Image Slider

होमफोटोदेशतेल इंपोर्ट रोकना असंभव, मगर सोने से बचत, मान लें PM की अपील तो पार होगा संकट

Last Updated:

Sau Baat Ki Ek Baat By Kishore Ajwani: ईरान युद्ध से कच्चा तेल और डॉलर महंगे हुए हैं. इससे पूरी दुनिया प्रभावित है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. भारत पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं. इस बीच पीएम मोदी ने देशवासियों से अपील की है कि वे कम से कम एक साल तक सोना न खरीदें. इससे देश को ठीकठाक मात्रा में डॉलर की बचत होगी. इससे हमारा इंपोर्ट बिल कम होगा और देश एक बड़े संकट से निपटने में सफल हो जाएगा. आज इसी बात पर को समझते हैं ‘सौ बात की एक बात’ रिपोर्ट में. सभी फोटो- रायटर

Sau Baat Ki Ek Baat By Kishore Ajwani: सौ बात की एक बात ये कि प्रधानमंत्री ने जो कहा कि एक साल तक सोना ख़रीदना बंद कर दीजिए, उसके पीछे की सारी वजहें समझना ज़रूरी है. इतना तो मोटे तौर पर पब्लिक को समझ में आ रहा है कि ईरान युद्ध की वजह से कच्चा तेल महंगा होता जा रहा है और पता भी नहीं चल पा रहा कि युद्ध भी कितना लंबा और चलेगा. तो कच्चा तेल ख़रीदने के लिए ज़्यादा डॉलर ख़र्च करने पड़ेंगे. इसलिए देश को अपने डॉलर सोना ख़रीदने में इस वक़्त नहीं लगाने चाहिए. लेकिन कहानी सिर्फ़ इतनी नहीं है. उसके लिए पहले तो बेसिक सिद्धांत पर चलते हैं इकनॉमिकस के. कि किसी चीज़ का बाज़ार में दाम घटता या बढ़ता कैसे है. तो ये तो आप जानते ही हैं कि बेसिक सिद्धांत ये है कि अगर किसी चीज़ की मांग ज़्यादा हो जाए और सप्लाई उतनी ना हो तो उसके दाम बढ़ जाते हैं. क्योंकि ख़रीदने वाले ज़्यादा हो जाते हैं और माल उतना होता नहीं, तो वो ज़्यादा पैसे देने को तैयार हो जाते हैं. यानी किसी चीज़ की कमी हो जाए, शॉर्टेज हो जाए तो वो चीज़ महंगी हो जाती है. ये तो हो गया सिंपल सिद्धांत.

लेकिन बाहर से जो चीज़ ख़रीदनी होती है, विदेश से जो चीज़ ख़रीदनी होती है, उसमें सिद्धांत डबल हो जाता है. क्योंकि हम किसी से विदेश में कुछ ख़रीदते हैं तो वो रुपये में पेमेंट नहीं लेता. वो पेमेंट लेता है डॉलर में. तो उसको पेमेंट देने के लिए हमें डॉलर ख़रीदने पड़ते हैं. यानी एक चीज़ को लेने के लिए दो चीज़ें ख़रीदनी पड़ती हैं. डॉलर ख़रीदने पड़ते हैं और फिर उन डॉलरों से वो चीज़ ख़रीदनी पड़ती है. ये पॉयंट समझने की ज़रूरत है.

मतलब सोचिए अगर कच्चे तेल का एक बैरल अगर 80 डॉलर के रेट का है, और एक डॉलर 80 रुपये का है, तो एक बैरल तेल के लिए रुपये देने होंगे 80×80 यानी 6400 रुपये. अब अगर कच्चे तेल का रेट बढ़ कर हो जाए 100 डॉलर. यानी रेट बढ़ गया 20 डॉलर, यानी 80 पर 20 डॉलर की बढ़त हो गई तो 25% की बढ़त हो गई. और अगर डॉलर हो 80 रुपये का ही. तो कच्चा तेल मिलेगा 100×80 यानी 8000 रुपये. यानी 6400 से 1600 रुपये बढ़कर हो जाएगा 8000 रुपये. लेकिन जब कच्चा तेल 100 डॉलर का हो जाए और एक डॉलर भी 100 रुपये का हो जाए. तो एक बैरल कच्चा तेल मिलेगा 100×100 यानी 10,000 रुपये का. यानी 6400 से बढ़कर हो गया 10,000 रुपये का. मतलब 56.25% बढ़ जाएगा. यानी असल में तेल का दाम बढ़ा 25%, लेकिन क्योंकि डॉलर का दाम भी बढ़ गया तो रुपये में दाम बढ़ गया 56.25%, ये है कहानी का असली पेच.

