1989 में अग्नि टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर के पहले परीक्षण से शुरू हुई भारत की मिसाइल यात्रा आज अग्नि-5, मिशन दिव्यास्त्र और MIRV तकनीक तक पहुंच चुकी है. जल्द ही अग्नि-6 मिसाइल दस्तक देने के लिए तैयार है. भारत को एलिट क्लब में शामिल कराने वाली अग्नि मिसाइल का सफर किन-किन मुश्किलों के साथ गुजरा, इसने कब-कौन सी सफलता हासिल की. इस सफलता का असर दुनिया के दूसरे देशों में क्या रहा… जैसे तमाम पहलुओं को जानने के लिए पढ़े अग्नि मिसाइल का 37 साल का पूरा सफर.
1989 के अग्नि टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर से मिशन दिव्यास्त्र तक सफर डीआरडीओ के लिए चुनौतियों से भरा रहा है.
दरअसल, यह भारत के पहले ‘अग्नि टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर’ की पहली उड़ान थी. उस दिन समंदर किनारे सिर्फ एक मिसाइल नहीं उड़ी थी, बल्कि मिलिट्री सुपरपावर की तरफ बढ़ते भारत की पहली पहली हुंकार थी. भारत की इस हुंकार ने न केवल बीजिंग और इस्लामाबाद के डिफेंस हेडक्वार्टर्स, बल्कि वॉशिंगटन के पेंटागन को भी बेचैन कर दिया है. बेचैनी इसलिए भी थी, क्योंकि कल तक जो भारत छोटे-छोटे हथियारों के लिए दूसरों के मुंह ताकता था, आज उसने अपनी खुद की न्यूक्लियर बैलेस्टिक मिसाइल ‘अग्नि’ बना ली थी.
तो चलिए आज आपको बताते हैं 37 साल पहले शुरू हुई अग्नि मिसाइल के सफर की वह कहानी, जिसमें भारत ने पाबंदियों की बेड़ियों को तोड़कर टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर से लेकर अग्नि-6 तक का सफर कैसे पूरा किया.
अपमान, पाबंदियां और कलाम साहब की जिद से शुरू हुआ सफर
- कहानी की शुरुआत होती है 1983 से, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के मिसाइल प्रोग्राम की कमान ‘मिसाइल मैन’ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों में सौंपी. प्रोजेक्ट का नाम था इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP). उस दौर में दुनिया का सीधा नियम था कि जिसके पास ताकत है, वही राज करेगा.
- मिसाइल और स्पेस की एडवांस टेक्नोलॉजी न तो कोई देश पैसे से बेचता था और न ही दोस्ती में देता था. भारत को रोकने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों ने मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम का कड़ा पहरा बैठा रखा था. अमेरिका और यूरोप सहित तमाम देशों की यही कोशिश थी कि भारत कभी लंबी दूरी की मिसाइल नहीं बना सके.
- लेकिन डॉ. कलाम और उनकी साइंटिस्ट टीम ने इसे एक चैलेंज की तरह लिया. 1989 में जब अग्नि का पहला टेस्ट हुआ, तो वह कोई पूरी तरह तैयार मिसाइल नहीं थी, बल्कि एक ‘टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर’ (अग्नि-टीडी) थी. इसका मकसद यह चेक करना था कि क्या भारत ऐसा रॉकेट बना सकता है जो स्पेस में जाकर वापस धरती के एटमॉस्फेयर में घुसे और जलकर खाक न हो?
- यह दो स्टेज वाला रॉकेट था. पहले स्टेज में भारत के एसएलवी-3 स्पेस रॉकेट का सॉलिड फ्यूल मोटर था और दूसरे स्टेज में पृथ्वी मिसाइल का लिक्विड इंजन. जब इस मिसाइल ने 1000 किमी का सफर तय कर टारगेट पर सटीक निशाना लगाया, तो पूरी दुनिया सन्न रह गई. अमेरिका और यूरोप ने तुरंत भारत पर कड़े टेक्नोलॉजिकल बैन लगा दिए.
- 1989 के टेस्ट के बाद लगभग पूरी दुनिया ने भारत के लिए दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए. कंप्यूटर चिप्स, स्पेशल मैरेजिंग स्टील, रिंग लेजर जायरोस्कोप और कार्बन कंपोजिट जैसे सैकड़ों क्रिटिकल पार्ट्स की सप्लाई रोक दी गई. अमेरिका, यूरोप सहित सभी देशों का एक ही मंसूबा था कि भारतीय मिसाइल प्रोग्राम किसी भी तरह से आगे ना बढ़ पाए.
