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BSP Brahmin Strategy: यूपी में 2027 के चुनाव की बिसात अभी से बिछने लगी है. BJP, सपा और कांग्रेस के बीच अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश चल रही है. इसी बीच BSP ने भी अपने टिकटों के जरिए एक खास सियासी संकेत दिया है. हाथरस के बाद खेरागढ़ में ब्राह्मण चेहरे को मैदान में उतारकर मायावती ने फिर ब्राह्मण वोटों की तरफ अपनी नजर का संकेत दिया है. खेरागढ़ से BSP ने नीरज रावत को प्रत्याशी घोषित कर दिया है. तो क्या हाथरस से खेरागढ़ तक ब्राह्मण चेहरों पर दांव किसी बड़े सियासी प्लान का हिस्सा है? क्या मायावती 2027 से पहले BSP की पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को नए अंदाज में आजमाना चाहती हैं? आखिर इन टिकटों के पीछे क्या रणनीति है और 2007 के फॉर्मूले से इसकी कितनी समानता है? आइए, UP 2027: का कहत बा यूपी? के पार्ट 21 में जानें पूरी कहानी समझते हैं.

सादाबाद से खेरागढ़ तक ब्राह्मण चेहरे

मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, BSP ने हाथरस जिले की सादाबाद विधानसभा सीट से डॉ. अविन शर्मा को अपना प्रत्याशी बनाया है. 10 अगस्त को आकाश आनंद ने सादाबाद में चुनावी सभा के दौरान अविन शर्मा के नाम का ऐलान किया था. इसके बाद आगरा की खेरागढ़ विधानसभा सीट से नीरज रावत को BSP ने प्रत्याशी घोषित किया. दोनों सीटों पर ब्राह्मण चेहरों को मैदान में उतारा गया है. खेरागढ़ में नीरज रावत की घोषणा 16 सितंबर को हुई है. BSP ने यहां ब्राह्मण चेहरे पर भरोसा जताया है. इससे पहले पार्टी की ओर से इस सीट पर कई नामों पर चर्चा की खबरें आई थीं, जिनमें नीरज रावत भी शामिल थे.

मायावती खुद ब्राह्मणों की बात कर रहीं

BSP के इन टिकटों को सिर्फ स्थानीय उम्मीदवार चयन के तौर पर देखने के बजाय मायावती के हालिया बयानों के साथ जोड़कर भी देखा जा रहा है. जून 2026 में मायावती ने कहा था कि BSP ने अपर कास्ट, खासकर ब्राह्मण समाज को ध्यान में रखकर उम्मीदवार चुनना शुरू किया है. उन्होंने 2007 के चुनाव का भी जिक्र किया था. मायावती ने मई 2026 में भी 2007 के चुनाव का हवाला देते हुए पार्टी के “सर्वसमाज” वाले पुराने राजनीतिक मॉडल को याद किया था. उनके मुताबिक उस दौर में ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक समूहों की भागीदारी के साथ BSP ने बहुमत की सरकार बनाई थी. यानी ब्राह्मणों को टिकट देना और 2007 का जिक्र, दोनों चीजें इस समय BSP की राजनीतिक भाषा का हिस्सा हैं.

2007 में क्या था BSP का मॉडल?

अब 2007 की कहानी समझना जरूरी है. उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में उस चुनाव में BSP ने 206 सीटें जीती थीं.  उस चुनाव को BSP की दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग के संदर्भ में देखा जाता है. पार्टी ने अपने पारंपरिक दलित आधार के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाई थी. यही सामाजिक गठजोड़ BSP को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने वाली राजनीति की प्रमुख चर्चाओं में रहा है. अब 2027 से पहले मायावती उसी दौर का जिक्र कर रही हैं. ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाने की बात कर रही हैं और शुरुआती टिकटों में भी इस वर्ग के चेहरों को जगह मिल रही है.

क्या पुराना फॉर्मूला नए अंदाज में?

