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मऊ जिले के कोठिया धाम में स्थित यह अनोखा मंदिर किसी देवी-देवता का नहीं, बल्कि तपस्वी ब्रह्मर्षि रामकृष्ण को समर्पित है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. बाबा के चमत्कारों, भविष्यवाणियों और आस्था से जुड़ी कहानियां इस स्थान को खास बनाती हैं, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

उत्तर प्रदेश के लगभग हर जनपद में एक न एक चमत्कारी मंदिर मिलता है. ऐसा ही एक मंदिर पूर्वांचल के मऊ जनपद मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर कोठिया ग्राम सभा में स्थित कोठिया धाम है. यहां बना मंदिर किसी देवी-देवता का नहीं, बल्कि एक तपस्वी व्यक्ति को समर्पित है. मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मन्नतें पूरी होती हैं और इस स्थान से जुड़ी कई अद्भुत कथाएं प्रचलित हैं.

बाबा ब्रह्मर्षि रामकृष्ण थे तपस्वी, जिनकी आज भी होती है पूजा

लोकल 18 से बातचीत में यहां के पुजारी ग्रिजेश तिवारी बताते हैं कि यह मंदिर ब्रह्मर्षि श्री रामकृष्ण जी का है. वे इतने महान तपस्वी थे कि उन्होंने अपनी मृत्यु का दिन, समय और अवस्था पहले ही बता दी थी. लोगों के अनुसार, उनकी मृत्यु के समय वही दृश्य साकार हुआ, जैसा उन्होंने बताया था. कहा जाता है कि उस समय आकाश लाल हो गया था और वे दिव्य रूप से ऊपर चले गए. जिस स्थान पर वे तपस्या करते थे, वहीं आज उनका मंदिर बना हुआ है.

गुफा से दिन में 12 बजे निकलते थे बाहर

लोग उन्हें केवल दिन में कुछ समय के लिए ही देख पाते थे, क्योंकि वे भूमिगत स्थान (भुईधरा) में बैठकर तपस्या करते थे. वे प्रतिदिन दोपहर 12 बजे कुछ समय के लिए बाहर आते और फिर वापस भीतर चले जाते थे. उनकी तपस्या इतनी प्रभावशाली मानी जाती थी कि जो भी वे कहते, वह सच हो जाता था. आज भी माना जाता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. इस स्थान पर विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लोग भी आते हैं और कई लोगों को सफलता मिलने की बात कही जाती है.

पानी में पैर का अंगूठा छूते ही खत्म हो गई थी बाढ़

पंडित ग्रिजेश तिवारी के अनुसार, बाबा के चमत्कारों में एक घटना काफी प्रसिद्ध है. एक बार क्षेत्र में भयंकर बाढ़ आई, जिससे आसपास के गांवों के लोग परेशान हो गए. वे मदद के लिए बाबा के पास पहुंचे. बाबा ने उन्हें आश्वासन दिया कि अगले दिन बाढ़ समाप्त हो जाएगी. अगले दिन जब बाबा गुफा से बाहर आए, तो उन्होंने बाढ़ के पानी को अपने पैर के अंगूठे से छुआ. मान्यता है कि इसके बाद पानी का स्तर धीरे-धीरे घटने लगा और कुछ ही समय में बाढ़ समाप्त हो गई.

इटोरा चौबेपुर के थे मूल निवासी

हालांकि बाबा मूल रूप से इस क्षेत्र के निवासी नहीं थे. वे इटोरा चौबेपुर के रहने वाले थे. परिवार से संन्यास लेकर वे इस स्थान पर आए और यहीं वन क्षेत्र में तपस्या शुरू की. अपनी साधना के बल पर वे इतने प्रसिद्ध हुए कि उन्होंने अपनी मृत्यु का समय तक पहले ही बता दिया था. आज उसी स्थान पर उनकी समाधि और प्रतिमा स्थापित है, जहां श्रद्धालु दूर-दूर से आकर पूजा-अर्चना करते हैं.

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Vivek Kumar

विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें

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