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Chandramukhi Bungalow: आंध्र प्रदेश के वेटपालेम में एक विशाल और पुरानी हवेली अपनी रहस्यमयी बनावट और वीरानी के कारण लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. राजमहल जैसी दिखने वाली इस इमारत को स्थानीय लोग ‘चंद्रमुखी बंगला’ कहते हैं. दशकों से बंद इस हवेली की टूटी खिड़कियां, जर्जर दीवारें और भारी ताला लोगों के मन में कई सवाल पैदा करते हैं. आखिर इस बंगले का नाम चंद्रमुखी कैसे पड़ा और क्या है इसकी असली कहानी?
आंध्र प्रदेश. वेटपालेम कस्बे की एक शांत और पुरानी गली से गुजरते हुए अचानक नजर एक बहुमंजिला विशाल इमारत पर जाकर ठहर जाती है. बाहर से देखने पर यह किसी पुराने राजमहल जैसी भव्य दिखती है लेकिन करीब जाने पर चारों तरफ फैला सन्नाटा और दीवारों पर जमी धूल की परतें इसकी वीरामी बयां करती हैं. मुख्य दरवाजे पर लटका भारी-भरकम ताला और खिड़कियों की टूटी जालियां बताती हैं कि इस चौखट के भीतर दशकों से किसी इंसान के कदम नहीं पड़े हैं. स्थानीय लोग इस पुरानी इमारत को सामान्य नाम से नहीं, बल्कि चंद्रमुखी बंगला कहकर पुकारते हैं.
बुजुर्गों और इलाके के बाशिंदों के अनुसार यह इमारत कई पीढ़ियों पुरानी है. सालों पहले यहां कभी चहल-पहल हुआ करती थी, लेकिन समय बीतने के साथ यह वीरान होती चली गई. साल 2005 में जब हॉरर फिल्म चंद्रमुखी आई, तो इस जर्जर और रहस्यमयी इमारत की बनावट को देखकर लोगों ने इसे बोलचाल में वही नाम दे दिया. तब से लेकर आज तक नई पीढ़ी भी इसे इसी नाम से जानती है. इमारत की वास्तुकला आज भी अपने गौरवशाली अतीत की गवाही देती है. पारंपरिक खंभे, नक्काशीदार लकड़ी की बालकनी और ढलवां छत यह दर्शाते हैं कि अपने दौर में यह किसी रसूखदार परिवार का आशियाना रही होगी. लेकिन आज उचित देखरेख और मरम्मत के अभाव में दीवारें दरक रही हैं और प्लास्टर झड़ चुका है.
इलाके के लोगों के बचपन की यादें भी इस इमारत से जुड़ी हुई हैं. शाम ढलते ही इस रास्ते से गुजरने वाले लोग अक्सर अपनी चाल तेज कर लेते हैं, क्योंकि इसका सन्नाटा और खंडहर नुमा ढांचा लोगों के मन में एक अनजाना डर पैदा कर देता है. कई लोग इसे लेकर तरह-तरह की रहस्यमयी कहानियां गढ़ते हैं, तो कुछ इसे सिर्फ एक उपेक्षित ऐतिहासिक धरोहर मानते हैं. वास्तव में, यह बंगला किसी रहस्य से ज्यादा एक ऐतिहासिक विरासत के उपेक्षित होने की कहानी है. अगर समय रहते इसकी सुध ली जाती, तो शायद यह वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना बनी रहती। फिलहाल, भारी ताले के पीछे बंद यह हवेली अपने भीतर बीते दौर के कई अनसुलझे राज और यादें समेटे चुपचाप खड़ी है.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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