सुखपुरा के महावीरी झंडा जुलूस का आजादी से जुड़ा इतिहास
बलिया के सुखपुरा का महावीरी झंडा जुलूस सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आजादी के आंदोलन की एक जीवंत विरासत के रूप में भी देखा जाता है. माना जाता है कि इसकी शुरुआत 1910 के आसपास हुई थी. कभी इन झंडों पर ‘वंदे मातरम’ लिखकर देशभक्ति की अलख जगाई जाती थी.
वर्ष 1927 में हनुमान जी की झांकियों की परंपरा इसमें जुड़ी और जुलूस का स्वरूप और भव्य हो गया. करीब 1930 में अंग्रेजों ने इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय देशभक्तों और वकीलों ने इस परंपरा को बचा लिया.
अखाड़ों और शस्त्र कौशल से रोमांचित होती हैं सड़कें
आज सावन में निकलने वाला यह जुलूस अखाड़ों, शस्त्र-कौशल और उमंग से सुखपुरा की सड़कों को रोमांचित कर देता है. श्रावण पूर्णिमा यानी 28 अगस्त को बलिया शहर में भी महावीरी झंडा जुलूस निकाला जाएगा. इसमें लाखों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है.
बुजुर्गों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे लोग
महावीरी झंडा जुलूस के नेतृत्वकर्ता और अध्यक्ष संदीप सौरभ सिंह ने बताया कि बुजुर्गों द्वारा महावीरी झंडा निकाला जाता रहा है. आज नई पीढ़ी इस परंपरा को जीवित रखे हुए है और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा.
उन्होंने बताया कि पहले बुजुर्ग इस जुलूस को कंधे पर लेकर निकलते थे, लेकिन आज यह आयोजन वृहद रूप ले चुका है. समिति जनता के सहयोग से चलती है और लोग दिल खोलकर सहयोग करते हैं. लोगों के सहयोग से ही जुलूस आज इतने बड़े स्वरूप में पहुंचा है.
आस्था के साथ जुड़ी है देशभक्ति की भावना
इस महावीरी झंडा जुलूस को कुछ लोग भारत की आजादी की लड़ाई से भी जोड़कर देखते हैं. उनका मानना है कि आस्था लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करती है. यही एकजुटता अतीत में आक्रांताओं के खिलाफ संघर्ष में भी मददगार रही.
पीढ़ियों से जुलूस की परंपरा निभा रहे परिवार
राकेश पटेल बताते हैं कि उनकी उम्र 50 वर्ष से अधिक हो चुकी है और वह बचपन से इस जुलूस को देखते आ रहे हैं. उनके बाप-दादा ने भी इस परंपरा को बरकरार रखा और अब वह भी इसे आगे बढ़ा रहे हैं.
उन्होंने बताया कि इस जुलूस में हजारों लोग आस्था के साथ शामिल हुए. लोग अपने घरों की छतों पर चढ़कर जुलूस देखते हैं. परंपरा के तहत नौजवानों द्वारा प्रतीकात्मक रूप से शस्त्र-कौशल का प्रदर्शन भी किया जाता है. इसमें लकड़ी की तलवार, भाले और अन्य प्रतीकात्मक शस्त्र शामिल होते हैं, जो पुरानी परंपरा की याद दिलाते हैं.
1910 में तिलक के सम्मान में निकला था पहला जुलूस
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार, जिले के विभिन्न कस्बों और जिला मुख्यालय पर श्रावण पूर्णिमा के दिन निकलने वाले महावीरी झंडा जुलूस का लंबा इतिहास रहा है.
इतिहासकार के अनुसार, पहला जुलूस 1910 ई. में जॉर्ज पंचम की ताजपोशी के विरोध और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के सम्मान में निकाला गया था.
35 छात्रों ने निकाला था पहला जुलूस
जुलूस की शुरुआत गवर्नमेंट स्कूल बलिया के छात्रों द्वारा ठाकुर जगन्नाथ सिंह के नेतृत्व में गठित ‘विद्यार्थी परिषद’ ने की थी. पहले जुलूस में पं. हृदय नारायण तिवारी, केदारनाथ उपाध्याय, मुनीश्वर मिश्र, शिवदत्त तिवारी और पं. परशुराम चतुर्वेदी सहित कुल 35 छात्र शामिल हुए थे.
आदित्यराम मंदिर से लंबे बांस में लाल झंडा लगाकर जुलूस निकाला गया था, जिस पर “तिलक महाराज की जै” लिखा था. इसके बाद तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर मिस्टर जैप्लीन ने इन छात्रों को स्कूल से निष्कासित कर दिया था.
1927 में जुड़ी हनुमान जी की झांकियों की परंपरा
डॉ. कौशिकेय बताते हैं कि महावीरी झंडा जुलूस में झांकियों की परंपरा 1927 ई. में शुरू हुई. हनुमानगढ़ी मंदिर से पालकी पर हनुमान जी की मूर्ति सजाकर जुलूस निकाला गया था.
उनके अनुसार, ब्रिटिश शासन के खिलाफ युवाओं के विद्रोह वाले इस जुलूस को अंग्रेज अधिकारियों ने हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच तनाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन उनकी यह साजिश सफल नहीं हुई.
1930 में जुलूस पर हुआ था पथराव
इतिहासकार के अनुसार, 1930 ई. में विष्णुपुर मस्जिद से जुलूस पर पथराव किया गया. जवाबी कार्रवाई में जुलूस में शामिल लोगों ने भी मस्जिद पर पथराव किया.
इसके बाद वर्ष 1968 में स्व. बद्री प्रसाद अग्रवाल, स्व. गुलाबचंद गुप्त और स्व. मुरलीमनोहर लाल के नेतृत्व में निकले झंडा जुलूस पर विष्णुपुर चौराहे पर दोबारा पथराव हुआ. उस समय आर्य समाज के गायक नंदलाल आर्य भजन गा रहे थे. जुलूस के आक्रामक होने पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें सिनेमारोड के केदार नोनिया की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हुए.
1990 में सात दिनों तक सड़क पर रुका था जुलूस
डॉ. कौशिकेय के मुताबिक, 1990 में एसडीएम राजीव कपूर के फैसले के चलते झंडा जुलूस सात दिनों तक सड़क पर रुका रहा. इसके बाद वर्ष 2005 में चमनसिंह बाग रोड पर कुछ अराजक तत्वों ने टाउन हॉल अखाड़े पर हमला कर दिया था. इसके कारण भी जुलूस तीन दिन तक रुका रहा.
अब आजादी के उत्सव के रूप में देखी जा रही परंपरा
डॉ. कौशिकेय ने कहा कि आस्था और आजादी से जुड़े इस झंडा जुलूस को ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी और उस दौर की साजिशों से अलग करने की कोशिश अब सफल होती दिख रही है. आज यह आयोजन जश्न-ए-आजादी के उत्सव के रूप में भी देखा जाने लगा है.
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