Add News18 as
Preferred Source on Google

तो इस बढ़त को कंट्रोल करने के लिए क्या कर सकते हैं. तो एक तो ये है कच्चे तेल की मांग कम करें. हालांकि उसके लिए भी प्रधानमंत्री ने कहा कि पेट्रोल डीज़ल की बचत की जाए. लेकिन वो लंबा टारगेट है. काम-धंधे चलाने के लिए तो अभी कच्चा तेल तो चाहिए ही. गैस तो चाहिए ही. इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तरफ़ देश जाए उसके लिए ज़ोर तो लगाना होगा लेकिन वो एकदम से तो हो नहीं सकता. दूसरा जो फ़ैक्टर है वो ये कि डॉलर कम ख़रीदने पड़ें. क्योंकि जितनी ज़्यादा डॉलर की मांग बढ़ती है उतना डॉलर महंगा होता जाता है. लेकिन अगर कच्चा तेल ज़्यादा डॉलर में मिलेगा, और कच्चा तेल विदेश से ख़रीदना ही पड़ेगा, तो कच्चा तेल ख़रीदने के लिए डॉलर तो चाहिए ही होंगे.

यानी डॉलर की मांग अगर कम करनी है तो दूसरी चीज़ों से कम करनी होगी जहां डॉलर ख़र्च होते हैं. तो जो चीज़ें हम इंपोर्ट करते हैं उसमें सबसे ज़्यादा क्या इंपोर्ट करते हैं? पहले नंबर पर है कच्चा तेल और गैस. तो ये तो हमने देख लिया कि तुरंत तो इनको ख़रीदना कम नहीं कर सकते क्योंकि इससे तो बाक़ी काम धंधे रुक जाएंगे. दूसरे नंबर पर डॉलर ख़र्च होते हैं इलेक्ट्रॉनिक्स में. मतलब टीवी, फ़ोन वगैरह ही नहीं. वो तो चलो बाहर से कम मंगा लें, उनपर टैरिफ़ यानी इंपोर्ट ड्यूटी भी लगा दें, क्योंकि वो बाहर से क्यों लें, वो तो हम यहां भारत में ही बना लेंगे.

लेकिन जो इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने के लिए सेमिकंडक्टर चिप होती हैं, वो जो टीवी के अंदर, कंप्यूटर के अंदर, फ़ोन के अंदर, गाड़ियों के सिस्टम के अंदर, मतलब हर इलेक्ट्रॉनिक सामान में लगती है चिप, वो चिप देश में ज़्यादा नहीं बनती. और एडवांस्ड चिप तो बनती ही नहीं. ताइवान से ही आती है. तो वो भी देश मंगाने कम नहीं कर सकता, क्योंकि वो नहीं ख़रीदेंगे विदेश से तो देश में कोई सामान ही नहीं बना पाएंगे. यानी इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम के पुर्ज़े, ख़ासकर के चिप ख़रीदने के लिए भी डॉलर चाहिए ही चाहिए. तो वो मांग भी कम नहीं होने वाली.

तीसरे नंबर पर जो आइटम हम इंपोर्ट करते हैं वो है सोना. देश का लगभग 10% इंपोर्ट बिल जो आता है वो सोने का आता है. यानी हर 100 डॉलर जो देश ख़र्च करता है उसमें से 10 डॉलर वो सोना ख़रीदने में करता है. और युद्ध चल रहा है तो अनिश्चितता का माहौल है. अनिश्चितता में पूरी दुनिया के देशों के बैंक भी सोना ख़रीदने लग जाते हैं तो सोने के दाम पहले से ही बढ़े हुए हैं. ऊपर से डॉलर के दाम भी बढ़े जा रहे हैं रुपये के मुक़ाबले. तो ये डबल मार जो कच्चे तेल में पड़ रही है वो सोने में भी पड़ रही है. ये तीसरे नंबर का आइटम है जो हम इंपोर्ट करते हैं. कच्चा तेल मंगाना कम नहीं कर सकते क्योंकि उससे बाक़ी काम-धंधे जुड़े हैं और सबका रोज़गार जुड़ा है, इलेक्ट्रॉनिक्स मंगाना कम नहीं कर सकते क्योंकि उससे भी बाक़ी काम-धंधे जुड़े हैं और सबका रोज़गार जुड़ा है, लेकिन सोना तो ऐसा आइटम नहीं है कि अगर नहीं मंगाएंगे तो बाक़ी काम-धंधे बंद हो जाएंगे.

