बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए हो रहे चुनाव में छह उम्मीदवार मैदान में हैं, जिसके कारण मुकाबला दिलचस्प बन गया है. आम तौर पर संख्या बल के आधार पर राज्यसभा चुनाव आसान माने जाते हैं, लेकिन इस बार अतिरिक्त उम्मीदवार उतरने से पांचवीं सीट पर सियासी गणित उलझ गया है. यही वजह है कि एनडीए और महागठबंधन दोनों खेमों की नजर हर विधायक के वोट पर टिकी हुई है.
बिहार राज्यसभा चुनाव: संख्या बल एनडीए के साथ, फिर भी पांचवीं सीट पर फंसा खेल
कौन-कौन उम्मीदवार किस-किस दल से मैदान में हैं?
बिहार राज्यसभा चुनाव 2026 में 5 सीटों के लिए हो रहा मुकाबला इसलिए दिलचस्प है क्योंकि 12 साल में पहली बार निर्विरोध चयन के बजाय मतदान की नौबत आई है, जिसमें 5 सीटों के लिए 6 उम्मीदवार मैदान में हैं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने मुख्यमंत्री नितीश कुमार (JDU), भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, पूर्व केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर (JDU), उपेंद्र कुशवाहा (RLM) और शिवेश कुमार (BJP) के रूप में 5 उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि महागठबंधन (RJD) की ओर से अमरेंद्र धारी सिंह एकमात्र उम्मीदवार हैं. मुकाबला मुख्य रूप से 5वीं सीट के लिए फंसा हुआ है, जहां जीत के लिए जरूरी 41 वोटों के गणित में NDA के पास अपने 202 विधायकों के आधार पर 3 वोटों की कमी दिख रही है, जिससे क्रॉस-वोटिंग और सियासी जोड़-तोड़ की संभावनाएं बढ़ गई हैं.
विधानसभा के संख्या बल से मजबूत स्थिति में एनडीए
राज्यसभा के इन चुनावों में विधायक मतदान करते हैं और परिणाम पूरी तरह संख्या बल पर निर्भर करता है. बिहार विधानसभा में कुल 243 विधायक हैं और एक उम्मीदवार को जीत के लिए लगभग 41 वोटों की जरूरत होती है. 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में एनडीए गठबंधन बेहद मजबूत स्थिति में है. विधानसभा की 243 सीटों में से करीब 202 सीटें एनडीए के पास हैं. इसमें भाजपा, जदयू, लोजपा और सहयोगी दल शामिल हैं. इस वजह से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चार सीटों पर एनडीए की जीत लगभग तय मानी जा रही है. इसी आधार पर एनडीए ने राज्यसभा चुनाव में अपनी रणनीति तैयार की है. पेच पांचवीं सीट पर फंसा हुआ क्योंकि महागठबंधन का अपना उम्मीदवार उतारने के बाद अब पांच सीटों पर छह प्रत्याशी हैं.
महागठबंधन की नजर सहयोगी दलों के समर्थन पर
दूसरी ओर महागठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती संख्या बल की है. राजद, कांग्रेस और वाम दलों को मिलाकर विधानसभा में उनकी संख्या काफी कम है. इसलिए महागठबंधन सहयोगी और छोटे दलों के समर्थन के सहारे मुकाबले को दिलचस्प बनाने की कोशिश कर रहा है. राजद नेता तेजस्वी यादव लगातार अपने विधायकों के संपर्क में रहे हैं और रणनीति बनाते रहे हैं. महागठबंधन के नेताओं का दावा है कि कुछ छोटे दलों का समर्थन मिलने से मुकाबला बराबरी का हो सकता है. ऐसे में अब एआईएमआईएम और कुछ निर्दलीय विधायकों की भूमिका को बेहद अहम माना जा रहा है.
कांग्रेस विधायकों पर भी टिकी राजनीतिक नजर
इस चुनाव में कांग्रेस के विधायकों को लेकर भी चर्चा बनी हुई है. पार्टी के पास विधानसभा में सीमित संख्या है और उनके वोट का असर सीधे चुनावी गणित पर पड़ सकता है. राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि अगर कहीं क्रॉस वोटिंग होती है तो उसका असर पांचवीं सीट के नतीजे पर पड़ सकता है. हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके सभी विधायक एकजुट हैं और महागठबंधन के उम्मीदवार के समर्थन में मतदान करेंगे.
परिणाम से मिल सकता है भविष्य की राजनीति का संकेत
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह चुनाव सिर्फ राज्यसभा की सीटों तक सीमित नहीं है. इसके नतीजे बिहार की आने वाली राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं. यदि एनडीए सभी सीटें जीतने में सफल रहता है तो राज्यसभा में उसकी ताकत और बढ़ेगी. वहीं अगर महागठबंधन किसी सीट पर जीत दर्ज करता है तो यह विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश होगा. अब सबकी नजर आज होने वाली वोटिंग और उसके बाद आने वाले नतीजों पर है.
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