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-आईडी कार्ड विवाद को लेकर स्कूल में जबरन प्रवेश, माहौल बिगाड़ने की कोशिश
-महिला स्टाफ से अभद्रता और धमकी के आरोप, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल
-पुलिस कार्रवाई पर सवाल, अभिभावक की भूमिका और दबाव की चर्चा तेज

सुनील रघुवंशी
गाजियाबाद। बेरोजगारी ने पत्रकारिता को आसान कमाई का जरिया बना दिया है। हर मोहल्ले में एक ‘पत्रकार’ पैदा हो गया है जिसे न बोलने का सलीका है, न भाषा की मर्यादा, न शब्दों की गरिमा। शब्दावली सड़कछाप वाली है। यही पत्रकार आज प्रतिष्ठ पत्रकारों के बीच मेें घुसकर या फिर अधिकारियों के सामने जी हजूरी लगाकर अपनी रोटी सेक रहे है। 50- 100 रुपये में बिक जाने वाले ऐसे कथित पत्रकार असल, ईमानदार और ज़मीनी पत्रकारों की साख को रोज तार-तार कर रहे हैं। बेरोजगारी और डिजिटल माध्यमों की आसान उपलब्धता ने पत्रकारिता जैसे जिम्मेदार पेशे को कई स्थानों पर आसान कमाई का जरिया बना दिया है। शहर के अनेक इलाकों में स्वयंभू पत्रकारों की संख्या तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है, जिन पर आरोप है कि वे न भाषा की मर्यादा समझते हैं और न ही पेशे की गरिमा। पैसे लेकर महिमामंडन करना और विरोध होने पर बदनाम करने की धमकी देना जैसी प्रवृत्तियाँ वास्तविक और ईमानदार पत्रकारों की साख को नुकसान पहुँचा रही हैं।

ऐसा ही एक मामला विजयनगर क्षेत्र में सामने आया है, जिसने शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था दोनों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। समाज के निर्माण में विद्यालय केवल शिक्षा देने वाले संस्थान नहीं होते, बल्कि वे संस्कार, अनुशासन और भविष्य निर्माण के केंद्र भी होते हैं। किसी भी क्षेत्र का विद्यालय उस क्षेत्र की सामाजिक चेतना और विकास स्तर का प्रतिबिंब होता है। ऐसे में जब किसी विद्यालय के बारे में बिना तथ्यों की पुष्टि किए अफवाहें फैलती हैं या भ्रामक सूचनाएँ प्रसारित की जाती हैं, तो इसका असर केवल संस्था पर ही नहीं बल्कि विद्यार्थियों, अभिभावकों और पूरे समाज पर पड़ता है। आज सूचना के तीव्र प्रसार के दौर में सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर फैलने वाली अपुष्ट खबरें कई बार सत्य से अधिक प्रभावशाली हो जाती हैं। कुछ लोग स्वयं को पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता बताकर अधूरी जानकारी या निजी स्वार्थ के आधार पर विद्यालयों के विरुद्ध नकारात्मक माहौल बनाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार की गतिविधियाँ न केवल गैर-जिम्मेदाराना हैं बल्कि समाज के शैक्षिक ढाँचे को कमजोर करने वाली भी हैं।