इसलिए पीएम कह रहे हैं कि ये मत ख़रीदो एक साल तक. लोग ख़रीदेंगे नहीं तो मांग नहीं होगी, मांग नहीं होगी तो सर्राफ़ा कारोबारी विदेश से सोना मंगाएंगे नहीं, विदेश से सोना मंगाएंगे नहीं तो विदेश से सोना मंगाने के लिए डॉलर नहीं ख़रीदने होंगे, जितने डॉलर कम ख़रीदेंगे उतनी डॉलर की मांग कम होगी, जितनी डॉलर की मांग कम होगी उतना वो कम महंगा होगा, डॉलर महंगा नहीं होगा तो कच्चा तेल के लिए भी रुपये कम देने होंगे. यानी पूरी चेन है ये. सोने का रेट बढ़ते जाने की वजह से हर साल और ज़्यादा डॉलर ख़रीदने पड़ रहे हैं सोना ख़रीदने के लिए. अभी तीन साल पहले तक यानी 2023-24 में हमने बाहर से सोना लिया 4500 करोड़ डॉलर का. फिर दो साल पहले 2024-25 में लिया 5800 करोड़ डॉलर का. और पिछले साल 2025-26 में लिया 7200 करोड़ डॉलर का. यानी 4500 से सीधा 5800 औऱ 5800 से सीधा 7200 करोड़ डॉलर. ये जो 7200 करोड़ डॉलर का सोना ख़रीदा हमने विदेश से पिछले साल, इसका मतलब 7200 करोड़ डॉलर भी ख़रीदने पड़े इस काम के लिए पिछले साल. अगर ये डॉलर नहीं ख़र्च करने पड़ते तो डॉलर की मांग तो थोड़ी कम होती. डॉलर की मांग थोड़ी कम होती तो डॉलर थोड़ा सस्ता होता. डॉलर थोड़ा सस्ता होता तो बाक़ी सब चीज़ों में फ़ायदा मिलता. ये पूरा लॉजिक है देश से अपील करने का कि सोने का मोह छोड़िए. एक साल के लिए भी छोड़ देंगे तो ये डॉलर नहीं ख़रीदने पड़ेंगे. हालांकि ये बात भी सही है कि ये करवा पाना उतना आसान नहीं. क्योंकि देश में सोना सिर्फ़ शादी में गिफ़्ट करने के लिए या गहनों का शौक पूरा करने के लिए ही नहीं ख़रीदा जाता. लोग सोना को एक निवेश की तरह देखते हैं.

पुरानी परंपरा रही है कि आड़े वक़्त में सोना काम आएगा. हालांकि ऐसा करने की नौबत भी कोई आने नहीं देना चाहता. कि ज़रूरत पड़ी तो घर के गहने बेच दिये या गिरवी रखवा दिए. ये करने की नौबत आजकल उतनी आती नहीं जितनी पहले के ज़माने में रही होगी. लेकिन परंपरा बन गई है तो बन गई है. इसलिए ये करवा पाना उतना आसान नहीं है. लेकिन ये मेसेज अगर प्रधानमंत्री के लेवल से जाए और अगर आधे लोग भी सोचें कि एक साल तक सोना नहीं लेते हैं तो 3500-4000 करोड़ डॉलर कम ख़रीदने पड़ सकते हैं. ये जो 95 रुपये के पास हो रहा है डॉलर, ये तो 100 रुपये पर जाने से रोका जाए. हालांकि सोना सिर्फ़ लोग ही नहीं ख़रीदते, रिज़र्व बैंक भी सोना ख़रीदता है. तो वो देश की आर्थिक रणनीति का हिस्सा है, वो वाला इंपोर्ट बिल जो भरना ही पड़ेगा. लेकिन लोग जो गहनों के लिए शादी-ब्याह के लिए लेते हैं वो एक साल के लिए रोक दें ये अपील की जा रही है. यहां पर 2012-2013 का साल याद करना ज़रूरी है.

उस साल क्या हुआ था कि सोने का इंपोर्ट हो गया था 5600 करोड़ डॉलर का. सोचिए अभी दो साल पहले 2024-25 में हमने सोने ख़रीदा 5800 करोड़ डॉलर का, और 2012-13 में भी उतना ही ख़रीद लिया था 5600 करोड़ डॉलर का. तो डॉलर ख़रीदने पड़ गए थे तब भी इतने सारे उस सोने को ख़रीदने के लिए. और डॉलर होता था 55 रुपये का, वो कुछ ही टाइम में हो गया था 68 रुपये का. 55 से 68 पर डॉलर पहुच गया था क्योंकि सोना ख़रीदने के लिए डॉलर ख़रीदने पड़ गए थे. तो ये हमारे सामने है कि सोना ख़रीदने के चक्कर में हम डॉलर को महंगा कर देते हैं. इसलिए अगर पीएम जो कह रहे हैं कि एक साल तक मत ख़रीदिए, तो वो अगर आधे भी लोग मान जाएं, क्योंकि रिज़र्व बैंक को तो अपने निवेश के लिए लेना पड़ेगा, तब भी काफ़ी डॉलर बच सकते हैं. आधे नहीं तो एक चौथाई भी, यानी हर चार में एक व्यक्ति भी इस एक साल के लिए ना ख़रीदने की ठाने तो उतने डॉलर कम ख़रीदने पड़ेंगे. क्योंकि ये डबल ख़रीद होती है, सोना ख़रीदने के लिए डॉलर ख़रीदने पड़ते है. सौ बात की एक बात.

———-

🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।

 

Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||