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Gorakhpur News: गोरखपुर विश्वविद्यालय में चल रहे कृषि शोध किसानों के लिए नई जानकारी और विकल्प तैयार कर रहे हैं. जरूरत है कि इन शोधों की जानकारी किसानों तक आसान भाषा में पहुंचे, ताकि किसान अपने खेत, मिट्टी और मौसम के अनुसार सही तकनीक चुन सकें और खेती को ज्यादा लाभकारी बना सकें.

गोरखपुर: किसान के लिए खेती सिर्फ बीज डालने और फसल काटने तक सीमित नहीं है, सही किस्म का चुनाव, मिट्टी के अनुसार पोषक तत्व, मौसम के हिसाब से खेती और नई तकनीक का इस्तेमाल फसल की लागत और उत्पादन दोनों को प्रभावित करता है. ऐसे में कृषि विश्वविद्यालयों और संस्थानों में होने वाला शोध किसानों के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. गोरखपुर विश्वविद्यालय में भी कृषि से जुड़े कई विषयों पर लगातार शोध किया जा रहा है. किसानों को अक्सर फसल की नई किस्मों और खेती के आधुनिक तरीकों की पूरी जानकारी नहीं होती. ऐसे में विश्वविद्यालय में होने वाला शोध उनके लिए नई संभावनाएं खोलता है.

‘दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कृषि एवं प्राकृतिक विज्ञान संस्थान में कृषि विज्ञान से जुड़े अलग-अलग विभाग काम कर रहे हैं. विश्वविद्यालय के एग्रोनॉमी विभाग का फोकस पोषक तत्व प्रबंधन, फसल विविधीकरण, खरपतवार प्रबंधन, प्रिसिजन फार्मिंग और जैविक खेती जैसे विषयों पर है.

गेहूं और धान की खेती पर भी रिसर्च
किसानों के लिए गेहूं और धान सबसे महत्वपूर्ण फसलों में शामिल हैं. विश्वविद्यालय में गेहूं की बुवाई की विधि और नाइट्रोजन प्रबंधन के प्रभाव पर शोध प्रकाशित हो चुका है. वहीं धान की अलग-अलग किस्मों, रोपाई के समय और उत्पादन से जुड़े विषयों पर भी अध्ययन किया गया है. विश्वविद्यालय के शोध में धान की लोकप्रिय किस्मों में रोग और जलभराव जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए प्रजनन तकनीकों पर भी काम सामने आया है.

काला गेहूं और प्राकृतिक तरीका
किसानों के बीच अलग पहचान बनाने वाली फसलों को लेकर भी रुचि बढ़ रही है. काले गेहूं जैसी फसलों के साथ जैविक और प्राकृतिक इनपुट के इस्तेमाल को लेकर होने वाले प्रयोग किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं. इसी तरह विश्वविद्यालय में कालानमक चावल को लेकर प्राकृतिक खेती का प्रदर्शनात्मक शोध भी चल रहा है.

सब्जियों और नर्सरी से भी बढ़ सकती है आमदनी
खेती में सिर्फ अनाज ही नहीं, बल्कि सब्जियों और बागवानी फसलों की नई तकनीक भी किसानों की आय बढ़ाने का जरिया बन सकती है. नर्सरी तकनीक, संरक्षित खेती और फसल विविधीकरण जैसे क्षेत्रों में शोध का सीधा फायदा किसानों को बेहतर उत्पादन तकनीक समझने में मिल सकता है. किसानों के लिए किसी शोध की असली सफलता तब मानी जाएगी, जब उसका परिणाम प्रयोगशाला से निकलकर खेत तक पहुंचे.

नई किस्म, बेहतर खाद प्रबंधन, कम लागत वाली तकनीक या प्राकृतिक खेती का तरीका अगर किसान अपनाकर उत्पादन और आमदनी में सुधार कर सके, तो शोध का उद्देश्य पूरा होता है. गोरखपुर विश्वविद्यालय में चल रहे कृषि शोध इसी दिशा में किसानों के लिए नई जानकारी और विकल्प तैयार कर रहे हैं. जरूरत है कि इन शोधों की जानकारी किसानों तक आसान भाषा में पहुंचे, ताकि किसान अपने खेत, मिट्टी और मौसम के अनुसार सही तकनीक चुन सकें और खेती को ज्यादा लाभकारी बना सकें.

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आर्यन सेठ

आर्यन सेठ, News18 Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली से साल 2024 में…

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