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उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद की ओमप्रकाश की कहानी अलग है बचपन में भाभी का दूध पीकर बड़ा हुए और पिता का फर्ज भाई ने निभाया, फिर संघर्ष किया और ग्राम पंचायत अधिकारी बने. अपने पूरे फर्ज का निर्वहन किया सर्विस से रिटायर होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारे आज भी कर रहे संघर्ष और पेंशन के सहारे चला रहे अपना जीवन, जाने क्या है ओमप्रकाश की कहानी उन्हीं के जुबानी.

मऊः उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद की ओमप्रकाश की कहानी अलग है. बचपन में ही ओम प्रकाश की मां का देहांत हो गया. इसके बाद उनका पालन-पोषण, उनके भाई और भाभी ने किया. फिर अपने पिता के सपनों को सच करने के लिए संघर्ष करना शुरू किया. पिता का सपना था कि उनका बेटा सरकारी अधिकारी बने, बस वह जुट गए उनके सपनों का पूरा करने के लिए. अब ओम प्रकाश रिटायर हो चुके हैं और पेंशन के जरिए अपना जीवन यापन कर रहे हैं. जाने क्या हैं ओमप्रकाश की कहानी, उन्हीं की जुबानी.

पिता का सपना पूरा करने के लिए बने ग्राम पंचायत अधिकारी
लोकल 18 से बात करते हुए ओमप्रकाश बताते हैं कि बचपन में ही उनकी माता का निधन हो गया. फिर भाभी ने उनका पालन-पोषण शुरू किया. पिताजी जीवित थे. लेकिन पिता का फर्ज भाई ने निभाया. लेकिन पिता का सपना था कि उनका बेटा कोई सरकारी अधिकारी बने. इसके लिए वह संघर्ष करना शुरू कर दिए और ग्राम पंचायत अधिकारी पद पर कार्यरत हो गए. हालांकि ग्राम पंचायत अधिकारी बनने तक का सफर उनका काफी कठिन रहा. ग्राम पंचायत अधिकारी पद पर चयन होने के बाद भी 4 साल तक उनकी कही पोस्टिंग नहीं कराई गई. काफी संघर्ष करने के बाद उनका पहली बार 4 जून 1986 सन में बस्ती जिले के खुदरहा गांव में पोस्टिंग हुई. उसके बाद लगातार उनका ट्रांसफर हुआ.

परीक्षा पास होने के बाद भी 4 वर्षों तक कहीं नहीं मिली पोस्टिंग
ओमप्रकाश बताते हैं कि आजमगढ़ से बीएससी एजी सन 1982 में किया और इस समय ग्राम पंचायत अधिकारी का वांट निकाला और वह परीक्षा दिए. परीक्षा में वह पास हो गए. फिर उनको गाजीपुर ट्रेनिंग सेंटर में ट्रेनिंग कराई गई. हालांकि सन 1982 में ट्रेनिंग पूरा करने के बाद उन्हें कहीं खाली जगह नहीं मिला. इस वजह से पोस्टिंग नहीं मिली. परीक्षा में पास होने के बाद भी 4 वर्षों तक वह एक छोटी सी दुकान पर बैठकर अपना जीवन यापन कर रहे थे और अन्य परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे. लेकिन सन 1986 में उन्हें पहली पोस्टिंग दे दी गई. तब से कभी आजमगढ़ तो कभी गाजीपुर में उनकी ड्यूटी लगाई गई. हालांकि नौकरी करने में 4 से 5 साल तो लग गए. लेकिन कभी वह हार नहीं माने.

35000 रुपये मिल रहा पेंशन उसी के सहारे चल रहा जीवन
1989 में फिर उनका चयन आजमगढ़ जनपद में हो गया और 15 साल नौकरी करने के बाद वहां से रिटायर हो गए. रिटायर के बाद उन्हें 30 से 35000 रुपए पेंशन के रूप में मिलता है. लेकिन बढ़ती महंगाई और जरूरत के समान से वह कम हो जाता है. बढ़ती महंगाई को देखते हुए सिर्फ पेंशन से काम नहीं चल पाता था. इस वजह से फिर वह बंद दुकान को शुरू कर दिए और आज कुछ कमाई दुकान से हो जाती है और कुछ पेंशन आ जाता है. उसी के सहारे किसी तरह से जीवन बिता रहे हैं. हालांकि की वह बताते हैं की नौकरी के दौरान कुछ बात अलग थी. आज पछतावा होता है कि काश अभी मैं नौकरी कर रहा होता, तो जो समस्याएं होती हैं, वह समस्या दूर होती. वर्तमान में महंगाई काफी अधिक हो गई है और कमाई कम हो गई है, जिसके वजह से बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

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Prashant RaiChief Sub Editor

Prashant Rai is a digital journalist with over 9 years of experience in Hindi journalism, specializing in politics, crime, hyper-local reporting, and viral news. He currently serves as Chief Sub Editor at News1…

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