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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानि एनजीटी की भोपाल बेंच ने हाल ही में मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा नदी में एक अनुष्ठान के दौरान 11,000 लीटर दूध बहाने और 210 साड़ियां विसर्जित करने के मामले पर कड़ा संज्ञान लिया है. एनजीटी ने इस मामले में केंद्री प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एक वैज्ञानिक रिपोर्ट मांगी है. तो आइए जानते हैं कि साइंस नदी में दूध डालने पर क्या कहती है, क्या इससे नदी प्रदूषित हो सकती है.

भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में नदियों को ‘मां’ और साक्षात चेतना मानकर पूजा जाता है. इसी श्रद्धा भाव से नदियों में दूध, दही, घी, तेल, फूल और वस्त्र व अन्य सामग्रियां अर्पित करते आए हैं. लेकिन मौजूदा हालात में जब हमारी नदियां प्रदूषण का शिकार हो रही हों तो ये देखना जरूरी है कि सजीव माने जाने वाली नदियों की सेहत के लिए क्या जरूरी और क्या नहीं.

विज्ञान और रिसर्च क्या कहती है?

विज्ञान के दृष्टिकोण से दूध एक “शुद्ध खाद्य पदार्थ” जरूर है लेकिन जब ये पानी में जाता है, तो अत्यधिक कंसंट्रेटेड जैविक प्रदूषक का काम करने लगता है. डेयरी विज्ञान और पर्यावरण इंजीनियरिंग के शोध बताते हैं कि दूध क बॉयोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानि बीओडी स्तर घरेलू सीवेज यानि नाली के गंदे पानी की तुलना में बहुत अधिक होता है यानि वो गंदे पानी की तुलना में पानी को ज्यादा प्रदूषित करता है.

1 लीटर दूध को पूरी तरह से डीकंपोज करने के लिए पानी को जितनी ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, वह हजारों लीटर सामान्य पानी की ऑक्सीजन को खत्म कर सकती है. पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, जब 11,000 लीटर जैसी भारी मात्रा में दूध नदी में जाता है, तो ये उस हिस्से के पानी में ऑक्सीजन के स्तर को करीब शून्य कर सकता है, जिससे जलीय जीवों और मछलियों की तत्काल मौत हो सकती है.

महीनों तक पानी पीने लायक नहीं रहता

पर्यावरणविदों का कहना है कि इसका असर केवल तुरंत नहीं दिखता. दूध बहने के बाद नदी के पारिस्थितिकी तंत्र यानि इकोसिस्टम को जो नुकसान होता है, उसका ‘सेकंड फेज’ ज्यादा खतरनाक होता है. पानी में दूध के सड़ने से जो बैक्टीरिया पनपते हैं, वे महीनों तक पानी को पीने और नहाने के लिए अनुपयुक्त बना देते हैं.

तेल और घी से नुकसान

धार्मिक तौर पर जब नदी तेल और घी अर्पित करते हैं तो ये पानी से हल्के होते हैं, इसलिए पानी की सतह पर एक अदृश्य या गाढ़ी परत बना लेते हैं. यह परत हवा की ऑक्सीजन को पानी में घुलने से रोक देती है. साथ ही, यह सूरज की रोशनी को पानी के नीचे तक जाने से रोकती है, जिससे पानी के अंदर मौजूद पौधे प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाते और पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है.

बैक्टीरिया और फंगस का बढ़ना

दूध और दही में मौजूद लैक्टोज और प्रोटीन पानी में जाकर हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस के लिए भोजन का काम करते हैं. इससे पानी में सड़न पैदा होती है, बदबू आती है और पानी पीने या नहाने योग्य नहीं रह जाता.

कपड़ों या साड़ियों का विसर्जन

दूध के साथ-साथ साड़ियों या अन्य कपड़ों का विसर्जन पानी में होने पर वो कई हानिकारक चीजें पानी में घोलते हैं, जिसमें टेक्सटाइल डाइस और माइक्रोप्लास्टिक्स होते हैं, टेक्सटाइल डाइस रासायनिक रंग होते हैं. ये तत्व नदी के तलवे में जमा होकर जलीय वनस्पतियों का दम घोंट देते हैं. तो इसका सीधा मतलब ये है कि धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से दूध नदी में बहाना पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं माना जाता, खासकर जब मात्रा बहुत ज्यादा हो.

वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इन सामग्रियों को नदी में डालने से पानी प्रदूषित होता है. विज्ञान की भाषा में इसे ऑर्गेनिक पोल्यूशन (जैविक प्रदूषण) कहा जाता है.

क्या हैं भारत के जल कानून

भारतीय जल अधिनियम, 1974 की धारा 24 पानी में प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण की बात करती है. ये कहती है कि किसी भी ऐसी प्रदूषणकारी या जैविक सामग्री को नदियों, धाराओं या कुओं में डालने पर सख्त रोक लगानी चाहिए, क्योंकि ये पानी की गुणवत्ता को खराब करते हैं.

एनजीटी ने यह भी पाया कि सीपीसीबी के पास वर्तमान में ऐसी कोई स्पष्ट और समर्पित गाइडलाइन नहीं है जो धार्मिक अनुष्ठानों में नदी में दूध चढ़ाने को नियमबद्ध या रेगुलेट करती हो. अदालत ने इसी कमी को पूरा करने के लिए दोनों बोर्डों से कहा है कि वे वैज्ञानिक डेटा जुटाएं और यदि जरूरी हो, तो भविष्य के लिए नए नियम या दिशा-निर्देश सुझाएं.

प्राचीन काल से अब तक कितना अंतर

प्राचीन काल में नदियों में जो सामग्री दूध समेत अर्पित की जाती थी, वो प्रतीकात्मक तौर पर होती थी और आबादी बहुत कम होने की वजह से ऐसा करने वाले भी बहुत कम होते हैं. ऐसा चढ़ाया जाने वाला दूध नदियों के लिए कभी समस्या नहीं बनता था लेकिन आज टैंकरों के माध्यम से हजारों लीटर दूध नदी में बहाना सीधे तौर पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है.

फिर पुराने समय में नदियां अपने पूरे वेग के साथ बहती थीं. तब यदि कोई प्रतीकात्मक रूप से दूध या तेल अर्पित करता था, तो नदी की अपनी ‘खुद को साफ करने की क्षमता’ उसे संभाल लेती थी. आज नदियों में पानी का बहाव कम हो गया है. अब हमारी आबादी करोड़ों में है. जब हजारों लीटर दूध या टन के हिसाब से सामग्री एक साथ नदियों में बहती है, तो नदियां उस बोझ को संभाल नहीं पातीं.

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