विद्यालय किसी भी समुदाय की आशा का केंद्र होता है। यहाँ बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। शिक्षक अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए विद्यार्थियों को बेहतर नागरिक बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते हैं। विद्यालय प्रशासन सीमित संसाधनों के बावजूद बेहतर वातावरण, सुरक्षा और शैक्षिक गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सतत प्रयास करता है। ऐसे में निराधार आरोप या अफवाहें उनके मनोबल को प्रभावित करती हैं। गाजियाबाद के विजय नगर क्षेत्र में प्रताप विहार स्थित गौतम पब्लिक स्कूल में 16 फरवरी को हुई घटना ने न केवल शिक्षा संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि पत्रकारिता के नाम पर चल रही कथित दबंगई और प्रशासनिक निष्क्रियता को भी उजागर कर दिया है। घटना क्रम को देखने पर यह मामला केवल फीस या परीक्षा आईडी कार्ड विवाद का नहीं, बल्कि दबाव, धमकी और प्रभाव के दुरुपयोग का प्रतीत है।
प्रताप विहार स्थित गौतम पब्लिक स्कूल, जहां हजारों विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते हैं, में सीबीएसई परीक्षाओं से पूर्व विद्यालय प्रशासन ने अभिभावकों को बकाया फीस जमा करने और परीक्षा संबंधी औपचारिकताएं पूर्ण करने के लिए पूर्व में सूचित किया। छात्रों को परीक्षा से वंचित करने का कोई निर्णय नहीं था और पात्र विद्यार्थियों को परीक्षा आईडी कार्ड उपलब्ध कराए जा रहे थे। स्थिति 16 फरवरी को उस समय तनावपूर्ण हो गई जब कुछ अभिभावक विद्यालय पहुंचे और परीक्षा आईडी कार्ड को लेकर विवाद करने लगे। इसी दौरान एक अभिभावक कथित रूप से कुछ लोगों को साथ लेकर स्कूल परिसर में पहुंचा, जिन्होंने स्वयं को पत्रकार बताया। आरोप है कि इन लोगों ने विद्यालय परिसर में प्रवेश करते ही माहौल को उग्र बनाने का प्रयास किया।

कृष्णा जयंत पुत्र भूपेंद्र कुमार, तथाकथित पत्रकार घनश्याम पुत्र विनोद कुमार, पवन सूर्यवंशी पुत्र सुनील कुमार तथा सुशील मौर्य नामक व्यक्तियों ने रिसेप्शन क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद महिला स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार किया। आरोपों के अनुसार गाली-गलौज, धमकी और स्कूल परिसर को नुकसान पहुंचाने जैसी बातें कही गईं, जिससे विद्यार्थियों और कर्मचारियों में भय का वातावरण बन गया। बताया गया कि उक्त लोग स्वयं को पत्रकार बताते हुए महिला प्रधानाचार्या के कार्यालय में जबरन प्रवेश करने का प्रयास करने लगे और अभद्र व्यवहार किया। स्कूल स्टाफ द्वारा रोकने पर कथित रूप से बाहर निकलकर देख लेने और मारने की धमकियां दी।

घटना के दौरान स्कूल परिसर की वीडियोग्राफी भी की गई और बाद में वीडियो को सोशल मीडिया पर प्रसारित कर उसके साथ छेड़छाड़ करते हुए सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। घटना की सूचना तुरंत डायल 112 पर दी गई तथा थाना विजय नगर और प्रताप विहार चौकी में लिखित शिकायत दी गई। शिकायत के कई दिन बाद तक कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया गया और कार्रवाई जांच तक सीमित रही। इस देरी ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले ने नया मोड़ तब लिया जब कृष्णा जयंत के पिता भूपेंद्र कुमार द्वारा विद्यालय प्रशासन के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत किए जाने की जानकारी सामने आई। विद्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया है। यह भी चर्चा है कि भूपेंद्र कुमार पुलिस कमिश्नरेट गाजियाबाद से जुड़े हैं और थाना खोड़ा में कार्यरत होने के कारण प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी रखते हैं। हालांकि इन तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही संभव है।

विद्यालय में प्रवेश के समय सरकारी सेवा की जानकारी छिपाकर निजी नौकरी दर्शाई गई थी। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो यह प्रशासनिक नियमों और प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी प्रश्न खड़े करता है। बाहरी दबाव और धमकी के माहौल में बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। शिक्षा संस्थानों को विवाद और दबाव की राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। शिक्षा संस्थानों की गरिमा, विद्यार्थियों की सुरक्षा और पत्रकारिता की विश्वसनीयता – इन तीनों की रक्षा करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। देखा जाए तो यह घटना कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है- क्या पत्रकारिता की आड़ में दबाव बनाना स्वीकार्य है? क्या शिक्षा संस्थानों में जबरन प्रवेश और धमकी जैसी घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या प्रशासनिक तंत्र प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों में निष्पक्षता बनाए रख पा रहा है? यदि ऐसे मामलों पर समय रहते कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो भविष्य में शिक्षा संस्थान दबाव समूहों के निशाने पर आ सकते हैं। यह केवल एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता और सामाजिक संतुलन की परीक्षा भी है।

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