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सत्य निकेतन में पी-14 इमारत के ढहने के बाद एमसीडी की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। करीब 55 वर्ग गज क्षेत्रफल में बनी इस इमारत में बेसमेंट से लेकर भूतल और चौथी मंजिल तक निर्माण था। बताया जा रहा है कि भवन का निर्माण 1990 के दशक में हुआ था। हादसे के समय बेसमेंट में काम चल रहा था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भवन में बेसमेंट का काम चलने की जानकारी एमसीडी के भवन विभाग को क्यों नहीं हुई?
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Delhi building collapse
– फोटो : PTI
रिकॉर्ड में न बुकिंग न सीलिंग और न ही निर्माण की शिकायत
एमसीडी का कहना है कि उसके उपलब्ध रिकॉर्ड में इस संपत्ति की बुकिंग या सीलिंग का कोई रिकॉर्ड नहीं है। उसके अनुसार भवन में किसी तरह के निर्माण कार्य को लेकर कोई शिकायत भी प्राप्त नहीं हुई थी। लेकिन हादसे के बाद बेसमेंट में काम होने की जानकारी सामने आने से एमसीडी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा हो गया है।
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– फोटो : PTI
एमसीडी की निगरानी व्यवस्था पर सवाल
आखिर बिना किसी शिकायत के भी क्या एमसीडी का भवन विभाग अपने स्तर पर निर्माण गतिविधियों की निगरानी नहीं करता? खासकर तब, जब यह इलाका घनी आबादी वाला है और पुरानी इमारतों से जुड़ा है। यदि बेसमेंट में निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा था तो क्या मौके पर एमसीडी के अधिकारियों या कनिष्ठ अभियंताओं ने कभी निरीक्षण किया? क्या क्षेत्र में नियमित गश्त और निर्माण गतिविधियों की निगरानी की व्यवस्था है? और यदि किसी तरह का अनधिकृत या नियम विरुद्ध काम चल रहा था तो उसे रोकने के लिए एमसीडी ने क्या कार्रवाई की?
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– फोटो : PTI
शिकायत नहीं मिली तो निगरानी किसकी जिम्मेदारी?
एमसीडी का शिकायत नहीं मिलने तर्क हादसे के बाद अपने आप में बड़ा सवाल बन गया है। शिकायत नहीं मिलना क्या एमसीडी को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है? भवन विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने तक सीमित है या क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों पर स्वतः निगरानी रखना भी उनकी जिम्मेदारी है? सवाल उठ रहा है कि आखिर बेसमेंट में काम कब शुरू हुआ, किस तरह का काम किया जा रहा था और क्या इसके लिए कोई अनुमति ली गई थी। साथ ही एमसीडी के पास इस भवन का स्वीकृत नक्शा और उसके अनुरूप निर्माण का रिकॉर्ड क्या है।
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पुराना भवन, नया निर्माण और निगरानी पर सवाल
पी-14 का निर्माण 1990 के दशक में हुआ बताया जा रहा है। यानी हादसे के समय यह कोई नई इमारत नहीं थी। ऐसे में पुराने भवन में बेसमेंट समेत अतिरिक्त निर्माण या संरचनात्मक बदलाव की निगरानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। एमसीडी हर साल मानसून से पहले जर्जर और खतरनाक इमारतों का सर्वे करती है। इसके बावजूद यदि किसी पुराने बहुमंजिला भवन में काम चलता रहा और उसके रिकॉर्ड में न कोई शिकायत दर्ज हुई, न बुकिंग और न सीलिंग की कार्रवाई, तो सर्वे और निगरानी की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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