इस सीरीज में हम अतीत के आईने में झांककर देखेंगे कि आजादी के वक्त देश के बिजनेसमैन कौन थे, उन्होंने गांधी जी के कंधे से कंधा कैसे मिलाया और अंग्रेजों को उन्हीं के खेल यानी इकोनॉमी में कैसे मात दी. पहले दिन की शुरुआत हम कर रहे हैं एक ऐसी कहानी से, जिसकी खुशबू और स्वाद भारत के हर घर में बसा है. यह कहानी है उस बिस्कुट की, जिसने अंग्रेजों के महंगे बिस्कुटों का गुरूर चाय की प्याली में डुबोकर तोड़ दिया था- अपना पारले-जी. पारले-जी बिस्कुट तो आपने कई बार खाया होगा लेकिन कभी सोचा कि आखिर इसकी शुरुआत कब, कहां और कैसे हुई. अंग्रेजों के जमाने में शुरू हुआ यह बिस्कुट आज देश के घर-घर में अपनी पहचान बन चुका है. देश के करोड़ों उपभोक्ता चाय की चुस्कियों के साथ इस कंपनी के प्रोडक्ट का मजा लेते हैं. हालांकि, इसके संघर्ष के बारे में शायद ही किसी को पता होगा. चलिए, हम आपको ले चलते हैं पारले-जी बिस्कुट के इसी संघर्ष और सफलता के सफर पर जो आजादी से भी 18 साल पहले शुरू हुआ था.
पारले जी का कारोबार आज 50 से अधिक देशों तक फैल चुका है.
कैसे पड़ा पार्ले जी नाम
आज जब आप पारले-जी बिस्किट का पैकेट खोलते होंगे तो उसका नाम पढ़कर एक बार जरूर मन में आता होगा कि आखिर इस कंपनी का नाम पारले-जी क्यों पड़ा. दरअसल, इस कंपनी को शुरू करने वाले मोहनलाल दयाल ने साल 1929 में जब अपनी पहली फैक्ट्री लगाई तो उन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि महज 12 कर्मचारियों के साथ शुरू होने वाली यह कंपनी एक दिन देश का सबसे बड़ा बिस्कुट ब्रांड बन जाएगी. मोहनलाल ने पारले-जी को मुंबई के इरला और पार्ला इलाके में एक पुरानी फैक्ट्री से शुरू किया. जब कंपनी का नाम रखने की बात आई तो उन्होंने इसकी लोकेशन पार्ला होने की वजह से अपने ब्रांड का नाम भी पार्ले कर दिया. मोहनलाल ने इस कंपनी को शुरू करने के लिए किसी बाहरी कर्मचारी को भी नहीं बुलाया और अपने ही घर के 12 सदस्यों को कंपनी का पहला कर्मचारी बना दिया. इस तरह पारले-जी ब्रांड की शुरुआत हुई.
कैंडी बनाने के लिए शुरू हुई थी फैक्ट्री
साल 1929 में जब पारले-जी ब्रांड शुरू हुआ तो आजादी की लड़ाई अपने शवाब पर थी. पूरे देश में स्वदेशी का आंदोलन चल रहा था और इसी आंदोलन से प्रभावित होकर मोहनलाल दयाल ने इस भारतीय कंपनी को शुरू करने की ठानी. शुरुआत में उसकी मंशा सिर्फ कैंडी बनाने की थी, क्योंकि उस समय देश में कैंडी काफी फेमस हुआ करती थी. यह अलग बात है कि कैंडी तब विदेश से आती थी और आम भारतीयों के लिए इसका स्वाद पाना आजादी पाने जितना ही कठिन माना जाता था. लोगों को स्वाद की आजादी दिलाने के इसी जुनून ने मोहनलाल को जर्मनी पहुंचा दिया, जहां से वह ₹60,000 की कैंडी बनाने वाली मशीन खरीद कर ले आए. इस तरह उन्होंने पार्ले ब्रांड की शुरुआत की और मुंबई में एक छोटी सी फैक्ट्री से कैंडी बनाना शुरू किया.
पारले ने सबसे पहले कैंडी बनाने की शुरुआत की थी.
