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होमताजा खबरकृषिन शुगर, न बीपी! आखिर क्या है इस बुजुर्ग किसान की सेहत और खेती का राज? जानिए

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बहराइच के एक बुजुर्ग किसान ने यह साबित कर दिया है कि खेती में मुनाफा केवल ज्यादा उत्पादन से नहीं, बल्कि गुणवत्ता और भरोसे से भी मिलता है. 67 वर्षीय जगन्नाथ प्रसाद मौर्य कई सालों से गौ-आधारित जैविक खेती कर रहे हैं. उनका मानना है कि कम पैदावार के बावजूद जहरमुक्त देसी मक्का और अन्य फसलों की बाजार में भारी मांग है, जिससे उन्हें अच्छा लाभ मिल रहा है.

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बहराइच. बहराइच जिले के रहने वाले 67 वर्षीय किसान जगन्नाथ प्रसाद मौर्य पिछले कई वर्षों से गौ-आधारित जैविक खेती कर रहे हैं. उनका कहना है कि जैविक खेती न सिर्फ जहरमुक्त होती है, बल्कि इसकी लागत भी बेहद कम आती है. वे किसानों से अपील करते हैं कि रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाएं. उनके मुताबिक, शुरुआत में उत्पादन भले थोड़ा कम हो, लेकिन बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है. एक बार ग्राहकों का भरोसा बन जाए तो बिक्री लगातार बढ़ती जाती है.

कम पैदावार, लेकिन ज्यादा मुनाफा
जगन्नाथ प्रसाद मौर्य बताते हैं कि वे देसी मक्का की जैविक खेती करते हैं. जैविक विधि से उगाई गई देसी मक्का पूरी तरह जहरमुक्त होती है, जिससे स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होता. स्वाद में भी यह बेहतर होती है. हालांकि उत्पादन थोड़ा कम होता है, लेकिन बाजार में इसकी मांग काफी ज्यादा रहती है. जो ग्राहक शुद्ध जैविक अनाज पर विश्वास करते हैं, वे इसे तुरंत खरीद लेते हैं और दोबारा भी मांग करते हैं. यही वजह है कि कम उत्पादन के बावजूद अच्छा मुनाफा हो जाता है.

खुद भी खाते हैं जैविक अनाज
67 वर्ष की उम्र में भी जगन्नाथ प्रसाद मौर्य पूरी तरह स्वस्थ हैं. उनका दावा है कि वे लंबे समय से मक्का, धान, गेहूं और अन्य साग-सब्जियों की जैविक खेती कर रहे हैं और खुद भी वही अनाज खाते हैं. वे कहते हैं कि शायद यही कारण है कि उन्हें अब तक न तो शुगर की समस्या है और न ही ब्लड प्रेशर की. वे अन्य किसानों से भी आग्रह करते हैं कि रासायनिक खेती से दूरी बनाकर जैविक खेती अपनाएं. धीरे-धीरे डिमांड और मुनाफा दोनों बढ़ते हैं और जहरमुक्त अनाज बेचने का संतोष भी मिलता है.

कैसे होती है गौ-आधारित जैविक खेती?
जगन्नाथ प्रसाद मौर्य के अनुसार, जैविक खेती करना कोई कठिन काम नहीं है. इसके लिए किसान को अपनी जमीन के अनुसार पशुपालन करना चाहिए.
1) पशुओं से मिलने वाला दूध, दही और घी किसान के परिवार के काम आता है.
2) पशुओं का गोबर और मूत्र खेत में प्राकृतिक खाद का काम करता है.
3) यदि किसान के पास 1 से 2 बीघा जमीन है, तो 2 पशु पर्याप्त होते हैं.
4) दो पशुओं के सहारे सालभर में एक बीघा जमीन की खेती आराम से की जा सकती है.
उनका मानना है कि गौ-आधारित खेती से जमीन की उर्वरता बनी रहती है और किसान कम लागत में बेहतर गुणवत्ता वाला अनाज पैदा कर सकता है.

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Madhuri Chaudhary

पिछले 4 साल से मीडिया इंडस्ट्री में काम कर रही हूं और फिलहाल News18 में कार्यरत हूं. इससे पहले एक MNC में भी काम कर चुकी हूं. यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की बीट कवर करती हूं. खबरों के साथ-साथ मुझे…और पढ़ें

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