लेखक-रेनू गुप्ता
शिक्षिका, एवं मेंटर टीचर शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार)
शिक्षा किसी भी राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला होती है। यह केवल पुस्तकीय ज्ञान देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति के विचार, व्यवहार, व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि को आकार देने का माध्यम है। इसी सोच के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दिशा प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल परीक्षा और अंक प्राप्त करने के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि उन्हें ज्ञान, कौशल, रचनात्मकता, तर्कशक्ति, नैतिक मूल्यों और जीवन की वास्तविक चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाना है। नई शिक्षा नीति ने शिक्षा को रटने की परंपरा से निकालकर समझ, अनुभव और क्षमता के विकास से जोडऩे पर जोर दिया है। इसमें विद्यार्थी को सीखने की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाने की कल्पना की गई है। इससे कक्षा का वातावरण भी धीरे-धीरे बदलने की दिशा में बढ़ रहा है। लंबे समय तक शिक्षा व्यवस्था में इस बात को अधिक महत्व दिया जाता रहा कि विद्यार्थी ने कितना याद किया। नई शिक्षा नीति इस सोच को बदलते हुए इस बात पर जोर देती है कि विद्यार्थी प्राप्त ज्ञान का उपयोग किस प्रकार करता है। किसी वैज्ञानिक सिद्धांत को केवल याद कर लेना पर्याप्त नहीं है।
वास्तविक सीख तब मानी जाएगी, जब विद्यार्थी उस सिद्धांत को अपने आसपास की घटनाओं से जोड़ सके, प्रश्न पूछ सके और किसी समस्या का समाधान खोज सके। इसी दृष्टिकोण के कारण समझ आधारित शिक्षा को महत्व मिला है। विद्यार्थियों में तार्किक सोच, विश्लेषण करने की क्षमता, प्रयोग करने की आदत और समस्याओं का समाधान खोजने का कौशल विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। स्थानीय परिवेश को भी सीखने का माध्यम बनाया जा सकता है। आसपास के जलस्रोतों से जल संरक्षण, स्थानीय पौधों से जैव विविधता, बाजार से गणित और आर्थिक गतिविधियों की समझ तथा स्थानीय कला और परंपराओं से इतिहास और संस्कृति को समझा जा सकता है। नई शिक्षा नीति ने पुराने दस-प्लस-दो ढांचे की जगह पांच-तीन-तीन-चार की व्यवस्था प्रस्तुत की है। इसमें तीन से आठ वर्ष की आयु के बच्चों को प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा से जोड़ा गया है। इस चरण में खेल, गतिविधि, कहानी, चित्र, बातचीत और अनुभव के माध्यम से सीखने को प्राथमिकता दी गई है। बच्चों के शुरुआती वर्षों में सीखने की नींव मजबूत होने से आगे की शिक्षा अधिक प्रभावी बन सकती है।
इस व्यवस्था में बालक की आयु, मानसिक विकास और सीखने की स्वाभाविक गति को ध्यान में रखने का प्रयास किया गया है। इससे शिक्षा को बच्चों के अनुकूल बनाने की दिशा मजबूत होती है। नई शिक्षा नीति में व्यावहारिक ज्ञान और कौशल विकास को विशेष महत्व दिया गया है। विद्यार्थियों को कम उम्र से ही विभिन्न प्रकार के कौशलों से परिचित कराने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। छठी कक्षा से व्यावसायिक शिक्षा, हस्तकला और तकनीकी गतिविधियों से जुडऩे के अवसर देने की व्यवस्था इसी सोच का हिस्सा है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझाना है कि शिक्षा का संबंध केवल नौकरी प्राप्त करने से नहीं, बल्कि किसी कार्य को कुशलता से करने और आत्मनिर्भर बनने से भी है। तकनीकी ज्ञान, हस्तकौशल, स्थानीय व्यवसायों और व्यावहारिक गतिविधियों से जुड़ाव विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन की आवश्यकताओं को समझने में मदद कर सकता है। नई शिक्षा नीति में शुरुआती कक्षाओं में मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा को महत्व दिया गया है। बच्चे जिस भाषा में अपने विचार सहजता से व्यक्त करते हैं, उसी भाषा में अवधारणाओं को समझना उनके लिए अधिक स्वाभाविक हो सकता है।
इससे प्रारंभिक शिक्षा की नींव मजबूत करने में सहायता मिल सकती है। इसके साथ ही शिक्षा में विषयों के बीच बनी कठोर सीमाओं को कम करने की दिशा भी दिखाई देती है। विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुसार विभिन्न विषयों का संयोजन कर सकते हैं। विज्ञान के साथ कला, संगीत या इतिहास जैसे विषयों को पढ़ने की स्वतंत्रता विद्यार्थियों के बहुआयामी विकास का रास्ता खोलती है। नई शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका भी महत्वपूर्ण रूप से बदलती है। शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी को सीखने की दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक बनता है। इसके लिए शिक्षकों का निरंतर प्रशिक्षण, नई शिक्षण विधियों की जानकारी और आधुनिक संसाधनों का उपयोग आवश्यक है। भारत में विद्यालयों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। कहीं पर्याप्त संसाधन हैं तो कहीं सीमित सुविधाओं के बीच शिक्षा दी जाती है। ऐसे में नई शिक्षा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन स्थानीय परिस्थितियों को समझते हुए करना जरूरी है। अनुभवी शिक्षक, विद्यालय नेतृत्व और शिक्षकों के सहयोगी समूह इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। शिक्षा में बदलाव तभी प्रभावी होगा, जब मूल्यांकन की व्यवस्था भी बदले।
यदि पूरे वर्ष की पढ़ाई का लक्ष्य केवल अंतिम परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करना होगा, तो विद्यार्थी और शिक्षक दोनों परीक्षा केंद्रित बने रहेंगे। इसके विपरीत नियमित गतिविधियों, परियोजना कार्य, कक्षा में सहभागिता, व्यवहारिक कार्य और विद्यार्थी की प्रगति के निरंतर आकलन से उसकी वास्तविक क्षमता को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। मूल्यांकन का उद्देश्य केवल यह जानना नहीं होना चाहिए कि विद्यार्थी ने क्या नहीं सीखा, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उसने कितना सीखा है और आगे बढ़ने के लिए उसे किस प्रकार की सहायता चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का वास्तविक उद्देश्य शिक्षा को जीवन से जोडऩा है। इसमें ज्ञान के साथ कौशल, रचनात्मकता, तार्किक सोच, अनुभव और मूल्यों को महत्व दिया गया है।
इसका प्रभाव तभी व्यापक रूप से दिखाई देगा, जब विद्यालय, शिक्षक, अभिभावक और पूरा शिक्षा तंत्र सीखने की पारंपरिक परिभाषा को बदलने की दिशा में साथ आगे बढ़े। नई शिक्षा नीति केवल पाठ्यक्रम बदलने का प्रयास नहीं है, बल्कि शिक्षा को देखने के दृष्टिकोण में बदलाव की पहल है। बदलती कक्षा का अर्थ केवल नई किताबें या नई तकनीक नहीं, बल्कि ऐसी सोच का विकास है जिसमें विद्यार्थी सवाल पूछे, सीखने का आनंद ले, अपनी रुचि पहचाने और प्राप्त ज्ञान को जीवन में उपयोग कर सके। यही बदलाव भारतीय विद्यार्थी को परीक्षा की तैयारी से आगे बढ़ाकर जीवन की वास्तविक चुनौतियों के लिए तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।
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