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दक्षिण कोलकाता के पद्दपुकुर रोड पर 140 साल पुरानी ‘बलराम मलिक एंड राधारमण मलिक’ मिठाई दुकान में एक ट्रे में सभी पार्टियों के सिंबल वाले पेड़े सजे हैं- ‘मिठास सबके लिए’, लेकिन जिस भवानीपुर में यह दुकान है, वहां सियासत में खटास साफ दिखती है। बंगाल की सबसे चर्चित सीट पर सीएम ममता बनर्जी ‘दीदी’ के सामने भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ‘दादा’ मैदान में हैं। यहां 15 साल की सत्ता बचाने उतरी ममता के सामने नंदीग्राम में उन्हें हरा चुके शुभेंदु वही दोहराने की कोशिश में हैं। 29 अप्रैल को वोटिंग है। यह सीट तृणमूल के लिए प्रतिष्ठा और भाजपा के लिए मनोवैज्ञानिक लड़ाई बन गई है। मिलीजुली आबादी इस सीट को और दिलचस्प बनाती है। यहां 42% बंगाली हिंदू, 34% गैर-बंगाली हिंदू और 24% मुस्लिम आबादी के साथ गुजराती, पंजाबी-सिख, मारवाड़ी-जैन और प्रवासी यहां रहते हैं। ‘मिनी इंडिया’ कहे जाने वाले इस इलाके में एक व्यापारी कहते हैं, ‘हम यहां दो पीढ़ी से व्यापार कर रहे हैं, पर ऐसा चुनाव कभी नहीं देखा। पहले सब खुलकर ‘ये पार्टी’ या ‘वो पार्टी’ बोलते थे, इस बार कोई बोलने को तैयार नहीं।’ ममता का कनेक्ट बनाम भाजपा की माइक्रो मैपिंग ममता पारिवारिक जुड़ाव और हाई-विजिबिलिटी प्रचार के आधार पर चुनाव लड़ी रही हैं, जबकि भाजपा शुभेंदु की आक्रामक छवि, हिंदुत्व और बूथ स्तर की माइक्रो-मैपिंग से मुकाबला तेज कर रही है।दो दिन पहले हुए रोड शो में ममता के भाई बाबुन बनर्जी और परिवार के कई सदस्य साथ निकले। दूसरी ओर, भाजपा के सुवेंदु अधिकारी की आक्रामक छवि और हिंदुत्व के मुद्दे पर प्रचार को धार दे रही है। पार्टी ने यहां ‘बूथ स्तर की मैपिंग’ की है और बाहरी राज्यों के बड़े नेताओं को उतार दिया है। पूर्व राज्यपाल और भाजपा नेता तथागत रॉय कहते हैं, ‘बंगाल को हिंदू बाहुल्य बनाए रखना है तो ममता को हटाना जरूरी है।’ भवानीपुर में चुनावी माहौल की 3 तस्वीरें… कालीघाट मंदिर के पास पैतृक घर में ही सीएम आवास कालीघाट मंदिर के पास 100 मीटर दूरी पर ममता का पैतृक घर ही उनका निवास है। इस गली के दोनों सिरों पर हाई सक्योरिटी है। शनिवार रात प्रचार से लौटते समय उन्होंने ‘जय बांग्ला’ के नारों के बीच रुककर समर्थकों से मुलाकात की। सुरक्षा पर ‘दीदी’ से नाराजगी, पर योजनाओं में ‘ममता’ भारी भवानीपुर में जनमत बंटा है। यहां हरीश मुखर्जी रोड पर रहने वाली सूमोना नाथ कहती हैं, ‘आरजी कर जैसी घटना के बाद महिला सुरक्षा बड़ा सवाल है। 15 साल बहुत होते हैं, अब हमें बदलाव चाहिए।’ इसके उलट, कालीघाट मंदिर के पास पटुआपाड़ा (कुम्हारों की बस्ती) में एक बुजुर्ग कहते हैं, ‘ममता हमारे घर की बेटी हैं।’’ उनके घर से निकली महिला ने बताया- उसे लक्ष्मी भंडार और बेटी को कन्याश्री योजना के पैसे मलते हैं। दूसरी ओर, जेन-जी (युवा मतदाता) कहते हैं, ‘हमें शिक्षा और रोजगार चाहिए। जो दोनों देगा, उसे वोट देंगे।’ कालीघाट मंदिर के एक पुजारी ने कहा, ‘यहां दीदी को कोई हरा नहीं सकता।’ यानी मुकाबला एंटी-इनकंबेंसी और वेलफेयर सपोर्ट के बीच फंसा है।

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