- त्योहार आते ही सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं कथित पत्रकारिता का चोला ओढ़े वसूलीबाज, लाइसेंसी दुकानों से लेकर अधिकारियों तक को करते हैं टारगेट
- कम संसाधनों में सरकार को करोड़ों का राजस्व देने वाले विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठाने वालों की मंशा भी जांच के दायरे में हो
- शिकायत के बजाय सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने का खेल, जांच में कई दावों की पुष्टि नहीं होने से उठ रहे सवाल
- होली, दीपावली और नववर्ष पर सक्रिय हो जाते हैं कथित पत्रकारिता के स्वयंभू ठेकेदार
उदय भूमि संवाददाता
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व को मजबूती देने वाले विभागों में आबकारी विभाग की अहम भूमिका किसी से छिपी नहीं है। वाणिज्यिक कर (जीएसटी) और स्टाम्प एवं निबंधन विभाग के बाद आबकारी विभाग भी सरकार के प्रमुख राजस्व स्रोतों में शामिल है। खास बात यह है कि सीमित संसाधनों और अपेक्षाकृत कम फोर्स के बावजूद आबकारी विभाग राजस्व संग्रह के मामले में लगातार अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। इसके बावजूद जब भी होली, दीपावली और नववर्ष जैसे बड़े त्योहार नजदीक आते हैं, आबकारी विभाग अचानक कुछ लोगों के निशाने पर आ जाता है। सवाल यह है कि आखिर हर बार आबकारी विभाग ही क्यों निशाना बनता है? क्या इसके पीछे वास्तव में जनहित और व्यवस्था सुधारने की मंशा है या फिर कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में अपनी निजी स्वार्थपूर्ति का रास्ता तलाशते हैं?
त्योहारों के सीजन में शराब की मांग बढऩे के साथ ही आबकारी विभाग की जिम्मेदारियां भी कई गुना बढ़ जाती हैं। अवैध शराब की बिक्री रोकना, ओवररेटिंग पर अंकुश लगाना, निर्धारित समय पर दुकानों का संचालन सुनिश्चित करना, नकली और मिलावटी शराब के खिलाफ कार्रवाई करना तथा राजस्व चोरी रोकना विभाग की प्राथमिकताओं में शामिल रहता है। ऐसे समय में विभागीय अधिकारियों और निरीक्षकों की टीमें लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहती हैं। लेकिन इसी दौरान सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे अकाउंट और कथित न्यूज प्लेटफॉर्म सक्रिय हो जाते हैं, जिनकी गतिविधियों को लेकर लाइसेंसी दुकानदारों और विभागीय कर्मचारियों के बीच सवाल उठने लगे हैं।
त्योहार आते ही सक्रिय हो जाते हैं कथित पत्रकारिता के स्वयंभू ठेकेदार
आरोप है कि कुछ लोग गले में प्रेस का पहचान पत्र लटकाकर और हाथ में मोबाइल लेकर शराब की दुकानों पर पहुंचते हैं। पहले पव्वा या बीयर की कैन खरीदते हैं और फिर दुकान के अंदर और बाहर वीडियो बनाकर कथित अनियमितताओं को उजागर करने का दावा करते हैं। इसके बाद लाइसेंसी अनुज्ञापियों पर दबाव बनाने और कथित तौर पर आर्थिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है। आरोपों के मुताबिक, जब दुकानदार उनकी मांगों के आगे झुकने से इनकार करते हैं तो वीडियो और पोस्ट को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाता है।
कई बार संबंधित आबकारी अधिकारियों और निरीक्षकों को भी निशाने पर लेकर उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े किए जाते हैं। इन गतिविधियों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी दुकान पर वास्तव में अनियमितता मिलती है तो उसकी शिकायत सीधे आबकारी विभाग से क्यों नहीं की जाती? विभाग की ओर से प्रत्येक लाइसेंसी दुकान पर संबंधित अधिकारियों और निरीक्षकों के संपर्क नंबर प्रदर्शित किए जाते हैं, ताकि किसी भी शिकायत या समस्या की तत्काल सूचना दी जा सके। इसके बावजूद कुछ लोग विभाग को सूचना देने के बजाय सोशल मीडिया को ही कार्रवाई का माध्यम बनाना पसंद करते हैं। इससे उनकी मंशा को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
नोएडा की दुकानों को लेकर वायरल पोस्ट से उठे सवाल
हाल ही में नोएडा में कुछ लाइसेंसी शराब की दुकानों को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हुई पोस्ट भी चर्चा का विषय बनी हुई है। पाठक राज न्यूज नाम से प्रसारित सामग्री में नगला फेज-2, छपरौली, बिसहड़ा, गाजियाबाद सहित अन्य जिलों की स्थानों की दुकानों पर कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए गए। इसमें एक्सपायरी शराब, ओवररेटिंग और एक सर्किल की शराब दूसरे सर्किल में बेचे जाने जैसे मुद्दे उठाए गए।
