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– फोटो : ANI

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वाहनों के धुएं से बेशक दिल्ली की हवाएं सबसे ज्यादा खराब होती है, लेकिन प्रदूषण की कहानी सिर्फ सड़कों पर ही नहीं दौड़ रही है। राजधानी के औद्योगिक क्षेत्रों और आवासीय गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण का हिस्सा भी दहाई में पहुंचने वाला है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के पूर्वानुमान के मुताबिक, 28 अक्तूबर तक सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले अति सूक्ष्मकणों- पीएम2.5 में औद्योगिक स्रोतों की हिस्सेदारी 5.09 फीसदी और रिहायशी स्रोतों की 5.20 फीसदी पहुंच सकती है। दोनों को मिलाकर यह योगदान 10.29 फीसदी हो सकता है।


आईआईटीएम के डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) के आंकड़े बताते हैं कि 25 अक्तूबर को औद्योगिक स्रोतों की हिस्सेदारी 4.649 फीसदी और रिहायशी स्रोतों की 4.678 फीसदी थी। अगले तीन दिनों में दोनों स्रोतों में उतार-चढ़ाव आने का अनुमान है। इस दौरान वाहनों से होने वाले प्रदूषण की हिस्सेदारी भी 17.30 फीसदी से बढ़कर 26 अक्तूबर को 20.86 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है। 28 अक्तूबर को इसके 19.39 फीसदी रहने की आशंका है।

दिल्ली की हवा पर वाहनों का दबाव सबसे ज्यादा बना रहेगा, लेकिन औद्योगिक और रिहायशी गतिविधियों का संयुक्त योगदान भी दस फीसदी के पार जा सकता है। 

दिल्ली से बाहर का धुआं भी बड़ी चुनौती

दिल्ली के स्थानीय स्रोतों के अलावा पड़ोसी जिलों से आने वाला प्रदूषण भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। डीएसएस के पूर्वानुमान के अनुसार, 28 अक्तूबर तक दिल्ली के अपने स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 35 से 40 फीसदी के बीच रह सकती है। शेष हिस्से में पड़ोसी राज्यों से आने वाले प्रदूषण और पराली जलाने का योगदान शामिल होगा। एनसीआर के गुरुग्राम और फरीदाबाद समेत हरियाणा के जिलों से होने वाला प्रदूषण दिल्ली की हवा पर असर डालता है। वहीं, हवा की दिशा में बदलाव के साथ उत्तर प्रदेश के जिलों से आने वाले प्रदूषण की हिस्सेदारी भी बदल सकती है। 

पराली के धुएं में भी उतार-चढ़ाव

पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की हिस्सेदारी में भी तेजी से बदलाव का अनुमान है। डीएसएस के अनुसार, 25 अक्तूबर को इसका योगदान 5.21 फीसदी था, जो 26 अक्तूबर को बढ़कर दस फीसदी से अधिक हो सकता है। इसके बाद 27 और 28 अक्तूबर को इसमें तेज गिरावट आने का अनुमान है। इन दिनों पराली के धुएं की हिस्सेदारी क्रमशः करीब दो और एक फीसदी तक रह सकती है। आईआईटीएम के मुताबिक, पराली के धुएं का असर केवल आग लगाने की घटनाओं की संख्या पर निर्भर नहीं करता। हवा की दिशा और मौसमी परिस्थितियां भी तय करती हैं कि खेतों से उठने वाला धुआं दिल्ली तक कितना पहुंचेगा।

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