- लेकिन डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों ने इस प्रतिबंध को नए चैलेंज की तरह लिया. डीआरडीओ ने देश की टॉप यूनिवर्सिटीज, आईआईटी और प्राइवेट कंपनियों को अपने इस प्रोग्राम के साथ जोड़ लिया. जो मैरेजिंग स्टील बाहर से नहीं मिला, उसे भारत की लैब्स में खुद ढाला गया.
- जब स्पेशल कार्बन फाइबर अमेरिका ने देने से मना किया, उसे भारत ने अपनी फैक्ट्रियों में बना डाला. नेविगेशन सिस्टम, ऑन-बोर्ड कंप्यूटर और सेंसर जैसे तमाम कंपोनेंट्स को पूरी तरह से भारत में तैयार किया गया. यहीं से शुरू हुआ अग्नि मिसाइल का वो फैमिली ट्री, जिसने आने वाले दशकों में भारत के डिफेंस को पूरी तरह फूलप्रूफ बना दिया.
अग्नि फैमिली के ब्रह्मास्त्र और उनकी ताकत
- अग्नि-1: 1989 का टेस्ट सिर्फ एक साइंस प्रोजेक्ट जैसा था, लेकिन 1999 के करगिल युद्ध के दौरान भारत ने एक ऐसी मिसाइल की जरूरत महसूस की, जो पाकिस्तान जैसे पड़ोसी के नापाक मंसूबों को पलक झपकते कुचल सके. उस दौर में भारत को एक ऐसी मिसाइल चाहिए जो मिनटों में लोड होकर फायर हो सके. महज तीन साल के अंतराल में भारत ने अग्नि-1 के तौर पर एक ऐसी ही मिसाइल तैयार कर ली. 25 जनवरी 2002 को इस मिसाइल का पहला टेस्ट हुआ. यह करीब 15 मीटर लंबी, 12 टन वजनी और पूरी तरह ‘सिंगल-स्टेज सॉलिड फ्यूल’ मिसाइल थी. यह मिसाइल करीब 700 से 900 किमी दूर मौजूद अपने टारगेट को भेद सकती थी. अपग्रेडेड वर्जन इसके जद में 1,200 किमी का दायरा आ गया. यह मिसाइल करीब 1000 किलो का न्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने में सक्षम थी. इसे कहीं भी ले जाकर दागा जा सकता है. 2007 में यह सेना की स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (एसएफसी) में शामिल हुई और इसने पाकिस्तान के पूरे इलाके को भारत की सीधी जद में ला दिया था.
- अग्नि-2: भारत के सामने सामरिक चुनौती के तौर पर हमेशा से दो ही देश रहे हैं, पहला पाकिस्तान और दूसरा चीन. चीन से मिल रही चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारत को ज्यादा दूरी तक मार करने वाली मिसाइल की दरकार थी. इस जरूरत को पूरा करने के लिए डीआरडीओ अग्नि-टीडी के बाद भारत ने अग्नि-2 के प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया. डीआरडीओ के वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई और 11 अप्रैल 1999 को इसका पहला टेस्ट किया गया. 21 मीटर लंबी, 16 टन वजनी और 2-स्टेज सॉलिड प्रोपेलेंट वाली यह मिसाइल अपने साथ 1000 किलो तक का पेलोड करीब 2500 किमी तक ले जा सकती है. इस मिसाइल में स्पेशल कार्बन-कार्बन कंपोजिट हीट शील्ड लगाई गई, जो री-एंट्री के वक्त 3000 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा की गर्मी को आसानी से झेल सकती है. 2004 में सेना में शामिल होकर इसने चीन के दक्षिणी और मध्य हिस्सों के अहम मिलिट्री बेसों को अपनी रडार पर ले लिया.
- अग्नि-3: अब चीन के अंदरूनी और उत्तरी इलाकों तक भारी न्यूक्लियर हथियार पहुंचाने के लिए भारत को बेहद पावरफुल मिसाइल चाहिए थी. 2007-08 में इसके शुरूआती सफल परीक्षण किए गए और फिर 9 जुलाई 2006 को इसका कंपलीट टेस्ट किया गया. 2-स्टेज सॉलिड फ्यूल वाली यह मिसाइल 17 मीटर लंबी, करीब 2 मीटर चौड़ी और करीब 50 टन वजनी थी. यह मिसाइल 2000 से 2500 किलो का वॉरहेड 3,500 से 5,000 किमी तक ले जाकर टारगेट पर अचूक निशाना लगा सकती थी. इस मिसाइल में एडवांस रिंग लेजर जायरोस्कोप नेविगेशन लगाया गया थी. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसमें मौजूद ‘पेनेट्रेशन एड्स’ और ‘डमी डिकॉय’ थे. यानी अगर दुश्मन का मिसाइल डिफेंस सिस्टम इसे रोकने की कोशिश करे, तो यह रास्ते में कई नकली टारगेट छोड़ देती है, जिससे दुश्मन का रडार धोखा खा जाता है और असली मिसाइल सीधे टारगेट को तबाह कर देती है.
