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होमताजा खबरधर्ममलमास में 84 कोस परिक्रमा का क्या रहस्य है, जिसके के लिए पैदल जाते हैं लोग

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Braj 84 Kosh Yatra: मलमास में ब्रज की 84 कोस परिक्रमा के लिए दिल्ली-एनसीआर से उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब. 46 डिग्री तापमान भी नहीं डिगा पाया आस्था श्रद्धालु पैदल तय कर रहे 268 किलोमीटर लंबी यात्रा. मान्यता है कि पुरुषोत्तम मास में परिक्रमा करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल मिलता है.

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फरीदाबाद. मलमास में ब्रज की 84 कोस परिक्रमा का महत्व और बढ़ जाता है. यही वजह है कि इन दिनों फरीदाबाद, बल्लभगढ़ और पूरे दिल्ली एनसीआर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु ब्रज की ओर निकल पड़े हैं. कोई पैदल चलकर परिक्रमा कर रहा है तो कोई परिवार और साथियों के साथ भजन-कीर्तन करते हुए इस कठिन यात्रा को पूरा कर रहा है. तपती गर्मी और 46 डिग्री तापमान भी श्रद्धालुओं की आस्था को डिगा नहीं पा रहा. मान्यता है कि ब्रज की 84 कोस परिक्रमा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल मिलता है.

Local18 से बातचीत में बल्लभगढ़ के महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं 84 कोस में गिरिराज महाराज की परिक्रमा सबसे मुख्य मानी जाती है. मलमास को भगवान ने अपना नाम दिया है इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है. शास्त्रों में भगवान श्रीकृष्ण और श्री लक्ष्मी नारायण को पुरुषोत्तम कहा गया है. जो भक्त इस पुरुषोत्तम मास में परिक्रमा करता है उसे एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है. जैसे-जैसे श्रद्धालु आगे बढ़ता है वैसे-वैसे उसके पापों का नाश होता जाता है.

महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि ब्रज भूमि भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की लीला भूमि है. वेद-पुराणों में इसका विशेष महत्व बताया गया है. वाराह पुराण के अनुसार पृथ्वी पर मौजूद 66 अरब तीर्थ चातुर्मास के दौरान ब्रज में आकर निवास करते हैं. यही कारण है कि मलमास में 84 कोस परिक्रमा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है. जो श्रद्धालु गोवर्धन महाराज और गिरिराज जी की परिक्रमा करता है उसके जन्म-जन्मांतर के पाप समाप्त हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

करीब 268 किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा मथुरा के अलावा राजस्थान और हरियाणा के होडल क्षेत्र के गांवों से होकर गुजरती है. पूरे मार्ग में लगभग 25 पड़ाव स्थल बनाए गए हैं जहां श्रद्धालुओं के ठहरने और आराम करने की व्यवस्था रहती है. इस परिक्रमा मार्ग में करीब 1300 गांव, 1100 सरोवर, 36 वन-उपवन और कई पहाड़-पर्वत पड़ते हैं. श्रद्धालु उन स्थलों के भी दर्शन करते हैं जो भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के साक्षी माने जाते हैं.

रोजाना चालीस किमी पैदल चलते हैं

बल्लभगढ़ निवासी कालीचरण मित्तल बताते हैं कि मैंने इस बार 84 कोस की परिक्रमा सात दिन में पूरी की. मैंने होडल से परिक्रमा शुरू की थी. हर तीसरे साल मलमास में यह परिक्रमा लगाई जाती है और इसका बहुत बड़ा महत्व है. हम रोज करीब 40 किलोमीटर चलते थे. सुबह हो दोपहर हो या शाम बस चलते ही रहते थे. रात को करीब 10 बजे रुकते थे. कालीचरण मित्तल बताते हैं भीषण गर्मी पड़ रही हैं इसलिए मैंने पूरी परिक्रमा चप्पल पहनकर की. 46 डिग्री तापमान था सड़क पूरी गर्म रहती थी इसलिए प्लास्टिक की चप्पल पहन ली थी. रास्ते में कोई परेशानी नहीं हुई. मैंने ज्यादा भंडारा या पकवान नहीं खाए. एक टाइम खाना खा लिया जूस पी लिया उसी में यात्रा चलती रही.

76 वर्षीय कालीचरण मित्तल भी यात्रा पर निकले

76 वर्षीय कालीचरण मित्तल बताते हैं कि इस उम्र में इतनी लंबी परिक्रमा पूरी करना मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं है. अब उम्र ज्यादा हो गई है शायद आगे परिक्रमा न कर पाऊं. लेकिन इस बार बहुत अच्छे से यात्रा पूरी हो गई. रास्ते में गद्दे, पंखे, कूलर और एसी तक की व्यवस्था थी. रात को थोड़ा आराम करते थे और सुबह तीन-चार बजे फिर परिक्रमा शुरू कर देते थे. सुबह नहाने-धोने के बाद दोबारा यात्रा पर निकल पड़ते थे. पूरी परिक्रमा श्रद्धालुओं से भरी हुई थी.

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Vinod Kumar Katwal

Vinod Kumar Katwal, a Season journalist with 14 years of experience across print and digital media. I have worked with some of India’s most respected news organizations, including Dainik Bhaskar, IANS, Punjab K…और पढ़ें

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