नंबर गेम में पिछड़ा महागठबंधन
विपक्षी महागठबंधन को यहां अपने ही विधायकों की गैरहाजिरी से बड़ा झटका लगा. कांग्रेस के तीन और राष्ट्रीय जनता दल के एक विधायक वोटिंग के समय मौजूद नहीं थे. राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए 41 वोट जरूरी थे. विपक्ष के पास शुरुआत में 35 विधायक थे और उन्हें उम्मीद थी कि कुछ अन्य दलों के समर्थन से यह संख्या पूरी हो जाएगी. लेकिन चार विधायकों की गैरहाजिरी के कारण विपक्ष की रणनीति पूरी तरह बिगड़ गई. हालांकि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के पांच और बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक ने विपक्षी उम्मीदवार का समर्थन किया, लेकिन इसके बावजूद संख्या पूरी नहीं हो सकी.
हरियाणा में वोट गोपनीयता पर विवाद
आखिरकार नतीजे आए तो भाजपा के संजय भाटिया और कांग्रेस के करमवीर सिंह बौद्ध दोनों राज्यसभा के लिए चुने गए. हालांकि चुनाव के बाद भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहा. भाजपा का दावा है कि कांग्रेस के पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की. वहीं अधिकारियों के अनुसार पांच वोट अमान्य घोषित किए गए, जिनमें चार कांग्रेस और एक भाजपा विधायक का वोट शामिल था.
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने परिणाम के बाद कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं था, इसलिए उन्हें चुनाव से पहले दूसरे राज्यों में ले जाकर रखा गया.
ओडिशा में क्रॉस वोटिंग से बदले समीकरण
ओडिशा में चार सीटों के लिए रविवार को हुए मतदान में क्रॉस वोटिंग ने बड़ा असर डाला. अंतिम नतीजों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के राज्य अध्यक्ष मनमोहन सामल और सुजीत कुमार चुनाव जीत गए. वहीं बीजू जनता दल के उम्मीदवार संतृप्त मिश्रा को एक सीट मिली. चौथी सीट भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप रे के खाते में गई.
यहां सबसे बड़ी चर्चा क्रॉस वोटिंग की रही. विधानसभा में भाजपा और उसके समर्थकों की कुल संख्या 82 थी, लेकिन भाजपा उम्मीदवारों को 93 प्रथम वरीयता वोट मिले. यानी विपक्षी दलों के कम से कम 11 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर वोट किया. बताया गया कि इनमें बीजू जनता दल के आठ और कांग्रेस के तीन विधायक शामिल थे. इस वजह से चुनाव का परिणाम पूरी तरह भाजपा के पक्ष में झुक गया.
महाराष्ट्र की सातों सीटों पर निर्विरोध फैसला
महाराष्ट्र में राज्यसभा की सातों सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए. सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के छह उम्मीदवार बिना मुकाबले राज्यसभा पहुंच गए. इनमें भारतीय जनता पार्टी के विनोद तावड़े , रामराव बाड़कुटे और माया इवानेते शामिल हैं. इसके अलावा रिपब्लिकन पार्टी के रामदास आठवले, शिवसेना की ज्योति वाघमारे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पार्थ पवार भी निर्विरोध चुने गए. वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार भी बिना मुकाबले राज्यसभा पहुंचे.
तमिलनाडु में भी सभी छह उम्मीदवार निर्विरोध जीते
तमिलनाडु में राज्यसभा की छह सीटों पर भी सभी उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए. इनमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के तिरुचि शिवा और जे रविंद्रन, कांग्रेस के एम तिलक, देसिया मुरपोक्कु द्रविड़ कड़गम के एलके सुदीश , अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के एम थंबीदुबई और पट्टाली मक्कल कच्ची के अंबुमनी रामदौस शामिल हैं.
अन्य 4 राज्यों का हाल
इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के अनुराग शर्मा, तेलंगाना में कांग्रेस के अभिषेक मनुसिंघवी और वेम नरेंद्र रेड्डी, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की फूलो देवी नेताम और भाजपा की लक्ष्मी वर्मा निर्विरोध चुनी गईं. वहीं असम में भाजपा के जोगेन मोहन, तेराश गोवाला और सहयोगी दल के प्रमोद बोरो राज्यसभा जाएंगे.
विपक्ष के लिए क्या संदेश?
इन चुनावों के नतीजों ने साफ कर दिया कि कई राज्यों में विपक्ष अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल नहीं रहा. कहीं क्रॉस वोटिंग हुई तो कहीं विधायक वोटिंग से ही गायब रहे. इसका फायदा सत्ता पक्ष को मिला. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन राज्यों में विपक्ष की स्थिति मजबूत लग रही थी, वहां भी छोटी-छोटी चूक ने परिणाम बदल दिए.
कुल मिलाकर राज्यसभा चुनाव के इन नतीजों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में विपक्ष को अपनी रणनीति और संगठन दोनों को और मजबूत करना होगा, वरना ऐसे चुनावों में सत्ता पक्ष को बढ़त मिलती रहेगी.
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