यहीं से 2027 की असली सियासी कहानी शुरू होती है. सवाल यह नहीं है कि BSP ने दो ब्राह्मण चेहरों को टिकट दिया है. सवाल यह है कि क्या पार्टी इसके जरिए अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहती है. BSP का पारंपरिक आधार दलित वोट रहा है. लेकिन सिर्फ एक सामाजिक आधार के सहारे विधानसभा चुनाव में बड़ा विस्तार करना चुनौतीपूर्ण रहा है. ऐसे में ब्राह्मणों को टिकट देना पार्टी की उस कोशिश का हिस्सा हो सकता है, जिसमें वह अपने पुराने सामाजिक गठजोड़ को नए राजनीतिक माहौल में फिर से खड़ा करना चाहती है.

BJP और सपा के बीच ब्राह्मण सियासत

ब्राह्मण वोट को लेकर सिर्फ BSP ही सक्रिय नहीं है. यूपी की दूसरी प्रमुख पार्टियां भी इस सामाजिक समूह तक अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं. समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मण नेताओं के साथ बैठक कर इस समुदाय के बीच अपनी पहुंच और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की रणनीति पर चर्चा की थी. ऐसे में BSP का ब्राह्मण चेहरों को शुरुआती टिकट देना यूपी की बड़ी चुनावी तस्वीर से अलग नहीं है. 2027 से पहले अलग-अलग दल अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.

सादाबाद और खेरागढ़ क्यों अहम?

सादाबाद में अविन शर्मा को टिकट देना BSP के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पहले भी इस सीट से पार्टी के उम्मीदवार रह चुके हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में अविन शर्मा BSP के उम्मीदवार थे और तीसरे स्थान पर रहे थे. उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के मुताबिक उन्हें 32,555 वोट मिले थे. यानी 2027 के लिए पार्टी ने बिल्कुल नए चेहरे की बजाय पहले चुनाव लड़ चुके उम्मीदवार पर दोबारा भरोसा किया है. खेरागढ़ में नीरज रावत के मामले में भी पार्टी ने चुनाव से काफी पहले उम्मीदवार घोषित कर दिया है. BSP की यह रणनीति उम्मीदवारों को लंबे समय तक क्षेत्र में काम करने का मौका देने की कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है. पार्टी नेताओं की ओर से भी समय से पहले उम्मीदवार घोषित करने की बात कही गई है.

असली सोशल इंजीनियरिंग आगे दिखेगी

फिलहाल सादाबाद और खेरागढ़ के टिकट BSP की रणनीति का सिर्फ एक हिस्सा हैं. इन दो सीटों से पूरी चुनावी रणनीति का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. लेकिन इतना जरूर है कि मायावती 2027 से पहले ब्राह्मणों की राजनीतिक हिस्सेदारी की बात खुलकर कर रही हैं. पार्टी उम्मीदवार चयन में भी इस वर्ग के चेहरों को जगह दे रही है और 2007 के सामाजिक गठजोड़ का जिक्र कर रही है. अब आगे देखना होगा कि BSP कितनी और सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारती है. साथ ही दलित, पिछड़े, मुस्लिम और दूसरे सामाजिक समूहों को टिकट में कितना प्रतिनिधित्व मिलता है. तभी यह साफ होगा कि सादाबाद और खेरागढ़ महज दो सीटों के फैसले हैं या 2027 के लिए BSP की बड़ी सामाजिक रणनीति का हिस्सा. यानी कहानी अभी सिर्फ अविन शर्मा और नीरज रावत के टिकट तक सीमित नहीं है. असली सवाल यह है कि क्या मायावती 2007 के दलित-ब्राह्मण समीकरण को 2027 के बदले हुए यूपी में नए अंदाज में आजमाने जा रही हैं. इसका जवाब BSP की आने वाली उम्मीदवार सूची और चुनावी अभियान में ज्यादा साफ होगा.

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