<span style="color:#4b0082"><strong>Rangbhari n Amalaka Ekadashi : </strong></span>हिन्दू धार्मिक शास्त्रों में रंगभरी एकादशी का बहुत महत्व है। इस दिन भगवान शिव माता गौरा और अपने गणों के साथ रंग-गुलाल से होली खेलते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आमलकी एकादशी और रंगभरी एकादशी एक ही दिन मनाई जाती हैं, लेकिन इनके पीछे की मान्यताएं और परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में भिन्न हैं।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/ekadashi-vrat-katha/amlaki-ekadashi-katha-2026-126022700005_1.html" target="_blank">Amlaki Ekadashi Katha: आमलकी एकादशी की संपूर्ण कथा कहानी</a></strong>
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भगवान शिव और माता पार्वती का गौना</h3>
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होली की शुरुआत (फाग का स्वागत)</h3>
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आमलकी एकादशी का महत्व (पौराणिक पक्ष)</h3>
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इसे रंगभरी एकादशी क्यों कहते और मनाते हैं, इसके मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:</h4>
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1. भगवान शिव और माता पार्वती का गौना</h3>
मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर विवाह के बाद, इसी दिन यानी फाल्गुन शुक्ल एकादशी को भगवान शिव माता पार्वती का 'गौना' कराकर पहली बार अपनी प्रिय नगरी काशी/ वाराणसी लाए थे। इस खुशी में शिव के गणों और भक्तों ने उन पर जमकर अबीर और गुलाल उड़ाया था। वाराणसी में आज भी इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और भारी मात्रा में गुलाल उड़ाकर होली का औपचारिक आगाज किया जाता है। यह दिन भगवान शिव और माता गौरी के वैवाहिक जीवन में बड़ा महत्व रखता है।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/ekadashi-vrat-katha/amalki-ekadashi-vrat-vidhi-puja-katha-mahatva-126022600045_1.html" target="_blank">आमलकी एकादशी व्रत: इस विधि से करने पर मिलता है पुण्य फल, जानें तिथि और कथा</a></strong>
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2. होली की शुरुआत (फाग का स्वागत)</h3>
रंगभरी एकादशी को ब्रज और उत्तर भारत के कई हिस्सों में होली के त्योहार की आधिकारिक शुरुआत माना जाता है। इस दिन से लोग रंगों से खेलना शुरू कर देते हैं, क्योंकि यह होली से ठीक पहले वाली बड़ी एकादशी है, इसलिए इसे 'रंगभरी' यानी रंगों से भरी एकादशी कहा जाता है।
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3. आमलकी एकादशी का महत्व (पौराणिक पक्ष)</h3>
जहां 'रंगभरी' नाम भगवान शिव से जुड़ा है, वहीं 'आमलकी' नाम भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष से जुड़ा है। रंगभरी एकादशी के दिन लोग आमलकी के पेड़ को सजाते हैं, उसकी पूजा करते हैं और इसके साथ ही विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया, उसी समय 'आंवले' के वृक्ष की भी उत्पत्ति हुई थी। भगवान विष्णु ने कहा था कि जो भी इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करेगा, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।
सीधे शब्दों में जानें तो यह दो परंपराओं का संगम है। वैष्णव संप्रदाय के लिए यह दिन आमलकी एकादशी है, जो कि आंवले की पूजा और विष्णु भक्ति के लिये जाना जाता है। शैव संप्रदाय और काशी वासियों के लिए यह रंगभरी एकादशी है अर्थात् शिव-पार्वती का स्वागत और होली का प्रारंभ। यह साल का इकलौता ऐसा दिन है जब महादेव के भक्त उन्हें 'गुलाल' अर्पित करते हैं, क्योंकि आमतौर पर शिव जी को भस्म चढ़ाई जाती है।
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