सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि निर्धारित विरोध-प्रदर्शन स्थलों पर भी अनिश्चितकाल तक कब्जा करके नहीं रखा जा सकता. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार लोकतंत्र और संविधान का एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन इसका प्रयोग असीमित रूप से या इस प्रकार नहीं किया जा सकता, जिससे अन्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का असंगत और व्यापक हनन हो.
लोकतांत्रिक अधिकार के उपयोग के लिए समान अवसर मिले
न्यायालय ने निर्धारित विरोध-प्रदर्शन स्थलों के निष्पक्ष और समान उपयोग के संबंध में भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. न्यायालय ने संकेत दिया कि कोई एक संगठन या समूह किसी सार्वजनिक स्थान पर एकाधिकार या अनिश्चितकालीन कब्जे का दावा नहीं कर सकता. विभिन्न संगठनों और समूहों को शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अपने लोकतांत्रिक अधिकार के उपयोग के लिए उचित एवं समान अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए.
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित प्रदर्शनकारी संगठनों और राजनीतिक पक्षकारों, जिनमें सीजेपी, राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के प्रतिनिधि शामिल हैं, को कार्यवाही में उपयुक्त पक्षकार के रूप में शामिल करने का निर्देश भी दिया.
याचिका में उठाए गए ये सवाल
यह याचिका एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाती है कि क्या समाज के एक वर्ग को अपने विरोध-प्रदर्शन का अधिकार अनिश्चितकाल तक इस प्रकार प्रयोग करने की अनुमति दी जा सकती है, जिससे हजारों अन्य नागरिकों की आजीविका, आर्थिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार प्रभावित हों?
याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वे न तो शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों के विरोधी हैं और न ही किसी के लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करना चाहते हैं. उनकी आपत्ति घनी आबादी वाले व्यावसायिक क्षेत्रों के आसपास निर्धारित विरोध-प्रदर्शन स्थलों पर लंबे समय तक और असंगत रूप से धरना-प्रदर्शन जारी रखने को लेकर है, जिसके कारण व्यापार, व्यावसायिक गतिविधियों और व्यापारियों, कर्मचारियों, रेहड़ी-पटरी वालों, दिहाड़ी मजदूरों तथा आजीविका के लिए इन गतिविधियों पर निर्भर अनेक वर्गों को गंभीर नुकसान उठाना पड़ता है.
लाखों लोगों की आजीविका पर पड़ता है असर
गौरतलब है कि दिल्ली का व्यापारिक तंत्र लाखों लोगों की आजीविका का आधार है और राष्ट्रीय राजधानी की आर्थिक गतिविधियों तथा राजस्व सृजन में महत्वपूर्ण योगदान देता है. व्यावसायिक क्षेत्रों में लंबे समय तक व्यवधान का असर केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे कर्मचारी, परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोग, रेहड़ी-पटरी वाले, उपभोक्ता और पूरी आर्थिक गतिविधियों की श्रृंखला प्रभावित होती है.
इसलिए याचिका के माध्यम से एक ऐसी निष्पक्ष और व्यावहारिक व्यवस्था बनाने की मांग की गई है, जो शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करे कि ऐसे प्रदर्शन अनिश्चितकालीन आर्थिक व्यवधान का कारण न बनें और अन्य नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित न करें.
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किया जाना, प्रतिस्पर्धी मौलिक अधिकारों से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर न्यायिक विचार-विमर्श की दिशा में एक अहम कदम है. इस मामले पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में आगे सुनवाई होगी.
याचिकाकर्ताओं ने आशा जताई है कि इस न्यायिक कार्यवाही से निर्धारित विरोध-प्रदर्शन स्थलों के उपयोग के लिए एक निष्पक्ष, संतुलित और संवैधानिक रूप से उपयुक्त व्यवस्था विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा, जिससे लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक की आजीविका अर्जित करने के अधिकार की भी रक्षा सुनिश्चित हो सकेगी.
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