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Hyderabad Hindi News: भीषण गर्मी के बीच आदिवासी इलाकों में अड्डा पत्तियां लोगों के लिए राहत का बड़ा साधन बनकर उभरी हैं. प्राकृतिक गुणों से भरपूर ये पत्तियां तेज धूप और गर्म हवाओं से बचाव में उपयोगी मानी जाती हैं. गर्मी बढ़ने के साथ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के साप्ताहिक हाट-बाजारों में इनकी मांग तेजी से बढ़ गई है. कई आदिवासी परिवार जंगलों से अड्डा पत्तियां एकत्र कर बाजारों में बेच रहे हैं, जिससे उनकी आय में भी बढ़ोतरी हो रही है. स्थानीय लोग इन पत्तियों का उपयोग पारंपरिक तरीकों से शरीर को ठंडक पहुंचाने और धूप से बचाव के लिए करते हैं. बढ़ती मांग के कारण बाजारों में रौनक बढ़ गई है और खरीदारों की भीड़ देखने को मिल रही है.
हैदराबाद: तेलंगाना के नल्लामलाई वन क्षेत्र से सटे महबूबनगर नागरकुरनूल और नारायणपेट जिलों के आदिवासी गांवों में इन दिनों अड्डा पत्तियों को इकट्ठा करने और बेचने का काम जोरों पर है. भीषण गर्मी के इस मौसम में जब खेती-किसानी के काम कम हो जाते हैं तब जंगलों से मिलने वाली ये पत्तियां स्थानीय चेंचू और अन्य आदिवासी समुदायों के लिए आजीविका का सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरी हैं.
हर हफ्ते लगने वाले स्थानीय देहाती बाज़ारों में सुबह से ही इन हरी-भरी पत्तियों के बड़े-बड़े गट्ठर लेकर पहुंचने वाले आदिवासियों की कतारें देखी जा सकती हैं. कई परिवार तो सुदूर वन क्षेत्रों से 5 से 7 किलोमीटर का सफर पैदल तय करके अपने कंधों और सिर पर भारी-भरकम गट्ठर लादकर बाज़ार पहुंचते हैं. पारंपरिक शादियों, त्योहारों और होटलों में पत्तल और दोने बनाने के लिए इन पत्तों की भारी मांग रहती है जिसके कारण इस सीजन में बाज़ार पूरी तरह इन्हीं पत्तों से पटे नजर आ रहे हैं.
घर के सभी सदस्य मिलकर इन पत्तियों को छांटते
स्थानीय व्यापारियों के अनुसार इस समय मांग अच्छी होने के कारण पत्तों के एक बड़े गट्ठर की कीमत आकार और गुणवत्ता के आधार पर 500 से 700 रुपए तक मिल रही है. आदिवासी परिवारों का कहना है कि वे सुबह चार बजे ही घने जंगलों की ओर निकल जाते हैं ताकि कड़ी धूप होने से पहले ज्यादा से ज्यादा पत्तियां चुन सकें. इसके बाद घर के सभी सदस्य मिलकर इन पत्तियों को छांटते हैं और उनकी कट्टियां (गट्ठर) तैयार करते हैं.
अर्थव्यवस्था को हर साल नई ताकत देता
हालांकि आदिवासियों का कहना है कि जंगलों में बढ़ती गर्मी और जंगली जानवरों के खतरों के बीच यह काम बेहद जोखिम भरा होता है. इसके बावजूद यह सीजनल व्यापार उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाता है. स्थानीय लोगों ने मांग की है कि गिरिजन को-ऑपरेटिव कॉर्पोरेशन (GCC) को इन पत्तों की सीधी खरीद के लिए केंद्र बढ़ाने चाहिए ताकि उन्हें बिचौलियों के चंगुल से बचाया जा सके और उनकी मेहनत का पूरा हक मिल सके. बहरहाल, आधुनिक प्लास्टिक के दौर में भी पर्यावरण के अनुकूल इन पारंपरिक पत्तों का यह बाजार महबूबनगर के ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था को हर साल नई ताकत देता है.
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Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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