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पश्चिम बंगाल में उपचुनाव से पहले एक बार फिर से सियासत गरमा गई है. इस बार इसकी वजह बीजेपी नहीं है , बल्कि इंडिया गठबंधन के ही दो पार्टनर टीएमसी और कांग्रेस है. बंगाल में होने वाले उपचुनावों के लिए TMC के ममता बनर्जी गुट ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की कोशिश की, लेकिन कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले के कारण यह कोशिश कामयाब नहीं हो सकी. TMC ने नंदीग्राम और रेजीनगर में अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान तब किया, जब कांग्रेस पहले ही अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर चुकी थी.

लेकिन पता चला है कि TMC ने उपचुनावों में तालमेल बिठाने के लिए कांग्रेस से संपर्क किया था. प्रस्ताव यह था कि कांग्रेस नंदीग्राम से चुनाव लड़े और तृणमूल रेजीनगर से. हालांकि, सूत्रों का कहना है कि बंगाल कांग्रेस इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुई क्योंकि वह राज्य में अपना आधार फिर से मजबूत करना चाहती है और अभी गठबंधन करने से यह प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में गठबंधन को लेकर दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया है.

यह दावा तृणमूल के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है जो वर्षों से कहती रही है कि वह पश्चिम बंगाल में अकेले ही भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम है और राज्य में व्यापक चुनावी तालमेल के लिए कांग्रेस की ओर से किए गए प्रयासों को बार-बार खारिज करती रही है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने दावा किया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल खेमे ने करीब 15 दिन पहले नई दिल्ली में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता से संपर्क किया था. उन्होंने प्रस्ताव दिया था कि नंदीग्राम उपचुनाव कांग्रेस लड़े, जबकि रेजीनगर सीट पर तृणमूल चुनाव लड़े.

भट्टाचार्य ने ‘पीटीआई’ से कहा, “प्रस्ताव यह था कि तृणमूल कांग्रेस रेजीनगर से चुनाव लड़ेगी और नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ देगी. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस पर समय मांगा और बाद में प्रदेश के नेताओं से इस प्रस्ताव पर चर्चा की.” उन्होंने कहा, “प्रदेश नेतृत्व का मानना था कि गठबंधन के लिए यह सही समय नहीं है. उचित समय आने पर इस पर विचार किया जा सकता है, लेकिन अभी नहीं. यह सही फैसला है.” कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता सुमन रॉय चौधरी ने भी कहा कि यह प्रस्ताव तृणमूल कांग्रेस की ओर से आया था.

उन्होंने कहा, “जब तृणमूल सत्ता में थी, तब उसने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया था, जब भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना थी. अब जब वह अकेली और पराजित है, तो ऐसा लगता है कि उसे कांग्रेस के महत्व का एहसास हुआ है.” कांग्रेस के एक अन्य नेता ने दावा किया कि नंदीग्राम अब भी तृणमूल के लिए कड़े मुकाबले वाली सीट है और उन्होंने सुझाव दिया कि सीट छोड़ने का प्रस्ताव देना खुद इस बात को दर्शाता है कि पार्टी इस चुनावी चुनौती को किस तरह देख रही है. कांग्रेस नेता ने कहा, “नंदीग्राम एक कठिन सीट है और तृणमूल को पूरा भरोसा है कि वह यहां हार जाएगी। इसी वजह से वह यह सीट कांग्रेस को देने की पेशकश कर रही है.”

हालांकि, तृणमूल ने इस दावे को खारिज कर दिया. कथित प्रस्ताव के बारे में पूछे जाने पर पार्टी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने इस दावे को नकार दिया. तृणमूल के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने इस दावे पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा कोई कदम राज्य में केवल भाजपा के लिए फायदेमंद होगा. कांग्रेस और तृणमूल के अलग-अलग दावों ने पश्चिम बंगाल में पहले से बिखरे विपक्षी समीकरणों को और उलझा दिया है. राष्ट्रीय स्तर पर तृणमूल, कांग्रेस और वाम दल विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के घटक हैं, लेकिन राज्य के चुनावों में वे एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे हैं.

भट्टाचार्य ने कहा, “तृणमूल कहा करती थी कि वह अकेले भाजपा से मुकाबला कर सकती है. अब उसे कांग्रेस की जरूरत क्यों पड़ रही है?” उन्होंने कहा कि तृणमूल के संगठनात्मक संकट और विधानसभा चुनाव में मिली हार ने राजनीतिक समीकरण बदल दिया है. उन्होंने कहा, “भाजपा के हाथों विधानसभा चुनाव में हार और अब तृणमूल के तीन हिस्सों में बंट जाने के बाद ऐसा लगता है कि उसे पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के महत्व का एहसास हुआ है.” प्रमुख विपक्षी दलों में कांग्रेस सबसे पहले उपचुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है. उसने 11 सितंबर को नंदीग्राम से मिलन प्रधान और रेजीनगर से मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी को उम्मीदवार बनाया.

इसके बाद वाम दलों ने अपने उम्मीदवार घोषित किए, जबकि बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल ने बाद में नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया. ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी तृणमूल धड़े ने भी चुनाव मैदान में उतरने की घोषणा की है. इसके बाद भाजपा ने हसीरानी रथ को अपना उम्मीदवार बनाया. पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीट से चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत हासिल की. बाद में उन्होंने भवानीपुर सीट बरकरार रखी और नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया, जिससे वहां उपचुनाव कराना पड़ रहा है.

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