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Mau News: मऊ के जनपद का एक युवा किसान जो आईटीआई की पढ़ाई करने के बाद पारंपरिक खेती को चुना और आज एक साथ डबल खेती करके अच्छा मुनाफा कमा रहा है. ड्रैगन फूड की खेती के साथ बोरो की खेती कर रहा है और एक साथ डबल खेती करके बेहतर मुनाफा कमा रहा है. पकड़ी बुजुर्ग के युवा किसान अखिलेश मौर्या आईटीआई के बाद खेती कर रहे हैं. 

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मऊ: जनपद का एक युवा किसान जो आईटीआई की पढ़ाई करने के बाद पारंपरिक खेती को चुना और आज एक साथ डबल खेती करके अच्छा मुनाफा कमा रहा है. ड्रैगन फूड की खेती के साथ बोरो की खेती कर रहा है और एक साथ डबल खेती करके बेहतर मुनाफा कमा रहा है. पकड़ी बुजुर्ग के युवा किसान अखिलेश मौर्या आईटीआई के बाद खेती कर रहे हैं.

आज एक साथ ड्रैगन फ्रूट और बर की खेती करके बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं. वह बताते हैं कि उन्हें या आइडिया उद्यान विभाग से मिला और उद्यान विभाग से ही ड्रैगन फ्रूट मिला है. जिसे लाकर वह अपने खेत में लगाए हुए है. हालांकि उन्हें ड्रैगन फुट लगाने के लिए उन्हें पहले पिलर तैयार करना पड़ा जिसकी लागत करीब 600 रुपए आई थी. उसके बाद पिलर के पास वह ड्रैगन फ्रूट का पौधा लगा दिए.

उद्यान विभाग से एक साथ दो खेती करने का मिला आइडिया

अखिलेश बताते हैं कि जब वह ड्रैगन फ्रूट को लगे तो उन्हें लगा कि इससे ड्रैगन फूड को तैयार होने में 18 से 19 महीने लगेंगे फिर उन्हें उद्यान विभाग से ही आईडिया मिला और वह इसी खेत में पिलर पर ही मचान बनाकर बोरो की खेती प्रारंभ कर दिए. जिससे उनका एक साथ डबल मुनाफा हो जाएगा 18 से 19 महीने में ड्रैगन फ्रूट भी तैयार हो जाएगा और उसके बीच वह बोरो के साथ कई और अन्य फसल की भी खेती कर लेंगे. अभिवाद 30 पिलर पर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं और उनका लक्ष्य 100 और पिलर लगाने का है. जून महीने में वह ड्रैगन फूड के साथ बोरो की खेती को प्रारंभ किए हैं.

एक महीने में ही निकल गई फसल की लागत

कई सालों से वह पारंपरिक खेती को कर रहे हैं जिसमें तीन लोग घर के लगे रहते हैं साथ में 4 से 5 लेबर उनके यहां परमानेंट काम करते हैं हालांकि वह 10 बीघा में पूरी खेती कर रहे हैं. लेकिन ड्रैगन फ्रूट और बर की खेती व तीन मांडा में ही कर रहे हैं और उसी से बेहतर कमाई कर रहे हैं. बोरो की खेती करने के लिए वह बताते हैं की सबसे पहले बेड को तैयार किया जाता है और उसमें नर्सरी में तैयार किए गए बोरो के पौधे लगा दिए जाते हैं.

हालांकि उन्हें एक पौधा 10 रुपए का पड़ा था और वह भी पौधों को लगाए थे. उसके बाद मचान विधि से बोरों को ऊपर चढ़ाया जाता है और उसी से हार्वेस्टिंग की जाती है. वर्तमान में बाजार में कीमत बोरो की 70 से 75 रुपए मिल रहा है. इस फसल की खेती करने के लिए उनकी लगभग 15000 रुपए की लागत आई थी जो एक महीने में ही उनकी लागत निकल गई. उनकी इस फसल की हार्वेस्टिंग अगस्त महीने से हो रही है और अक्टूबर लास्ट तक जाएगा.

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Rajneesh Kumar Yadav

Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with News18 Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…

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