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Housing Market : देश के हाउसिंग मार्केट पर किफायती मकान बनाने का दबाव बढ़ रहा है. रियल एस्टेट सेक्टर के सबसे बड़े संगठन क्रेडाई का कहना है कि मकान बनाने की लागत और टैक्स के बोझ की वजह से अब अफॉर्डेबल हाउसिंग सेक्टर काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है. क्रेडाई के अध्यक्ष ने कहा कि सरकार को किफायती मकानों की परिभाषा में बदलाव करना चाहिए.

सस्ते मकान का सपना मुश्किल, डेवलपर्स बोले- इतनी महंगाई में नहीं बना पाएंगे Zoom

डेवलपर्स ने किफायती मकान पर टैक्स का बोझ बढ़ने की बात कही है.

नई दिल्ली. महंगाई के दबाव में अब सस्ते मकान बनाना आसान नहीं रह गया है. रियल एस्टेट उद्योग के शीर्ष संगठन क्रेडाई ने कहा है कि मकान बनाने की बढ़ती लागत और टैक्स के दबाव की वजह से अब अफोर्डेबेल हाउसिंग की डिमांड को पूरा करना आसान नहीं है. क्रेडाई के अध्यक्ष शेखर पटेल ने कहा कि सरकार को अब किफायती मकानों की परिभाषा भी बदलनी होगी. अभी इसकी लिमिट 45 लाख रुपये है, लेकिन मौजूदा महंगाई को देखते हुए यह लिमिट पर्याप्त नहीं है. लिहाजा रियल एस्टेट सेक्टर के लिए अब इस लिमिट के भीतर किफायती मकान बनाना संभव नहीं है.

क्रेडाई के अध्यक्ष ने कहा कि ग्लोबल मार्केट की अनिश्चतता के साथ ही घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों के कारण डेवलपर्स के लिए किफायती मकान बनाना संभव नहीं रह गया है. उन्होंने कहा कि जमीन की कीमत, बढ़ती निर्माण लागत और बिक्री मूल्य के 30-50 फीसदी तक टैक्स की वजह से किफायती आवास बनाना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है. इस परेशानी से उद्योग को बचाने के लिए सरकार को किफायती मकानों की परिभाषा में बदलाव करना चाहिए.

कितना है अभी टैक्स का बोझ
डेवलपर्स अभी केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और नगर निगमों को बिक्री मूल्य का 30 फीसदी से 50 फीसदी तक टैक्स के रूप में भुगतान करते हैं. पटेल ने कहा कि हम इन बाधाओं और चुनौतियों को दूर करने के लिए सरकार के साथ काम कर रहे हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले 6 महीनों में किफायती घरों की सप्लाई और डिमांड को बढ़ावा देने के लिए कुछ नीतिगत पहल की जाएंगी. किफायती आवास की परिभाषा में बदलाव के लिए उद्योग ने डिमांड की है. उन्होंने कहा कि क्रेडाई इस मुद्दे पर सरकार के साथ लगातार जुड़ा हुआ है.

क्या होनी चाहिए किफायती मकान की परिभाषा
पटेल ने कहा कि हम चाहते हैं कि 45 लाख रुपये की सीमा हटा दी जाए. किफायती घरों के लिए मेट्रो शहरों के लिए केवल 60 वर्गमीटर और गैर-मेट्रो शहरों के लिए 90 वर् मीटर की क्षेत्र सीमा होनी चाहिए. इसमें पैसों की सीमा को हटा दिया जाना चाहिए. क्रेडाई के अध्यक्ष ने अफसोस जताया कि आवासीय संपत्तियों की कुल बिक्री में किफायती घरों का हिस्सा घटकर 14 फीसदी रह गया है, जिसकी मुख्य वजह टैक्स और बढ़ती लागत है. उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को किफायती आवास परियोजनाओं के लिए कम टैक्स लगाने पर विचार करना चाहिए.

रेपो रेट बढ़ा तो क्या असर
पटेल ने कहा कि अगर आरबीआई अगली एमपीसी बैठक में रेपो रेट बढ़ाता है तो इसका रियल एस्टेट सेक्टर पर खास असर पड़ेगा. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के कारण नौकरी छूटने के खतरे के बारे में उन्होंने कहा कि उद्योग इस तकनीक को अपना रहा है, क्योंकि यह ऑपरेशनल क्षमता में सुधार लाता है. एआई के कारण नौकरी नहीं छूटेगी, बल्कि त्योहारी सीजन में आवास बाजार के लिए मांग के डिमांड और बढ़ने का अनुमान है.

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Pramod Kumar Tiwari

प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्‍वेस्‍टमेंट टिप्‍स, टैक्‍स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…

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