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Moradabad news: प्रोजेक्ट स्नेह उन जिंदगियों के लिए वरदान बन गया है. जिनकी दुनिया में सवेरा होना बंद हो गया था. यहां नेत्रहीन भाई-बहनों को सिर्फ अक्षर नहीं सिखाए जाते. उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया जाता है. इसी प्रोजेक्ट से जुड़ा एक चेहरा है जिसकी कहानी रुला भी देती है और हौसला भी देती है.

मुरादाबादः मुरादाबाद की गलियों में एक ऐसी रोशनी फैल रही है जिसे आंखों से नहीं, दिल से महसूस किया जाता है. प्रोजेक्ट स्नेह उन जिंदगियों के लिए वरदान बन गया है. जिनकी दुनिया में सवेरा होना बंद हो गया था. यहां नेत्रहीन भाई-बहनों को सिर्फ अक्षर नहीं सिखाए जाते. उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया जाता है. इसी प्रोजेक्ट से जुड़ा एक चेहरा है जिसकी कहानी रुला भी देती है और हौसला भी देती है.

एक ऐसा युवा शुरुआत में तो उसकी दुनिया में रोशनी थी लेकिन बाद मे उसके जीवन मे अंधेरा हो चुका था. आंखों की रोशनी छिनते ही उसके सारे सपने, सारी उम्मीदें बिखर गई थीं. वह पूरी तरह टूट चुका था. खुद को बोझ समझने लगा था. अपनों की आंखों में अपने लिए तरस देखकर उसका दिल बैठ जाता था.

ब्रेल लिपि सीख कंप्यूटर पर चला रहा उंगलियां

फिर जिंदगी में आईं शिखा गुप्ता उन्होंने सिर्फ हाथ नहीं थामा हौसला थमाया था. प्यार से समझाया कि अंधेरा आंखों में है हौसलों में नहीं है. धीरे-धीरे उसने ब्रेल लिपि सीखी, फिर कंप्यूटर की दुनिया में कदम रखा. आज उसकी उंगलियां की-बोर्ड पर ऐसे दौड़ती हैं कि देखने वाला दंग रह जाए. उसकी टाइपिंग की स्पीड सुनकर कोई मान ही नहीं सकता कि वह इस दुनिया को देख नहीं सकता. आज वह युवा आत्मनिर्भर है अपने दम पर कमाता है. और दिव्यांग होने के बाद भी अपने परिवार का सहारा बन गया है और अच्छे से पालन पोषण कर रहा है.

2015 में गई आंखों की रोशनी

शिवम ने बताया कि मुझे ग्लूकोमा की बीमारी थी. 2015 में मुझे ब्लाइंडनेस आ गई थी. उसके बाद लगातार 4 साल तक मैं घर रहा था. इन चार साल के बीच में मेरी पढ़ाई पूरी तरह से छूट गई थी. उसके बाद मैं प्रोजेक्ट स्नेह से 2020 में जुड़ा था. उसमें मुझे वोकेशनल और ब्रेल मोबिलिटी आदि सिखाई गई थीं. फिर मेरे मन मैं एक उमंग जाग गई थी. क्योंकि मुझे पहले से ही पढ़ने की लगन थी. हाईस्कूल में 80% अंक के साथ पास आउट किया था.

उसके बाद मेने इंटरमीडिएट किया था. जब मैं फर्स्ट ईयर में था. तब कंप्यूटर कोर्स और एंड्रॉयड चीजों को चलाने का कोर्स करने के लिए मैं देहरादून चला गया था. वहां मेने स्मार्टफोन और कंप्यूटर एक्सेस करना सीखा था फिर इंटर किया. उसके बाद ग्रैजुएशन चल रहा है. इसके साथ-साथ में आत्मनिर्भर भी बन गया हूं. और मुझे समाजसेवी शिखा गुप्ता द्वारा आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया गया है और तरह-तरह के काम सिखाए गए हैं. आज प्रोजेक्ट स्नेह में ही में कार्यरत हूं और यहीं पर अच्छे पैसे भी कमा रहा हूं और अपने परिवार का पालन पोषण भी अच्छे से कर रहा हूं.

आंख नहीं  फिर भी कर रहे नौकरी

प्रोजेक्ट स्नेह की फाउंडर शिखा गुप्ता ने बताया कि हमारे पास एक स्नेह वीर है. जिनका नाम शुभम है और वह संभल जिले के रहने वाले हैं. उसका इलाज चलता था. उसकी आंखों में समस्या थी. धीरे-धीरे वह पूरी तरह से दृष्टिबाधित हो गया था. इसके साथ ही वह अपने घर का अकेला लड़का है. दो बहनें है, उनका परिवार बहुत दुखी रहता था. उसे समझ नहीं आता था कि वह किस तरह से आगे बढ़ सकता है. साथ ही कैसे उनका जीवन चलेगा. फिर हमने काउंसलिंग कर उन्हें मोटिवेट किया कि अभी जीवन समाप्त नहीं हुआ है. जीवन बहुत लंबा है और इसी जीवन में बहुत कुछ कर सकते हैं.

फिर हमने उसे अपने साथ जोड़कर उसे पढ़ाया लिखाया कंप्यूटर का प्रशिक्षण दिलाया और इतना आत्मनिर्भर बनाया कि वह कहीं भी आसानी से नौकरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर सकता है. फिर हमने उसे अपने सीएल गुप्ता नेत्र संस्थान में टीचर के तौर पर हायर कर लिया है. आज वह अच्छे पैसे कमा रहा है. उसका परिवार काफी खुश है और अपने परिवार का अच्छे से पालन पोषण कर रहा हैऔर आज अपने पैरों पर खड़ा हो गया है.

About the Author

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें

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