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cricket unique records: क्रिकेट में हर गेंद पर इतिहास बदल सकता है लेकिन साल 1946 में लंदन के ‘द ओवल’ मैदान पर जो हुआ, उसने क्रिकेट के सारे समीकरण ही बदल दिए. यह कहानी है भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे असंभव और ऐतिहासिक साझेदारी की, जिसने दुनिया को यह सिखाया कि जब तक आखिरी विकेट क्रीज पर है, तब तक हार नहीं मानी जा सकती.
1946 में चंदू सरवटे और शूटे बनर्जी ने नंबर 10-11 पर खेलते हुए लगाया था शतक
ये बात तो सभी जानते है कि क्रिकेट में हर गेंद पर इतिहास बदल सकता है लेकिन साल 1946 में लंदन के ‘द ओवल’ मैदान पर जो हुआ, उसने क्रिकेट के सारे समीकरण ही बदल दिए. यह कहानी है भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे असंभव और ऐतिहासिक साझेदारी की, जिसने दुनिया को यह सिखाया कि जब तक आखिरी विकेट क्रीज पर है, तब तक हार नहीं मानी जा सकती.
मैदान पर निराशा और दर्शकों की औपचारिकता
यह मुकाबला 1946 में भारत और सरे के बीच खेला जा रहा था. भारतीय टीम संघर्ष कर रही थी और महज 205 रनों पर अपने 9 विकेट गंवा चुकी थी. मैदान पर मौजूद दर्शकों और विरोधी टीम के लिए यह मैच बस एक ‘औपचारिकता’ मात्र रह गया था. हर किसी को लग रहा था कि भारतीय पारी कुछ ही पलों में सिमट जाएगी. तभी मैदान पर एंट्री होती है दो ऐसे खिलाड़ियों की, जिनसे किसी को रन बनाने की उम्मीद नहीं थी. एक थे लेग स्पिनर चंदू सरवटे और दूसरे थे मीडियम पेसर शूट बनर्जी. दोनों ही विशुद्ध रूप से गेंदबाज थे, जिन्हें आखिरी विकेट के रूप में केवल क्रीज पर टिकने की जिम्मेदारी मिली थी.
जब गेंदबाजों ने रचा ‘अविश्वसनीय महारिकॉर्ड
क्रीज पर आते ही इन दोनों खिलाड़ियों ने अपने जज्बे, हिम्मत और बेखौफ बल्लेबाजी से सरे के गेंदबाजों की धज्जियां उड़ानी शुरू कर दीं. जिसे लोग खेल का अंत समझ रहे थे, वह दरअसल क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी शुरुआत थी. चंदू सरवटे ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए 124 रन बनाए. शूट बनर्जी ने भी पीछे न रहते हुए ताबड़तोड़ 121 रन ठोक दिए. दोनों ने मिलकर 10वें विकेट के लिए रिकॉर्ड तोड़ 249 रनों की साझेदारी की. यह क्रिकेट इतिहास का पहला ऐसा मौका था जब नंबर 10 और नंबर 11 के बल्लेबाजों ने एक ही पारी में शतक बनाए हों. इस चमत्कारी साझेदारी के दम पर भारत ने न केवल मैच में वापसी की, बल्कि अंत में इस मुकाबले को 9 विकेट से अपने नाम किया.
80 साल तक अजेय रहा यह रिकॉर्ड
यह रिकॉर्ड इतना अद्भुत और अकल्पनीय था कि इसे टूटना तो दूर, इसके बराबर पहुंचना भी नामुमकिन लग रहा था. यह रिकॉर्ड लगभग 80 सालों तक अटूट रहा. इस जादुई आंकड़े की बराबरी आखिरकार साल 2025 में मुंबई के तनुश कोटियन और तुषार देशपांडे की जोड़ी ने रणजी ट्रॉफी के दौरान की. भले ही आधुनिक क्रिकेट में कई बड़े रिकॉर्ड बनते और टूटते रहते हैं, लेकिन 1946 की सर्दियों में शूट बनर्जी और चंदू सरवटे द्वारा लिखी गई यह दास्तान आज भी क्रिकेट गलियारों में ‘जज्बे और वीरता’ की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है.
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राजीव मिश्रा, खेल पत्रकारिता में एक जाना पहचाना चेहरा है जो अपनी बेबाक विशलेषण के लिए जाने जाते है. वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स …
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