नदी ने छीना है, तो शायद लौटा देगी
जब लोकल 18 की टीम ग्राउंड जीरो पर बहराइच के महसी क्षेत्र के गांव जानकीनगर पहुंची. तब एक 75 साल के बुजुर्ग की ऐसी कहानी निकल कर आई. जिसे सुन कर हर कोई भावुक हो जाएं. बहराइच का जानकीनगर गांव हर साल बाढ़ से प्रभवित रहता हैं. यहां के लोगो का खेत पहले है घाघरा में कट चुका है, और बहुत सारे मकान भी. इसी कटान का शिकार हो गए,इसी गाव में रहने वाले 75 साल के राम समूचे है, जिन्होंने बताया है 25 बीघा का खेत भी नदी में समा गया लेकिन यह लगातार 25 सालों से हर रोज गंगा मैया से प्राथना करते नही थक रहे है कि गंगा मैया मेरा खेत वापस दे दो.
25 साल से नदी के किनारे बैठे 75 वर्ष के राम समूचे
घाघरा से मांग रहे अपना 25 बीघा खेत घाघरा की लहरों में समाई जिंदगी भर की कमाई, बहराइच जिले का महसी क्षेत्र और वहां बसा जानकीनगर गांव हर साल कुदरत के कहर का सामना करता है. इस गांव में घाघरा नदी की भयंकर कटान ने कई परिवारों के सपनों को उजाड़ दिया है. किसी का मकान पानी में बह गया, तो किसी की जमीन नदी का निवाला बन गई. इसी आपदा का शिकार 75 वर्षीय बुजुर्ग राम समूच भी हुए हैं. करीब 25 साल पहले घाघरा नदी के विकराल रूप ने उनका 25 बीघा हरा-भरा खेत अपने आगोश में ले लिया था. देखते ही देखते उनकी पूरी मेहनत और आजीविका का साधन नदी के तेज बहाव में समा गया.
उम्र की ढलान पर भी अटूट विश्वास और भक्ति
खेत छिन जाने के बाद भी राम समूच के मन से उम्मीद की किरण कभी धुंधली नहीं हुई. 75 साल की ढलती उम्र और झुकी हुई कमर के बावजूद उनका हौसला कम नहीं हुआ है. पिछले 25 वर्षों से वे लगातार हर सुबह घाघरा नदी के तट पर पहुंचते हैं. नदी की शांत-अशांत लहरों को निहारते हुए वे बेहद श्रद्धा और उम्मीद के साथ प्रार्थना करते हैं. उनके मन में यही भाव है कि जिसने उनका सब कुछ छीना है, वही एक दिन दया करके सब कुछ लौटाएगा.
गंगा मैया से एक ही आस – मेरा खेत वापस दे दो
लोकल 18 मीडिया टीम जब बहराइच के ग्राउंड जीरो पर पहुंची, तो राम समूचे की यह मार्मिक स्थिति सामने आई. नदी किनारे बैठकर वे रोज बस एक ही गुहार लगाते हैं कि गंगा मैया, मेरा खेत मुझे वापस दे दो. 25 साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी उनकी यह पुकार और उम्मीद वैसी ही बनी हुई है. उनके इस निस्वार्थ विश्वास और अविरल इंतजार की कहानी ने पूरे इलाके के लोगों के दिलों को झकझोर कर रख दिया है. जहां पहले जिस खेत में गेहूं,गन्ना, दलहन की फैसले हुआ करती थी. हंसता खेलता परिवार था वही अब खेत ना रहने के बाद यह परिवार दयनीय स्थिति में.
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