कहां है शाकुम्भरी शक्तिपीठ?
सहारनपुर में मां शाकुम्भरी देवी मंदिर स्थित है. यहां मां सती का शीश गिरा था, वह अन्न की देवी अन्नपूर्णा के रूप में विराजमान हैं और भक्तों का कल्याण करती हैं. यह मंदिर शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बेहट तहसील के जसमौर गांव के निकट स्थित है. यहां पहुंचने के लिए सहारनपुर रेलवे स्टेशन या बेहट बस स्टैंड से बस या निजी वाहन से जा सकते हैं. हवाई यात्रा के लिए नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून या दिल्ली है.
शाकुम्भरी देवी की कृपा से मिलता है धन-धान्य
मान्यताओं के अनुसार, मां ने कठिन काल में सृष्टि का पालन कर जगत को जीवन दिया था, इसलिए यहां आने वाला हर भक्त पूर्ण विश्वास और गहरी श्रद्धा के साथ मां के चरणों में नमन करता है. प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से घिरा यह धाम मन को शांति, आस्था और नई शक्ति से भर देता है.
मान्यता है कि शाकुम्भरी देवी की उपासना करने वाले घरों में हमेशा अन्न और शाक से भंडार भरा रहता है. यह धाम अन्नपूर्णा के रूप में भी पूजा जाता है. मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है. भक्तों का विश्वास है कि मां शाकुम्भरी स्वयं उनकी रक्षा करती हैं और पूर्ण श्रद्धा से दर्शन करने वाले की मनोकामनाएं पूरी करती हैं.
शाकुम्भरी देवी की कथा
धार्मिक मान्यता है कि शाकुम्भरी देवी का नाम दुर्गमासुर वध से जुड़ा है. जब दुर्गमासुर ने वेदों पर कब्जा कर अकाल फैलाया, तो देवी ने अपने नेत्रों से जल बहाया. उस जल से धाराएं निकलीं और वनस्पतियां हरी-भरी हो गईं. सौ नेत्रों से दया की दृष्टि डालने के कारण उन्हें शताक्षी कहा गया.
अकाल में उन्होंने अपने शरीर से शाक-सब्जियां उत्पन्न कर पृथ्वी का पालन किया, इसलिए नाम शाकुम्भरी पड़ा. मंदिर में मुख्य प्रतिमा के दाईं ओर भीमा और भ्रामरी तथा बाईं ओर शताक्षी या शीतला देवी विराजमान हैं.
मां ने की देवताओं की सहायता
धार्मिक कथा के अनुसार, जब दानव शुंभ-निशुंभ, महिषासुर और रक्तबीज ने देवताओं पर आक्रमण किया, तो देवता छिपते-छिपते शिवालिक पहाड़ियों पर पहुंच गए. नारद मुनि के सुझाव पर देवताओं ने मां से सहायता मांगी. इसी दौरान भूरादेव अपने पांच साथियों के साथ मां की शरण में आए और युद्ध में शामिल होने की आज्ञा मांगी.
मां काली ने रक्तबीज का सिर काटकर पिया रक्त
मां ने वरदान दिया और युद्ध शुरू हुआ. रक्तबीज नामक राक्षस का खास गुण था कि उसकी खून की एक बूंद जमीन पर गिरने से नया राक्षस पैदा हो जाता था. मां ने विकराल रूप धारण किया और चक्र से राक्षसों का संहार किया.
मां काली ने खप्पर से रक्तबीज का सिर काटकर उसका रक्त पी लिया, जिससे नए राक्षस नहीं बन सके. युद्ध के अंत में शुंभ-निशुंभ ने भूरादेव पर बाण चलाए और वे गिर पड़े. युद्ध समाप्त होने पर मां ने भूरादेव को जीवित किया और वरदान मांगने को कहा.
भूरादेव के दर्शन करने पर पूरी होती है यात्रा
भूरादेव ने मां के चरणों की सेवा मांगी. मां ने वरदान दिया कि जो भी मेरे दर्शन करेगा, उसे पहले भूरादेव के दर्शन करने होंगे, तभी यात्रा पूरी होगी, इसलिए मंदिर में सबसे पहले भूरादेव के दर्शन होते हैं.
भूरादेव का मंदिर मुख्य मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर है. मंदिर के पास बरसाती नदी का रास्ता है, जो सूखा रहता है और केवल बरसात में पानी से भरता है. नवरात्रि के दौरान यहां विशाल मेला लगता है. श्रद्धालु दर्शन के लिए बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं.
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