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राहुल गांधी लगातार आरोप लगा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी अपनी लोकप्रियता के दम पर नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की मदद से चुनाव जीत रही है. कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस की दशकों से चली आ रही चुनावी कमजोरी के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त है? क्या पार्टी को अपनी नीतियों, नेतृत्व और संगठन की भी समीक्षा नहीं करनी चाहिए?

राहुल गांधी के आरोपों के दायरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी हैं. कांग्रेस का दावा है कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल के पक्ष में काम कर रहा है. निष्पक्ष चुनाव की मांग करना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन जब आरोप इतने गंभीर हों, तो उनके समर्थन में तथ्य और प्रमाण भी सामने आने चाहिए. केवल राजनीतिक बयानबाजी से किसी आरोप की पुष्टि नहीं हो जाती. चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाने के साथ कांग्रेस को अपनी चुनावी स्थिति के उन कारणों पर भी विचार करना होगा, जिनका एसआईआर से कोई सीधा संबंध नहीं है.

अमित शाह ने सामने रखा कांग्रेस का चुनावी इतिहास

कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी के चुनावी इतिहास को सामने रखा. उनका सवाल सीधा था. यदि चुनाव आयोग और एसआईआर ही कांग्रेस की हार के लिए जिम्मेदार हैं, तो उन राज्यों में पार्टी की लगातार कमजोरी की वजह क्या है, जहां वह वर्षों से सत्ता में नहीं लौट सकी है? अमित शाह का कहना था कि कांग्रेस को अपनी चुनावी विफलताओं के कारणों पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए.

अमित शाह के बयान के बाद कांग्रेस नेताओं ने अलग-अलग मुद्दे उठाए. जयराम रमेश ने सवाल किया कि कितने घुसपैठियों की पहचान की गई, कितनों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए और कितनों को देश से बाहर भेजा गया. पवन खेड़ा ने जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल की तैनाती पर आपत्ति जताई. वहीं, केसी वेणुगोपाल ने शाह के बयान को अगले चुनाव के परिणाम की अग्रिम घोषणा बताते हुए भाजपा पर चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगाया.

कांग्रेस नेताओं की इन प्रतिक्रियाओं के बीच पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर मूल बहस पीछे छूटती दिखाई दी. एसआईआर की प्रक्रिया और मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल उठाना अपनी जगह महत्वपूर्ण है. लेकिन कांग्रेस को यह भी बताना होगा कि जिन राज्यों में वह लंबे समय से सत्ता से बाहर है, वहां अपना जनाधार बढ़ाने के लिए उसने क्या कदम उठाए हैं. अमित शाह की टिप्पणी का मूल संदेश यही था कि विपक्ष को सरकार की आलोचना के साथ अपनी कमजोरियों का आकलन भी करना चाहिए.

चार दशक से बहुमत से दूर कांग्रेस

कांग्रेस को लोकसभा में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किए चार दशक से अधिक समय बीत चुका है. वर्ष 1984 के आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों में पार्टी ने 543 निर्वाचित सीटों में से 404 सीटें जीती थीं. उसके बाद कांग्रेस अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी.

राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1989 और 1991 के लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार वह बहुमत से दूर रही. सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने 2004 और 2009 में उल्लेखनीय वापसी की. कांग्रेस ने 2004 में 145 और 2009 में 206 सीटें जीतीं. सहयोगी दलों के समर्थन से केंद्र में सरकार भी बनाई. हालांकि, इसके बाद पार्टी का चुनावी प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया.

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 44 सीटें जीत सकी. 2019 में उसे 52 सीटें मिलीं, जबकि 2024 में उसकी सीटों की संख्या बढ़कर 99 हो गई. यह सुधार जरूर था, लेकिन पार्टी बहुमत से काफी दूर रही. इन नतीजों से स्पष्ट है कि कांग्रेस की चुनावी चुनौतियां एसआईआर से बहुत पुरानी हैं. इसलिए उसकी लंबी राजनीतिक गिरावट के लिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण को ही जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा.

राज्यों में सिमटता कांग्रेस का जनाधार

कभी देश के बड़े हिस्से में सरकार बनाने वाली कांग्रेस आज कई राज्यों में कमजोर स्थिति का सामना कर रही है. तमिलनाडु में कांग्रेस का अपना मुख्यमंत्री बने छह दशक से अधिक समय हो चुका है. पश्चिम बंगाल में भी पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस वर्षों से अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच सकी है. गुजरात और ओडिशा में भी उसे लंबे समय से सत्ता से बाहर रहना पड़ा है.

हालांकि, हर राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं. कहीं क्षेत्रीय दलों ने अपनी मजबूत जगह बनाई है, तो कहीं भाजपा ने अपना जनाधार बढ़ाया है. कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह इन बदली हुई परिस्थितियों को समझे और उसी के अनुरूप अपनी रणनीति तैयार करे. पुराने राजनीतिक गौरव की याद दिलाने भर से मतदाताओं का भरोसा वापस नहीं पाया जा सकता. इसके लिए मजबूत संगठन, प्रभावी स्थानीय नेतृत्व और जनता के बीच निरंतर सक्रियता जरूरी है.

राजनीति केवल प्रदर्शन से नहीं चलती

राजनीतिक विश्लेषक बिक्रम उपाध्याय का मानना है कि अमित शाह ने कांग्रेस को सही नसीहत दी है. दिल्ली में कुछ हजार लोगों की भीड़ जुटा लेने भर से चुनाव नहीं जीते जा सकते. राजनीतिक दलों को गांवों, कस्बों और दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचना पड़ता है. लोगों की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए लगातार काम करना पड़ता है.

यह बात केवल कांग्रेस पर नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों पर लागू होती है. विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं. चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल उठाना भी विपक्ष का अधिकार है. लेकिन राजनीतिक विरोध को जनाधार बढ़ाने के प्रयासों का विकल्प नहीं बनाया जा सकता. किसी भी पार्टी को जनता के बीच लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज करानी पड़ती है.

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह अपनी चुनावी पराजयों से क्या सीख रही है. क्या उसका संगठन कमजोर हुआ है? क्या उसका नेतृत्व मतदाताओं की अपेक्षाओं पर खरा उतर रहा है? क्या उसकी नीतियां नए मतदाताओं को आकर्षित कर पा रही हैं? इन सवालों के जवाब तलाशे बिना पार्टी की राजनीतिक वापसी मुश्किल होगी.

आरोपों के साथ आत्ममंथन भी जरूरी

भाजपा हाल के स्थानीय निकाय और ग्राम समिति चुनावों में अपने प्रदर्शन को जनता के समर्थन के रूप में पेश कर रही है. कांग्रेस को भी अपने चुनावी नतीजों का निष्पक्ष आकलन करना चाहिए. हर चुनाव का परिणाम स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवारों, गठबंधनों और दूसरे राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित होता है. इसलिए नतीजों का विश्लेषण तथ्यों के आधार पर होना चाहिए.

राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती है. उन्हें चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणों के साथ सामने रखना होगा और साथ ही अपनी चुनावी कमजोरियों को स्वीकार कर संगठन में सुधार करना होगा. दोनों काम एक साथ किए जा सकते हैं.

लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को जीत का स्थायी अधिकार नहीं मिलता. जनता का विश्वास उसके कामकाज, नेतृत्व और नीतियों से बनता है. कांग्रेस यदि अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाना चाहती है, तो उसे आरोपों से आगे बढ़कर आत्ममंथन करना होगा. चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना उसका अधिकार है, लेकिन अपनी कमजोरियों को दूर करना उसकी राजनीतिक जरूरत भी है.

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