पोस्ट में किए गए दावों के बाद आबकारी विभाग की टीम ने संबंधित दुकानों की जांच की। विभागीय जांच के दौरान उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, दुकानों में रखी शराब की बोतलों की मैन्युफैक्चरिंग डिटेल, क्यूआर कोड और बिल आदि की जांच की गई, जिनमें संबंधित अनियमितताओं की पुष्टि नहीं हुई। विभाग का पक्ष है कि जांच में बरामद शराब निर्धारित मानकों के अनुरूप पाई गई। ऐसे में सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों और मौके पर हुई जांच के निष्कर्षों के बीच अंतर ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कम संसाधनों में राजस्व का लक्ष्य, फिर भी लगातार निगरानी
आबकारी विभाग की जिम्मेदारी केवल शराब की दुकानों की निगरानी तक सीमित नहीं है। अवैध शराब के निर्माण और तस्करी पर रोक लगाने से लेकर राजस्व लक्ष्य पूरा करने तक विभाग को कई मोर्चों पर एक साथ काम करना पड़ता है। प्रदेश के बड़े जिलों गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, लखनऊ, कानपुर और आगरा में दुकानों की संख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से निगरानी करना अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण रहता है। इसके बावजूद विभागीय टीमें नियमित जांच और प्रवर्तन कार्रवाई करती हैं। ऐसे में बिना तथ्यों की पुष्टि किए किसी अधिकारी या कर्मचारी को सोशल मीडिया पर कटघरे में खड़ा करना न केवल उनकी छवि को प्रभावित करता है, बल्कि विभाग के मनोबल पर भी असर डालता है। यदि कहीं गड़बड़ी है तो उसे प्रमाणों के साथ सामने लाना जरूरी है, लेकिन किसी भी आरोप को अंतिम सच मान लेना उचित नहीं है।
व्यापारियों का आरोप- शिकायत के नाम पर मांगी जाती है रकम और मुफ्त शराब
कुछ लाइसेंसी अनुज्ञापियों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर आरोप लगाया कि कुछ लोग रात के समय दुकानों पर पहुंचते हैं। यदि किसी सेल्समैन से निर्धारित मूल्य से अधिक रकम लेने जैसी कोई बात सामने आती है तो वे विभाग में शिकायत करने की बात कहकर कथित तौर पर हजारों रुपये और मुफ्त शराब की मांग करते हैं। मांग पूरी नहीं होने पर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दिए जाने का भी आरोप है। व्यापारियों का कहना है कि उन्होंने सरकार से लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर लाइसेंस प्राप्त किया है, ताकि नियमानुसार कारोबार कर सकें। लेकिन यदि हर समय किसी कथित पत्रकार के पहुंचने और वीडियो वायरल करने का डर बना रहे तो सामान्य कारोबारी गतिविधियां प्रभावित होती हैं। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होना भी उतना ही जरूरी है, ताकि वास्तविक पत्रकारिता और कथित वसूली के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके।
सवाल विभाग से नहीं, आरोप लगाने वालों की मंशा से भी होने चाहिए
सोशल मीडिया पर न्यूज के नाम से चल रहे कई प्लेटफॉर्मों की ओर से आबकारी विभाग को लेकर लगातार पोस्ट किए जाने की चर्चा है। न्यूज 89 लाइव, पाठक न्यूज और झूठ का पर्दाफाश जैसे नामों से प्रसारित सामग्री को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि किसी प्लेटफॉर्म या व्यक्ति के खिलाफ बिना प्रमाण वसूली का आरोप साबित नहीं माना जा सकता, लेकिन यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की आड़ में किसी व्यापारी या सरकारी कर्मचारी पर अनुचित दबाव बनाता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में पत्रकारिता का उद्देश्य व्यवस्था की कमियों को उजागर करना और जनता की आवाज उठाना है, न कि किसी विभाग या व्यापारी को डराकर निजी लाभ हासिल करना। आबकारी विभाग में अनियमितता मिलने पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है, लेकिन वही कसौटी अन्य विभागों पर भी लागू होनी चाहिए।
केवल त्योहारों के आसपास आबकारी विभाग को निशाना बनाने और बिना विभागीय पक्ष जाने आरोप वायरल करने की प्रवृत्ति पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। आखिरकार आबकारी विभाग भी सरकार की राजस्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसकी कमियों को उजागर करना जरूरी है, लेकिन उसके अच्छे कार्यों और सीमित संसाधनों के बीच किए जा रहे प्रयासों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं। जरूरत इस बात की है कि वास्तविक शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई हो और पत्रकारिता की आड़ में किसी भी तरह की कथित अवैध वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
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