10 साल तय किया बिस्कुट का सफर
मोहनलाल दयाल ने वैसे तो पारले-जी ब्रांड को साल 1929 में ही शुरू कर दिया था और ऑरेंज कलर की कैंडी बनाकर पूरे देश की जुबान पर अपना स्वाद भी चढ़ा दिया था. लेकिन अब उनकी असली लड़ाई अंग्रेजी बिस्कुट से थी. यह ऐसा दौर था जब देश में बिकने वाला ज्यादातर बिस्कुट बाहर से आयात किया जाता था और इसकी कीमत भी काफी ज्यादा होती थी. ऐसा माना जाता था कि बिस्कुट खाना सिर्फ अंग्रेजों का अधिकार है. मोहनलाल दयाल को यह बात इतनी चुभी कि उन्होंने साल 1939 में बिस्कुट बनाने का भी फैसला कर लिया. आजादी से महज 8 साल पहले उन्होंने पारले ग्लूकोज बिस्कुट बनाकर भारतीयों को स्वाद की आजादी पहले ही दिला दी. इस बिस्कुट का स्वाद लाजवाब था और कीमत कौड़ियों जैसी. अंग्रेजों के महंगे बिस्कुट के मुकाबले पार्ले का यह स्वाद जल्द ही देश भर की जुबान पर चढ़ गया.
विदेशी ब्रांड को कड़ी टक्कर
मोहनलाल दयाल ने पारले जी नाम से अपना स्वदेशी ब्रांड शुरू करने के साथ ही अंग्रेजी हुकूमत के विदेशी ब्रांड वाले बिस्कुट को भी चुनौती देनी शुरू कर दी. यह वह दौर था जब ऐसा माना जाता था कि बिस्कुट खाना सिर्फ अंग्रेजों का अधिकार है, क्योंकि ज्यादातर ब्रांड बाहर से आयात किए जाते थे जिससे उनकी कीमत भी बहुत ज्यादा होती थी और यही कारण था कि आम भारतीय नागरिकों को बिस्कुट का स्वाद पहली बार पारले-जी से ही मिला. उस दौर में तमाम ब्रिटिश ब्रांड जैसे United Biscuits, Huntly & Palmers, Britannia और Glaxo जैसी कंपनियों को कड़ी टक्कर मिलनी शुरू हो गई. पारले ने अपनी कम कीमत और लाजवाब क्वालिटी के दम पर जल्द ही बाजार में इन बिस्कुटों की जगह लेनी शुरू कर दी.
पारले ने ब्रिटिश कंपनियों का कारोबार भारत में मंदा कर दिया था.
विश्व युद्ध में हुआ जमकर इस्तेमाल
गेहूं से बना पारले-जी बिस्कुट अपनी कम कीमत और लाजवाब स्वाद के दम पर तेजी से फेमस होने लगा. कंपनी को असली सफलता तब मिली जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना को पारले जी का ग्लूकोस बिस्कुट सप्लाई होने लगा. कंपनी की सफलता ने बिस्कुट बनाने वाली ब्रिटिश कंपनियों के पैर उखाड़ दिए और उन्हें बाजार में लगातार नुकसान होना शुरू हो गया. मोहनलाल दयाल का भरोसा बढ़ा तो उन्होंने साल 1940 में मोनैको नाम से नमकीन बिस्कुट भी बाजार में उतार दिया.
विभाजन ने दिया कंपनी को गहरा घाव
आजादी के बाद देश की खुशियों पर सबसे बड़ा वज्रपात तब हुआ जब देश के बंटवारे की बात सामने आई. यह भारतीय इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा संकट था और इसका असर पारले-जी बिस्कुट कंपनी पर भी दिखा. देश में गेहूं की कमी हो गई तो पारले-जी को अपने बिस्कुट का उत्पादन भी रोकना पड़ा. लेकिन, मोहनलाल दयाल ने संकट की इस घड़ी में भी अपने लिए अवसर तलाश लिया. उन्होंने गेहूं की जगह जौ वाले बिस्कुट बनाने शुरू कर दिए. इसके बाद तो पारले जी ने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी और देश में एक के बाद एक नए-नए नाम से ब्रांड उतारने शुरू कर दिए.
