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Hyderabad News: तेलंगाना की शुष्क और पथरीली जमीन पर सीताफल की खेती किसानों के लिए कम लागत में बड़ी कमाई का जरिया बन रही है. कम पानी में तैयार होने वाली उन्नत किस्मों से किसान एक एकड़ में ₹2 से ₹3 लाख तक का मुनाफा कमा रहे हैं.
हैदराबाद. तेलंगाना की शुष्क जलवायु और पथरीली मिट्टी में अब एक ऐसा फल किसानों की तकदीर बदल रहा है, जिसे कभी केवल जंगलों और बाड़ों का फल समझा जाता था. बात हो रही है सीताफल यानी कस्टर्ड एप्पल की, देश में महाराष्ट्र के बाद अब तेलंगाना के किसान भी इसकी व्यावसायिक खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. कम लागत, न्यूनतम पानी और बंदरों-मवेशियों के नुकसान से मुक्त होने के कारण यह राज्य के शुष्क क्षेत्रों के लिए सबसे मुफीद फसल साबित हो रही है.
तेलंगाना राज्य के महबूबनगर, रंगारेड्डी, विकराबाद, नलगोंडा, मेंडक और नागरकुरनूल जिलों में सीताफल की सबसे अधिक पैदावार होती है. महबूबनगर और विकराबाद के पहाड़ी व शुष्क इलाकों में यह प्राकृतिक रूप से भी बहुतायत में उगता है. अब किसान परंपरागत देसी किस्मों के बजाय उन्नत किस्मों जैसे बालानगर, एनएमके-1 (गोल्डन) और आर्का सहन की सघन बागवानी कर रहे हैं.
कब और कैसे करें खेती?
तेलंगाना में सीताफल की बागवानी के लिए जून से सितंबर का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. यह लाल बलुई, पथरीली या हल्की दोमट मिट्टी में आसानी से उग जाता है, बस खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए. सितंबर में हमेशा नर्सरी से तैयार मजबूत ग्राफ्टेड पौधा या पॉलीबैग वाला पौधा ही लगाएं, सीधे बीज बोने से बचें. खेत में 5×5 मीटर या सघन बागवानी के तहत 4×4 मीटर की दूरी पर 2×2 फीट के गड्ढे खोदकर गोबर की खाद डाली जाती है. अगस्त की बारिश के साथ ही कलमी पौधे लगाए जाते हैं. यह सूखा-सहनशील पौधा है, ड्रिप इरिगेशन के जरिए बेहद कम पानी में भी यह अच्छी उपज देता है.
पौधे लगाने के 2 से 3 साल बाद फल आने लगते हैं. मानसून में फूल आने के बाद से नवंबर से दिसंबर के बीच फल पककर तैयार हो जाते हैं. इस दौरान हैदराबाद की फल मंडियों और मोअज्जम जाही मार्केट में विकराबाद व महबूबनगर के मीठे सीताफल की भारी मांग रहती है. आइसक्रीम और पल्प इंडस्ट्री में बढ़ते उपयोग से किसानों को एक एकड़ से 2 से 3 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा मिल रहा है.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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