलाहकार फर्म एनारॉक ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि शहरी इलाके में इस श्रेणी के मकानों की बिक्री लगातार गिरती जा रही है. बिल्‍डर्स ने भी इस कैटेगरी में नए प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च करने काफी कम कर दिए हैं. आखिर इस सेग्‍मेंट में किस तरह के मकान बनते हैं और उन पर क्‍या-क्‍या फायदा मिलता है, इसकी डिटेल में जानकारी लेते हैं.

एनारॉक ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि किफायती मकान की मौजूदा परिभाषा के तहत 40 लाख रुपये से कम कीमत वाली प्रॉपर्टी आती है. साल 2024 में इस कैटेगरी के मकानों की हिस्‍सेदारी कुल बिक्री में सिर्फ 18 फीसदी है, जबकि साल 2019 में यह आंकड़ा 38 फीसदी था. सिर्फ बिक्री ही नहीं, इस कैटेगरी की सप्‍लाई में भी काफी गिरावट दिखी है. साल 2019 में जहां कुल लॉन्‍च का 40 फीसदी इस कैटेगरी में था, वहीं 2024 में यह हिस्‍सेदारी महज 16 फीसदी रह गई. किफायती मकानों का बाजार तेजी से सिकुड़ता जा रहा है, क्‍योंकि इस सेग्‍मेंट में अब न तो ज्‍यादा बिक्री हो रही है और न ही नए प्रोजेक्‍ट की लॉन्चिंग.

50 लाख से कम के मकान नहीं बिक रहे
नाइट फ्रैंक ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि साल 2025 में देश के ज्‍यादातर शहरों में 50 लाख से कम कीमत वाले मकानों की बिक्री में 17 फीसदी की गिरावट आई है. इसी दौरान नए प्रोजेक्‍ट की लॉन्चिंग में 28 फीसदी की गिरावट भी आई है. डेवलपर्स का कहना है कि किफायती मकानों की मौजूदा परिभाषा सच्‍चाई से मेल नहीं खाती है. खासकर शहरी क्षेत्र में जमीन और निर्माण की बढ़ती लागत ने इस सेग्‍मेंट को पूरी तरह बदल दिया है.

क्‍या है किफायती मकान की परिभाषा
सरकारी नियमों के तहत 45 लाख से कम कीमत वाले मकान जिनका मेट्रो शहर में कार्पेट एरिया 60 वर्गमीटर से कम और नॉन मेट्रो शहर में 90 वर्गमीटर से कम हो, वही इस सेग्‍मेंट में आते हैं. रियल एस्‍टेट के जानकारों ने अब इस परिभाषा में व्‍यापक स्‍तर पर बदलाव की डिमांड की है. उनका कहना है कि अफोर्डेबल सेग्‍मेंट को शहरों, कमाई के स्‍तर और प्रॉपर्टी की कीमत के हिसाब से तय किया जाना चाहिए. रियल एस्‍टेट सेक्‍टर की सबसे बड़ी संस्‍था क्रेडाई ने भी कहा है कि साल 2017 में तय की गई 45 लाख की लिमिट को अब बढ़ाने का समय आ गया है, तभी इस योजना का फायदा आम जनता को बेहतर तरीके से मिलेगा.

अब कितनी होनी चाहिए किफायती घर की कीमत
क्रेडाई का कहना है कि 45 लाख की सीमा 9 साल पहले तय की गई थी, जिसे अब कम से कम बढ़ाकर 90 लाख किया जाना चाहिए. आज घरों की कीमत दोगुने से भी ज्‍यादा बढ़ चुकी है तो इस लिमिट को भी दोगुना किया जाना जरूरी है. क्रेडाई ने पिछले बजट में भी इसकी डिमांड की थी. क्रेडाई ने यह भी कहा कि इसी परिभाषा को कीमत के बजाय साइज के हिसाब से तय किया जाना ज्‍यादा बेहतर होगा. क्रेडाई के अनुसार, देश में एक औसत परिवार को 3बीएचके घर की जरूरत होती है. जाहिर है कि इसके लिए कम से कम 1,000 वर्गफुट जमीन होना जरूरी है.

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Pramod Kumar Tiwari

प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्‍वेस्‍टमेंट टिप्‍स, टैक्‍स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें

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