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शहरवासी इन दिनों बड़ी मुश्किल में हैं। लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि वह हाउस टैक्स जमा करें या ना करें। स्थिजि अजीबोगरीब है। हर एक पखवारे हाउस टैक्स के मुद्दे पर नया बयान जारी हो जाता है। कई बार फैसले बदले चुके हैं। असमंजस में सिर्फ जनता ही नहीं बल्कि नगर निगम के कर्मचारी और अधिकारी भी हैं। मंगलवार को मेयर सुनीता दयाल ने मीडिया में प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि लखनऊ में सरकार के उच्च अधिकारियों से उनकी गहनता से वार्ता हुई है। जिसमें यह निर्णय हुआ कि अभी हाउस टैक्स नही बढ़ाया जाएगा और पुरानी दर पर ही हाउस टैक्स लिया जाएगा। इस बाबत समस्त प्रक्रिया व औपचारिकता कुछ ही दिनों में पूर्ण कर ली जाएगी। विदित हो लंबे समय से हाउस टैक्स पर रार मचा हुआ है। पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीएम सर्किल रेट के आधार पर निर्धारित नई दर के अनुसार हाउस टैक्स वसूले जाने के पक्ष में फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद लगा कि विवाद खत्म हो जाएगा। लेकिन नगर निगम बोर्ड बैठक के बाद एक बार फिर यह मुद्दा सुर्खियों में आ गया है। गौर करने वाली बात यह है कि शहर की जनता के बीच हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी का मुद्दा न तो चर्चा में है और ना ही वह इसका विरोध कर रहे हैं। हजारों की संख्या में लोगों ने नई दर से हाउस टैक्स का भुगतान भी कर दिया है। बावजूद इसके हाउस टैक्स का राजनैतिक विरोध चल रहा है। हाउस टैक्स का विरोध करने वालों की संख्या बेहद कम मुट्ठी भर हैं लेकिन उनकी लॉबी बेहद मजबूत और ताकतवर है। यह लॉबी किसी को भी मात दे सकता है। वित्तीय वर्ष खत्म हो रहा है लेकिन अभी यह तय नहीं हुआ है कि किस दर से हाउस टैक्स वसूला जाएगा। निगमकर्मियों के समक्ष यह दुविधा है कि उन्हें कभी आगे बढ़ तो कभी पीछे हट का फरमान सुना दिया जाता है। इस कारण अब वह भी किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में पहुंच गये हैं। शहर की जनता विकास चाहती है। विकास के लिए फंड चाहिये। नई दर से टैक्स जमा करने के लिए आम जनता तैयार है। लेकिन शहर के धन्ना सेठों को हाउस टैक्स में यह बढ़ोत्तरी मंजूर नहीं है।

उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद। शहरवासी इन दिनों बड़ी मुश्किल में हैं। लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि वह हाउस टैक्स जमा करें या ना करें। उनके समक्ष अजीबो गरीब स्थिति है। हर एक पखवारे हाउस टैक्स के मुद्दे पर नया बयान जारी हो जाता है। इतनी बार बयानबाजी हो चुकी है और फैसले बदले जा चुके हैं कि अब लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि कौन सा फैसला सही है। असमंजस में सिर्फ जनता ही नहीं बल्कि नगर निगम के कर्मचारी और अधिकारी भी हैं। निगमकर्मी भी समझ नहीं पा रहे हैं कि वह किससे और किस आधार पर टैक्स वसूलें। तीन दिन पहले नगर निगम बोर्ड बैठक में सदन ने पार्षदों की सहमति के बाद डीएम सर्किल रेट के हिसाब से हाउस टैक्स वसूलने और उस पर अधिकतम 92 प्रतिशत तक छूट देने का ऐलान किया था। बोर्ड बैठक के बाद मेयर सुनीता दयाल ने प्रेस रिलीज जारी कर इसकी जानकारी दी। मंगलवार को टैक्स को लेकर बोर्ड बैठक के फैसले को खारिज करते हुए पुरानी दर से ही टैक्स वसूली की बात कही गई। मंगलवार को मेयर द्वारा जारी नई प्रेस रिलीज में कहा गया कि लखनऊ में मेयर सरकार के उच्च अधिकारियों से गहनता से वार्ता हुई। जिसमें यह निर्णय हुआ कि अभी हाउस टैक्स नही बढ़ाया जाएगा और पुरानी दरों पर ही हाउस टैक्स लिया जाएगा। इस बाबत समस्त प्रक्रिया व औपचारिकता कुछ ही दिनों में पूर्ण कर ली जाएगी।

