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गोरखपुर की सुशीला ऐसी ही महिला हैं, जो खुद टेराकोटा की अलग-अलग वैरायटी की मूर्तियां तैयार करती हैं. लेकिन उनकी कहानी इसलिए और खास हो जाती है क्योंकि मूर्तियों को रंगने के लिए इस्तेमाल होने वाला ‘टेराकोटा कलर वह बाजार से खरीदती नहीं हैं, बल्कि घर पर खुद तैयार करती हैं. सुशीला के मुताबिक, इस खास रंग को तैयार करने की प्रक्रिया आसान नहीं है. इसके लिए सबसे पहले ‘आम की डाल और उसकी छाल को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है.

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गोरखपुर: गोरखपुर की पहचान सिर्फ अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत के लिए ही नहीं, बल्कि ‘टेराकोटा कला’ के लिए भी देशभर में खास है. यहां मिट्टी से तैयार होने वाली खूबसूरत मूर्तियां और सजावटी सामान ‘ODOP यानी One District One Product’ के जरिए भी पहचान बना चुके हैं. इस कला से जुड़े कई कारीगर अपनी मेहनत और हुनर से अच्छा रोजगार हासिल कर रहे हैं. खास बात यह है कि इस काम में महिलाएं भी अपनी अलग पहचान बना रही हैं.

हाथों से तैयार होता टेरा कोटा कलर

गोरखपुर की सुशीला ऐसी ही महिला हैं, जो खुद टेराकोटा की अलग-अलग वैरायटी की मूर्तियां तैयार करती हैं. लेकिन उनकी कहानी इसलिए और खास हो जाती है क्योंकि मूर्तियों को रंगने के लिए इस्तेमाल होने वाला ‘टेराकोटा कलर वह बाजार से खरीदती नहीं हैं, बल्कि घर पर खुद तैयार करती हैं. सुशीला के मुताबिक, इस खास रंग को तैयार करने की प्रक्रिया आसान नहीं है. इसके लिए सबसे पहले ‘आम की डाल और उसकी छाल को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है. इसके बाद छाल को मिट्टी के साथ मिलाकर घंटों तक कूटा जाता है. लगातार मेहनत के बाद तैयार मिश्रण को धूप में काफी देर तक फैलाकर सुखाया जाता है.

जब यह पूरी तरह सूख जाता है तो इसे दोबारा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होती है. सूखे मिश्रण को बाल्टी में डालकर अच्छी तरह मिलाया जाता है और फिर उससे गोल आकार में सामग्री तैयार की जाती है. इसके बाद इसी प्राकृतिक मिश्रण का इस्तेमाल टेराकोटा की मूर्तियों पर रंग चढ़ाने के लिए किया जाता है.

ऑर्गेनिक तरीके से होता तैया

इस पूरी प्रक्रिया में न किसी महंगे केमिकल कलर की जरूरत पड़ती है और न ही बाजार से तैयार रंग खरीदने की, घर पर तैयार किया गया यह रंग ही मिट्टी की मूर्तियों को वह खास टेराकोटा रंग देता है, जिसके लिए गोरखपुर की कला जानी जाती है. सुशीला की कहानी यह बताती है कि स्थानीय स्तर पर हुनर और मेहनत को रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है. मिट्टी, आम की छाल और अपनी कला के सहारे वह न सिर्फ टेराकोटा की खूबसूरत मूर्तियां तैयार कर रही हैं, बल्कि पारंपरिक कला को भी आगे बढ़ाने में योगदान दे रही हैं. गोरखपुर की टेराकोटा कला की यही खासियत है. यहां मिट्टी सिर्फ मूर्ति का आकार नहीं लेती, बल्कि कारीगरों की मेहनत से रोजगार, पहचान और आत्मनिर्भरता की कहानी भी लिखती है.

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Rajneesh Kumar Yadav

Rajnish Kumar Yadav is a digital journalist and content publisher with over seven years of experience in print and digital media. He is currently working with News18 Digital (Local18) as a Content Publisher, wh…

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