नौरादेही टाइगर रिजर्व में बाइसन (इंडियन गौर) को बसाने कि मांग की जा रही थी. लेकिन कई तरह की समस्याएं आने की वजह से यह योजना लेट होती जा रही थी. किंतु अब बायसन को बसाने की राह आसान हो गई है. क्योंकि टाइगर रिजर्व क्षेत्र में आने वाला डोंगरगढ़ क्षेत्र इसके लिए अनुकूल पाया गया है.
जो बायसन के लिए भी काफी सूटेबल है. बाइसन को बसाने के लिए सबसे अनिवार्य शर्त होती है विशाल घास के मैदान और पानी की निरंतर उपलब्धता. इन्हीं चीजों को देखकर देहरादून से आई एक्सपर्ट की टीम ने निरीक्षण करने के बाद इस क्षेत्र में बाइसन बसाने की सहमति दे दी है. नौरादेही में बाइसन लाकर भोजन श्रृंखला को मजबूत किया जाएगा, जिससे शाकाहारी जीवों की उपलब्धता बढ़ेगी. जल्द ही यहां के जंगलों में भारी भरकम इंडियन गौर (बाइसन) की धमक सुनाई देगी.डोंगरगढ़ की भौगोलिक स्थिति बाइसन के आवास व प्रजनन के लिए मुफीद मानी जा रही है. बाइसन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की श्रेणी-1 में रखा गया है.
निरंतर बाघों की संख्या में बढ़ोतरी देखी
टाइगर रिजर्व की डिप्टी डायरेक्टर रजनीश सिंह ने बताया कि यह पहल केवल पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि नेचुरल फूड चेन को मजबूत करने के लिए भी है. इस इलाके में निरंतर बाघों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है ऐसे में विशालकाय भारी भरकम शाकाहारी बाय सन जैसे वन्य जीव टाइगर के आहार के लिए भी रहेंगे इनकी वजह से जंगल का पारिस्थितिक संतुलन और भी बेहतर देखने को मिलेगा.
बाघ बाइसन का शिकार कर सकता
वर्तमान में कान्हा, पेंच और सतपुड़ा में बाइसन की अच्छी संख्या है. योजना के मुताबिक, इन्हीं नेशनल पार्क से बाइसन को ट्रांसलोकेट कर वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में लाया जाएगा. वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट के अनुसार जंगल में बाघ और इंडियन गौर (बाइसन) के बीच का संघर्ष प्रकृति के सबसे रोमांचक और चुनौतीपूर्ण मुकाबलों में से एक माना जाता है. बाघ बाइसन का शिकार कर सकता है, लेकिन यह उसके लिए बहुत जोखिम भरा होता है. कई बार बाघ बाइसन के शिकार के दौरान बुरी तरह घायल हो जाते हैं. बाघ बाइसन के शिकार का तभी जोखिम उठाता है, जब उसे छोटे शिकार (जैसे चीतल या सांभर) न मिल रहे हो.
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