ब्रिटिश कंपनियां भी उतारने लगीं नकल
पारले जी का ग्लूकोस बिस्किट इतना फेमस हुआ कि उसकी नकल ब्रिटिश कंपनियां भी उतारने लगीं. बिस्कुट बनाने वाली ब्रिटिश कंपनी ब्रिटानिया ने पारले जी के ग्लूकोस बिस्किट की नकल उतारते हुए ग्लूकोज डी नाम से अपना प्रोडक्ट बाजार में उतार दिया. इससे बचने के लिए पारले ने अपने बिस्कुट का नाम पहले ग्लूकोस रखा था, उसे बदलकर पारले-जी कर दिया. कंपनी ने अपनी ब्रांडिंग और लोगो में भी बदलाव किया और इसे पीली धारियों वाले बिस्कुट के पैकेट में उतरना शुरू कर दिया जिस पर छोटी बच्ची की फोटो लगी थी. इस बदलाव ने भी जनता को खूब आकर्षित किया.
विज्ञापन के बाद पारले का कारोबार पूरे देश में फैल गया था.
1982 में दिया पहला विज्ञापन
अपनी शुरुआत के बाद करीब 50 साल तक पारले जी ने सिर्फ अपनी क्वालिटी और लोगों के बीच चर्चा के जरिए ही बाजार बनाया. देश में टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत होने के बाद साल 1982 में पहली बार पारले ने दूरदर्शन पर अपना कॉमर्शियल टीवी एड दिया. तब पारले-जी का यह विज्ञापन ‘स्वाद भरे-शक्ति भरे, पारले-जी शक्तिमान’ देश की जनता को किसी सुपर हीरो जैसा एहसास दिलाते थे. इस विज्ञापन के बाद तो कंपनी के कारोबार को मानों पंख लग गए और उसकी चर्चा गांव-गांव तक होने लगी.
फिर बना जी का जीनियस
साल 2000 में पारले ने एक बार फिर अपनी ब्रांडिंग में बड़ा बदलाव किया और जिस जी का मतलब पहले ग्लूकोस होता था उसे बदलकर जीनियस कर दिया. साल 2010 तक पारले-जी बिस्कुट की उपलब्धियां इतनी हो गई कि उसकी चर्चा ग्लोबल ब्रांड के बीच होने लगी. फाइनेंशियल ईयर 2009-10 में पारले जी ने भारत में इतने बिस्कुट बेच डाले जो चीन में बिकने वाले सभी ब्रांड के कुल बिस्कुट से भी कहीं ज्यादा थे. तब चीन दुनिया का चौथा सबसे ज्यादा बिस्कुट खपत करने वाला देश था. नेल्सन सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि तब पारले जी कैडबरी को पीछे छोड़कर दुनिया का बेस्ट सेलिंग बिस्किट ब्रांड बन गया था. पारले जी की सफलता हमेशा इस बात की याद दिलाती है कि आखिर यह क्यों शुरू हुआ, किसके लिए शुरू हुआ और इसके शुरू होने के बाद रफ्तार कैसे मिले.
आज एक लाख करोड़ की हो चुकी है कंपनी
कभी जर्मनी से ₹60,000 की मशीन लाकर शुरू हुई पारले कंपनी आज करीब 1 लाख करोड़ का ब्रांड बन चुकी है. देशभर में पारले जी के करीब 130 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है जहां दर्जनभर से ज्यादा प्रोडक्ट बनाए जाते हैं. वैसे तो कंपनी को अभी शेयर बाजार में लिस्ट नहीं कराया गया है लेकिन माना जा रहा है कि इसका वैल्यूएशन करीब 1 लाख करोड़ के आसपास है. कंपनी आज हर साल करीब 17,000 करोड़ का कारोबार करती है और सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि 50 से अधिक देशों में अपने प्रोडक्ट का निर्यात करती है. इसके प्रोडक्ट गांव की छोटी दुकानों से लेकर के शहरों के बड़े-बड़े मॉल तक आसानी से देखे जा सकते हैं.
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