- अग्नि-4: अग्नि-4 भारतीय मिसाइल टेक्नोलॉजी में एक बहुत बड़ा गेम-चेंजर साबित हुई. इसने मिसाइल को भारी-भरकम लोहे के ढांचे से निकालकर सुपर-लाइट कंपोजिट मटीरियल में बदल दिया. इस मिसाइल का पहला टेस्ट 15 नवंबर 2011 को किया गया. अग्नि-4 मिसाइल करीब 20 मीटर लंबी थी, लेकिन इसका वजन वजन सिर्फ 17 टन ही था. इसमें पारंपरिक धातुओं की जगह कंपोजिट रॉकेट मोटर्स का इस्तेमाल किया गया. अग्नि-4 1000 किलो पेलोड के साथ 4000 किमी दूर मौजूद टारगेट पर अचूक निशाना लगा सकती थी. 5वीं जेनरेशन डिजिटल ऑटोपायलट और इनर्शियल नेविगेशन से लैस होने के कारण इसकी एक्यूरेसी बेहद सटीक थी. 2015 में सेना में इस मिसाइल को शामिल कर गया.
- अग्नि-5: अग्नि मिसाइल फैमली के सफर में अगला पडाव 19 अप्रैल 2012 को आया. इसी दिन भारत ने 3-स्टेज सॉलिड फ्यूल वाली ‘अग्नि-5’ का पहला सफल परीक्षण किया. 50 टन वजनी और 17.5 मीटर लंबी यह मिसाइल 5,000 किमी से ज्यादा दूरी तक 1.5 टन का न्यूक्लियर वॉरहेड ले जा सकती है. अग्नि-5 की सबसे बड़ी ताकत इसका ‘कैनिस्टर सिस्टम’ है. मिसाइल एक सीलबंद, वेदर-प्रूफ स्पेशल कंटेनर (कैनिस्टर) के अंदर पैक रहती है. इसे सालों-साल बिना किसी मेंटेनेंस के कहीं भी रखा जा सकता है. इसे बड़े ट्रकों या स्पेशल मिलिट्री ट्रेनों पर लादकर देश के किसी भी कोने पर ले जाया जा सकता है. ऑर्डर मिलते ही यह कैनिस्टर से बाहर निकलती है और कुछ ही मिनटों में लॉन्च होकर आसमान में गायब हो जाती है. दुश्मन के सैटेलाइट को यह पता लगाने का मौका भी नहीं मिलता कि हमला कहां से होने वाला है. अग्नि-5 के आते ही बीजिंग, शंघाई समेत पूरा चीन, आधा यूरोप, पूरा अफ्रीका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र भारत के स्ट्राइक जोन में आ गए.
- अग्नि-प्राइम: 28 जून 2021 को भारत ने अपनी सबसे मॉडर्न और नेक्स्ट-जेनरेशन मिसाइल ‘अग्नि-प्राइम’ का टेस्ट किया. यह पुरानी पड़ रही अग्नि-1 और अग्नि-2 का बिल्कुल नया और एडवांस रिप्लेसमेंट है. इसकी रेंज करीब 1000 से 2000 किमी है. कंपोजिट बॉडी, कैनिस्टराइज्ड लॉन्च सिस्टम और अग्नि-5 वाली एडवांस गाइडेंस टेक्नोलॉजी से लैस यह मिसाइल पुरानी मिसाइलों की तुलना में 50 फीसदी हल्की है. इस मिसाइल के आने के बाद भारत की ‘लॉन्च ऑन वॉर्निंग’ पॉवर कई गुना बढ़ गई है. अगर दुश्मन हमला करने की हिमाकत भी सोचे, तो यह मिसाइल कुछ ही पलों में दुश्मन के एयरबेस, कमांड सेंटर और शिपिंग पोर्ट्स को तबाह कर सकती है.
