बता दें कि साल 2011 जगदीश कुमार के परिवार में चारों तरफ खुशियां बिखरी पड़ी और उनका बेटा किसी जरूरी काम से ट्रेन में सफर कर रहा था. लेकिन इस दौरान एक रेल हादसे में उनके आंखों का तारा यानी उनका बेटा हमेशा-हमेशा के लिए उनसे दूर हो गया.
कैसे हुई शुरुआत
वहीं बेटे के जाने का गम इतना था कि भुलाया भी नहीं जा सकता था, लेकिन अपने बेटे को एक कामयाब इंसान बनने का सपना उनके दिल में एक चिंगारी की तरह ऐसा उठा कि उनकी धर्मपत्नी ने कुछ ही महीनों के बाद यह सपना बाकी बच्चों में देखना शुरू कर दिया. वहीं जगदीश कुमार की पत्नी ने बालाजी संस्था के साथ जुड़कर बच्चों को निशुल्क पढ़ना शुरू किया और शुरुआत में तो सिर्फ तीन बच्चे ही पढ़ने आए, लेकिन धीरे-धीरे यह आंकड़ा 80 और फिर 120 और फिर 200 पर हो गया था.
जरूरतमंद बच्चों के लिए स्कूल
इसके बाद संस्था ने दो अलग-अलग स्कूल उन जरूरतमंद बच्चों के लिए खोले, ताकि वह बच्चे अच्छा पढ़ सके. खासतौर पर उन जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाया जा रहा था जो आर्थिक रूप से कमजोर थे या फिर जिनके मां-बाप उनकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पा रहे थे. जगदीश कुमार की धर्मपत्नी ने अकेले ही इन बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया था लेकिन जब बच्चों की संख्या बढ़ती गई तो संस्थान ने स्कूल भी खोला और अपने ही खर्च पर कई टीचर्स भी रखें.
एक तरफ तो जहां कुछ संस्थाएं लोगों से मदद लेकर स्कूल चलती है, तो दूसरी तरफ अंबाला की इस बालाजी संस्था ने अपने ही 50 मेंबर्स के साथ मिलकर इन स्कूलों को चलाने का जिम्मा उठाया रखा है जिसमें सभी 50 के 50 मेंबरों ने कंट्रीब्यूशन करके इन स्कूल को चलाने का काम करते हैं और अंबाला में यह शिक्षा की चिंगारी अब बच्चों में एक नया पढ़ाई का जोश भरने का काम कर रही है.
इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए जगदीश कुमार ने बताया कि उनकी संस्था की शुरुआत साल 2008 में कुछ दोस्तों के साथ मिलकर समाज सेवा के उद्देश्य से की गई थी. साल 2011 में बेटे की रेल हादसे में मौत के बाद उनकी धर्मपत्नी ने संस्था के साथ मिलकर जरूरतमंद बच्चों के लिए एक ट्यूशन सेंटर शुरू किया. शुरुआत में केवल तीन बच्चे पढ़ने आते थे, लेकिन समय के साथ यह संख्या बढ़कर करीब 80 हो गई.
हालांकि, कोरोना काल के दौरान यह ट्यूशन सेंटर कुछ समय के लिए बंद हो गए थे. इसके बाद संस्था ने दो स्कूलों को अडॉप्ट किया, जहां करीब 200 बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया जा रहा है.
इसके अलावा, शालीमार कॉलोनी और नया गांव में 20 से 30 बच्चों को ट्यूशन के माध्यम से शिक्षा दी जा रही है. इन बच्चों की किताबें, वर्दी, जूते और अन्य जरूरी सामान का खर्च भी संस्था द्वारा उठाया जाता है.
कोई भी बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे
जगदीश कुमार का कहना है कि उनका उद्देश्य है कि कोई भी बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे और हर बच्चे के सपने पूरे हों. यदि कोई जरूरतमंद बच्चा उनके पास आता है तो संस्था उसकी फीस का खर्च भी उठाती है और उसे शिक्षा से जोड़ने की पूरी कोशिश करती है.
उन्होंने बताया कि इन ट्यूशन सेंटरों में कई शिक्षक संस्था द्वारा वेतन पर नियुक्त किए गए हैं. उनकी इच्छा है कि आगे भी इसी तरह समाज सेवा और शिक्षा का यह कार्य लगातार चलता रहे.
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