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उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक कड़वा और दिलचस्प दस्तूर रहा है यहां जब भी कोई बड़ा चुनाव करीब आता है, धर्म और सियासत का मेल नए मुकाम पर पहुंच जाता है. कभी जिस राम नाम के सहारे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अपनी वैचारिक और राजनीतिक जड़ों को सींचती आई थी, आज वही ‘राम’ और मंदिर का ‘चढ़ावा’ विपक्ष के हाथ का सबसे बड़ा सियासी हथियार बन गया है. सालों तक बीजेपी पर ‘राम नाम पर राजनीति’ का आरोप लगाने वाली समाजवादी पार्टी आज खुद राम मंदिर, रामधन और धार्मिक अस्मिता के मुद्दों पर बीजेपी को घेर रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव का यह नया ‘आक्रामक अंदाज’ 2027 के चुनावों में मास्टरस्ट्रोक साबित होगा, या फिर यह एक ऐसा सियासी ‘सेल्फ गोल’ है जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलने जा रहा है?

चढ़े हुए ‘रामधन’ पर महाभारत

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और चंदे में धांधली को लेकर उठा तूफान अब सीधे यूपी की चुनावी चौसर पर आ चुका है. अखिलेश यादव इस मुद्दे पर पूरी तरह से हमलावर हैं. उनका साफ तौर पर कहना है कि ‘श्रद्धा और आस्था से खिलवाड़ करने वाली बीजेपी को रामधन की चोरी के लिए न तो ऊपर वाला माफ करेगा और न ही जनता.’ मंदिर ट्रस्ट के नए सीईओ की नियुक्ति से लेकर छोटे कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक, अखिलेश यादव हर मोड़ पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. उनका तर्क है कि अगर बड़े लोगों को क्लीन चिट दे दी गई तो सिर्फ छोटे कर्मचारियों को ही क्यों जेल भेजा जा रहा है?

इतना ही नहीं, अखिलेश लगातार यह नैरेटिव बनाने में जुटे हैं कि अयोध्या के विकास के नाम पर जमीनों का बड़ा घोटाला हुआ है, स्थानीय लोगों को उचित मुआवजा नहीं मिला और इसी का नतीजा था कि बीजेपी अयोध्या की लोकसभा सीट हार गई.

पोस्टर विवाद:  ‘ब्राह्मण बनाम तुष्टीकरण’

अखिलेश यादव का हमला अपनी जगह पर था, लेकिन लखनऊ में समाजवादी पार्टी दफ्तर के बाहर लगे एक पोस्टर ने पूरी बहस का रुख ही मोड़ दिया. इस पोस्टर में भगवान श्रीराम अत्यधिक क्रोधित मुद्रा में हाथ में धनुष-बाण लिए दिखते हैं और उनके सामने पुजारी जैसी वेशभूषा में कुछ लोग हाथ जोड़े खड़े हैं. हालांकि, पोस्टर पर न तो किसी का नाम है और न ही लगाने वाले की पहचान, लेकिन राजनीति में ‘बिन कहे’ संदेश पहुंच जाना ही सबसे बड़ा खेल होता है.

बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने इस पोस्टर की मंशा को भांपने में एक सेकंड की भी देरी नहीं की. उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘ब्राह्मण समाज का अपमान’ और ‘मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति’ का हिस्सा करार दे दिया. यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने सपा पर पलटवार करते हुए कहा- ‘समाजवादी पार्टी लगातार सनातन समाज का अपमान कर रही है और चुनावी मौसम आते ही ऐसे ‘सीजनल’ नेता मैदान में कूद पड़े हैं.’

क्या चढ़ावे के नाम पर एक पूरी बिरादरी कटघरे में है?

यहां सबसे बड़ा और संजीदा सवाल यह उठता है कि क्या चंदे या चढ़ावे में गड़बड़ी का हिसाब मांगते-मांगते पूरी पुजारी परंपरा या ब्राह्मण समाज को निशाना बनाना जायज है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या कोई भी धार्मिक स्थल हो दान की एक-एक पाई का हिसाब पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए. अगर वित्तीय अपराध हुआ है, तो जांच निष्पक्ष हो और दोषी चाहे जितना बड़ा हो, उस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए.

लेकिन जब बिना किसी पुख्ता तफ्तीश या अदालती फैसले के, पोस्टरों और नारों के जरिए एक वर्ग विशेष या पुजारियों की छवि को नकारात्मक रूप से चित्रित किया जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है क्या यह PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का दायरा बढ़ाने की कोशिश है, या फिर राजनीतिक अधीरता?

‘सेल्फ गोल’ या चुनावी बढ़त?

अखिलेश यादव आज जिस राह पर चल रहे हैं, उसमें जोखिम बहुत बड़ा है:

एक तरफ जहां चढ़ावे में कथित चोरी का मुद्दा उठाकर सपा, बीजेपी के ‘सुशासन और शुचिता’ के दावे पर चोट करना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ पोस्टर और प्रतीकों की इस लड़ाई में अगर ब्राह्मण समाज या सनातनी वर्ग आहत महसूस करता है, तो यह बीजेपी के लिए एक आसान ‘ध्रुवीकरण’ का रास्ता खोल देगा.

एक तरफ सपा अपने मंचों से प्रबुद्ध सम्मेलनों और पंडितों को साधने की बातें करती है, वहीं दूसरी तरफ समर्थकों के ऐसे पोस्टर उस पूरी कवायद पर पानी फेर देते हैं. किसी एक वर्ग को ‘फॉर ग्रांटेड’ लेना चुनाव में भारी पड़ सकता है.

2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, बीजेपी इस मुद्दे को ‘सनातन के अपमान’ और ‘तुष्टीकरण की पुरानी नीति’ से जोड़कर अपने पक्ष में मोड़ने की पूरी रणनीति बनाएगी. वहीं विपक्ष को लगता है कि ‘रामधन’ में हुई कथित हेराफेरी का गुस्सा जनता के मन में बीजेपी के प्रति असंतोष पैदा करेगा.

पर सच यही है कि लोकतंत्र में जनता बहुत बारीक नजर से हर एक कदम को देखती है. वित्तीय अनियमितता की जांच की मांग करना विपक्ष का धर्म है, लेकिन जब मांग की आड़ में पूरे सामाजिक वर्ग या आस्था के प्रतीकों को सियासी औजार बनाया जाता है, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि निशाना दुश्मन पर लगा है या अपने ही पैर पर. देखना यह होगा कि 133 करोड़ की आबादी वाले इस सूबे में ‘रामधन’ का यह जिन्न किस पार्टी के लिए वरदान बनता है और किसके लिए चुनावी नुकसान का सबब.

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