अग्नि सीरीज: किसमें कितना है दम?
| मिसाइल | मारक क्षमता | स्टेज / फ्यूल टाइप | वजन | लंबाई |
|---|---|---|---|---|
| अग्नि-TD | 700 – 1,200 किमी | 2-स्टेज (ठोस + लिक्विड) | 14 टन | 15 मीटर |
| अग्नि-1 | 700 – 1,200 किमी | 1-स्टेज (ठोस ईंधन) | 12 टन | 15 मीटर |
| अग्नि-2 | 2,000 – 2,500 किमी | 2-स्टेज (ठोस ईंधन) | 16 टन | 21 मीटर |
| अग्नि-3 | 3,500 – 5,000 किमी | 2-स्टेज (ठोस ईंधन) | 50 टन | 17 मीटर |
| अग्नि-4 | 3,500 – 4,000 किमी | 2-स्टेज (कंपोजिट/ठोस) | 17 टन | 20 मीटर |
| अग्नि-5 | 5,000+ किमी | 3-स्टेज (कैनिस्टराइज्ड) | 50 टन | 17.5 मीटर |
| अग्नि-5 (MIRV) | 5,000+ किमी (मल्टीपल) | 3-स्टेज + MIRV पे-लोड | 50+ टन | 17.5 मीटर |
| अग्नि-प्राइम | 1,000 – 2,000 किमी | 2-स्टेज (नेक्स्ट-जेन) | सुपर-लाइट कंपोजिट | – |
| अग्नि-6 | 8,000 – 12,000 किमी | 3/4-स्टेज (MIRV/MaRV) | 65-70 टन (अनुमानित) | – |
क्या है डीआरडीओ का ‘मिशन दिव्यास्त्र’, जिसकी MIRV टेक्नोलॉजी ने सुपरपावर्स को भी हिला दिया?
मार्च 2024 में भारत ने कुछ ऐसा किया, जिसने दुनिया के टॉप मिलिट्री थिंक-टैंक्स को हिलाकर रख दिया. डीआरडीओ ने ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के तहत अग्नि-5 के मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) वर्जन का सफल टेस्ट किया. एक नॉर्मल मिसाइल सिर्फ एक ही न्यूक्लियर बम ले जाती है, जिसे एयर डिफेंस सिस्टम ट्रैक करके हवा में ही गिरा सकता है. लेकिन MIRV टेक्नोलॉजी पूरी बाजी ही पलट देती है. अग्नि-5 MIRV अपने साथ 6 से भी ज्यादा अलग-अलग न्यूक्लियर वॉरहेड्स ले जा सकती है. अंतरिक्ष की सीमा पर पहुंचकर मिसाइल का ऊपरी हिस्सा अलग-अलग वॉरहेड्स को अलग-अलग एंगल और स्पीड पर रिलीज करता है. ये सभी वॉरहेड्स सैकड़ों किमी दूर मौजूद अलग-अलग मिलिट्री बेसों या शहरों पर एक ही समय में बिजली की रफ्तार से निशाना बना सकते हैं. इसके साथ कई दर्जन ‘डमी वॉरहेड’ भी गिरते हैं, जिससे दुश्मन के रडार स्क्रीन पर सैकड़ों लाल बिंदियां दिखने लगती हैं और उसका पूरा एयर डिफेंस सिस्टम क्रैश हो जाता है. भारत इस टेस्ट के साथ ही अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे दुनिया के उन गिने-चुने देशों के एलिट क्लब में शामिल हो गया, जिनके पास यह सुपर-टेक्नोलॉजी है.
अग्नि-6 को लेकर डीआरडीओ का क्या है प्लान?
अग्नि-5 और मिशन दिव्यास्त्र के बाद भारत का अगला सबसे बड़ा प्रोजेक्ट ‘अग्नि-6’ है. 12000 किमी से अधिक दूरी तक मार करने में सक्षम यह मिसाइल धरती के किसी भी कोने में पिन-पॉइंट एक्यूरेसी के साथ हमला कर सकेगी. अग्नि-6 एक साथ 8 से 10 थर्मोन्यूक्लियर वॉरहेड्स ले जाने में सक्षम होगी, जो एक पूरे महाद्वीप के रणनीतिक ठिकानों को एक झटके में तबाह करने में सक्षम होगी. मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल (MaRV) तकनीक से लैस इसके वॉरहेड्स हवा में गोते लगाते हुए अपनी दिशा बदल सकेंगे. यानी दुनिया का कोई भी मिसाइल शील्ड सिस्टम इनके रास्ते का अंदाजा भी नहीं लगा पाएगा. अग्नि-6 को सिर्फ जमीन से ही नहीं, बल्कि भारत की फ्यूचरिस्टिक न्यूक्लियर सबमरीन्स से पानी के नीचे से भी दागने के लिए डिजाइन किया जा रहा है. बताया जा रहा है कि डीआरडीओ ने अग्नि-6 को पूरी तरह से तैयार कर लिया है और जल्द ही इसका परीक्षण होने वाला है.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…
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