विदित हो कई महीनों से हाउस टैक्स पर रार मचा हुआ है। पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीएम सर्किल रेट के आधार पर निर्धारित नई दर के अनुसार हाउस टैक्स वसूले जाने के पक्ष में फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद लगा कि विवाद खत्म हो जाएगा। मामूली विरोध के बाद मामला शांत हो गया। नगर निगम बोर्ड बैठक से पहले एक बार फिर यह मुद्दा सुर्खियों में आया। लेकिन बोर्ड बैठक में छूट की घोषणा के बाद अधिकांश पार्षदों ने नई दर के पक्ष में दिखें। सदन में प्रस्ताव पर वोटिंग के दौरान सिर्फ दो पार्षदों ने नई दर का विरोध किया था। इससे पहले गाजियाबाद के कद्दावर सांसद, मंत्री और विधायकों ने मेयर और नगर आयुक्त के साथ इस मुद्दे पर बैठक की थी। गौर करने वाली बात यह है कि शहर की जनता के बीच हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी का मुद्दा न तो चर्चा में है और ना ही वह इसका विरोध कर रहे हैं। हजारों की संख्या में लोगों ने नई दर से हाउस टैक्स का भुगतान भी कर दिया है।

बावजूद इसके हाउस टैक्स का राजनैतिक विरोध चल रहा है। हाउस टैक्स के विरोध के पीछे भाजपा के स्थानीय ताकतवर नेताओं की लॉबिंग मानी जा रही है। विरोध करने वालों की संख्या बेहद कम है लेकिन उनकी लॉबी मजबूत और ताकतवर है। हाउस टैक्स पर चल रही राजनीति के कारण टैक्स वसूली का काम बाधित है। वित्तीय वर्ष खत्म हो रहा है लेकिन अभी तक यह तय नहीं है कि हाउस टैक्स वसूला जाएगा कि नहीं वसूला जाएगा। निगमकर्मियों के समक्ष दुविधा यह है कि उन्हें कभी आगे बढ़ तो कभी पीछे हट का फरमान सुना दिया जाता है। इस कारण वह भी किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में पहुंच गये हैं। शहर की जनता विकास चाहती है। विकास के लिए फंड चाहिये। ऐसे में हाउस टैक्स की नई दर के कारण आम लोगों पर कुछ बोझ बढ़ रहा है तो वह उसके लिए सहर्ष तैयार हैं। लेकिन शहर के धन्ना सेठों को यह बढ़ोत्तरी मंजूर नहीं है।

पिछले एक दशक से भी अधिक समय से गाजियाबाद में हाउस टैक्स नहीं बढ़ा है। देश की राजधानी दिल्ली के पड़ोसी होने के बावजूद गाजियाबाद में हाउस टैक्स की दर काफी कम है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के ही कई अन्य शहरों के मुकाबले गाजियाबाद में कम दर पर टैक्स वसूल किया जाता है। गाजियाबाद की गिनती प्रदेश के अति संपन्न शहरों में होती है। यहां प्रति व्यक्ति आय भी काफी अधिक है। फिर भी दशकों बाद टैक्स में होनी वाली बढ़ोत्तरी पर यहां सबसे ज्यादा रार मची है। नगर निगम के निर्णय अधिनियम और शासनादेश के अनुसार होता है। नगर निगम अधिनियम में सभी के अधिकार वर्णित हैं। ऐसे में गाजियाबाद में हाउस टैक्स की वसूली किस दर पर होगी यह सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न बना हुआ है। यानि जब तक शासन से इस बाबत कोई नया आदेश नहीं आ जाता हाईकोर्ट का आदेश ही मान्य होगा।

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