Basti News: बस्ती जिले के कलवारी क्षेत्र से शिक्षा व्यवस्था को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है. यहां के एक सरकारी सहायता प्राप्त इंटर कॉलेज में पिछले 67 सालों से बेटियों को दाखिला नहीं दिया जा रहा है. स्कूल प्रशासन इसके पीछे महिला शौचालय न होने का तर्क दे रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह पास ही में स्थित एक निजी स्कूल को फायदा पहुंचाने की एक साजिश है. अपनी बेटी का भविष्य बचाने के लिए एक मजबूर पिता जब साइकिल पर टॉयलेट सीट लेकर स्कूल पहुंचा, तो भी जिम्मेदारों का दिल नहीं पसीजा. प्रशासन ने अब इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विद्यालय के खिलाफ जांच शुरू कर दी है.
साइकिल में टॉयलेट सीट लेकर बेटी का एडमिशन करवाने स्कूल पहुंचा पिता
यहां कलवारी क्षेत्र के झिनकू लाल त्रिवेणी राम चौधरी इंटर कॉलेज में पिछले सात दशकों से गरीब बेटियों को शिक्षा के अधिकार से महरूम रखा जा रहा है. हैरान करने वाली बात यह है कि इस अघोषित पाबंदी की वजह किसी सरकारी आदेश में नहीं, बल्कि स्कूल प्रबंधन के एक अजीबोगरीब बहाने में छिपी है.
सोशल मीडिया पर इस वक्त एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर कोई भी सोचने को मजबूर हो जाए. यहां एक पिता अपनी बेटी को पढ़ाने की जिद लेकर स्कूल पहुंचा, लेकिन जब उसे बताया गया कि स्कूल में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है, तो वह हार नहीं माना. वह अपनी साइकिल पर नई टॉयलेट सीट बांधकर स्कूल ले आया और प्रबंधन से कहा कि इसे लगवा लें लेकिन उसकी बेटी को स्कूल में नाम लिखाने दें. इतनी मिन्नतें करने के बाद भी स्कूल के जिम्मेदारों का दिल नहीं पसीजा और उस पिता को मायूस होकर लौटना पड़ा.
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शौचालय की कमी या प्राइवेट स्कूल चमकाने का धंधा?
स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि शौचालय की कमी की बात महज एक बहाना है, जबकि पर्दे के पीछे का सच कुछ और ही है. दावों के मुताबिक स्कूल के प्रबंधक का ठीक बगल में अपना एक निजी विद्यालय है, जिसे चलाने के लिए साजिश रची गई है. सरकारी इंटर कॉलेज में बेटियों के प्रवेश पर अघोषित पाबंदी लगाकर उन्हें मजबूर किया जाता है कि वे प्रबंधक के प्राइवेट स्कूल में मोटी फीस देकर दाखिला लें. इस मुनाफे के खेल का सबसे बुरा असर उन गरीब बेटियों पर पड़ रहा है जो निजी स्कूल का भारी खर्च नहीं उठा सकतीं और उन्हें मजबूरन अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है.
कागजों में को-एड, हकीकत कुछ और
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, इस संस्थान को साल 1957 में ही छात्र-छात्रा दोनों के लिए ही मान्यता मिल गई थी. यानी कानूनी तौर पर यहां लड़कियों को पढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि पिछले 67 सालों से यहां बेटियों के लिए दरवाजे बंद हैं. स्कूल के प्रिंसिपल आज्ञाराम चौधरी का कहना है कि बाउंड्रीवॉल और शौचालय न होने के कारण सुरक्षा के लिहाज से दाखिले नहीं दिए जा रहे हैं. हालांकि, उनका दावा है कि साल 2021-22 में कुछ लड़कियों ने प्रवेश लिया था, लेकिन उसके बाद कोई नहीं आया.
घटना के बाद प्रशासन सख्त
मामला सुर्खियां बनने के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आ गया है. बस्ती के डीआईओएस संजय सिंह ने इस मामले को बेहद गंभीर मामला बताया है. उन्होंने स्कूल को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है. इतना ही नहीं उन्होंने साफ कहा है कि यदि ये बात सच साबित हुई, तो कॉलेज की मान्यता रद्द की जाएगी और जरूरी कार्रवाई की जाएगी.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
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