अमेठी की धरती कई वीर शासकों और ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह रही है. इन्हीं में कोहरा रियासत के अंतिम शासक बाबू बेनी बहादुर सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. वे सिर्फ एक राजा नहीं थे, बल्कि जनसेवा, आयुर्वेद चिकित्सा और समाज कल्याण के लिए समर्पित व्यक्तित्व थे, जिनके कार्य आज भी लोगों को प्रेरणा देते हैं.
अमेठी जिले की कोहरा रियासत का इतिहास कई प्रतापी शासकों की गाथाओं से जुड़ा है. इन्हीं में राजा बेनी बहादुर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जो कोहरा रियासत के अंतिम शासक थे. उनकी जीवनगाथा आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है. राजा बेनी बहादुर केवल एक कुशल शासक ही नहीं थे, बल्कि समाज सेवा और जनकल्याण के लिए किए गए उनके अनेक कार्य आज भी लोगों द्वारा याद किए जाते हैं.
आज भी अमेठी में राजा बेनी बहादुर का भवन उनकी विरासत की गवाही देता है और कोहरा रियासत का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है. राजा बेनी बहादुर केवल एक कुशल शासक ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने जनहित और विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य भी किए. कहा जाता है कि उन्होंने अंग्रेजी सेना के सामने कभी सिर नहीं झुकाया, इसी साहस और संघर्ष के कारण उन्हें एक वीर क्रांतिकारी के रूप में भी याद किया जाता है.
पिता बाबू महावीर के निधन के बाद बाबू बेनी बहादुर सिंह कोहरा रियासत की गद्दी पर बैठे. उनका विवाह जौनपुर जिले की भीलमपुर जमींदारी के ठाकुर दुर्गविजय सिंह की पुत्री बलिराज कुंवरि से हुआ था. कोहरा रियासत के अंतिम शासक के रूप में उन्होंने 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के बाद रियासत का भारत संघ में विलय कर दिया. वर्ष 1968 में उनका निधन हो गया. बाबू बेनी बहादुर सिंह ने अंग्रेजों के सामने कभी हार नहीं मानी और देश की आजादी के संघर्ष में अपने परिवार के कई सदस्यों के साथ सक्रिय भूमिका निभाई.
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साल 1952 में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के साथ ही राजतंत्र का स्थान लोकतांत्रिक व्यवस्था ने ले लिया. इसी दौरान बाबू बेनी बहादुर सिंह को भी प्रशासन की ओर से नोटिस जारी किया गया, जिसमें उन्हें दो महीने के भीतर अपनी रियासत से संबंधित सभी अभिलेख और विवरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे. इसके लिए उन्हें तत्कालीन न्यायालय में उपस्थित होकर नोटिस प्राप्त करना पड़ा. जमींदारी उन्मूलन लागू होने के बाद प्रदेश की अन्य रियासतों की तरह कोहरा रियासत की जमींदारी भी समाप्त कर दी गई.
साल 1952 में जब विनोबा भावे के नेतृत्व में भूदान आंदोलन शुरू हुआ, तब बाबू बेनी बहादुर सिंह ने भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभाई. उस दौर में, जब लोग अपनी संपत्ति को बचाने में लगे थे, उन्होंने एक आह्वान पर ही अपनी पुश्तैनी जागीर का बड़ा हिस्सा गरीबों के नाम कर दिया. यह कदम उनकी उदारता और समाज सेवा के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है. अवध के इतिहास में बाबू बेनी बहादुर सिंह का नाम इसी त्याग और जनकल्याण की भावना के लिए स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है. अमेठी की कोहरा रियासत के अंतिम शासक के रूप में आजादी के बाद उन्होंने जो मिसाल पेश की, वह आज भी इतिहास के पन्नों में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.
बाबू बेनी बहादुर सिंह का बचपन आम राजकुमारों जैसा नहीं था. महलों में पले-बढ़े होने के बावजूद उनका मन हमेशा अपनी प्रजा के सुख-दुख से जुड़ा रहा. गद्दी संभालने के बाद उन्होंने एक न्यायप्रिय शासक के रूप में राजकाज चलाया, लोगों की समस्याएं सुनीं और निष्पक्ष फैसले दिए. इसके साथ ही वे एक निस्वार्थ वैद्य के रूप में भी जरूरतमंदों का उपचार करते थे. यही कारण था कि क्षेत्र के लोग उन्हें केवल एक शासक नहीं, बल्कि अपना सच्चा अभिभावक और संकटमोचक मानते थे.
बाबू बेनी बहादुर सिंह के भीतर आयुर्वेद के प्रति गहरा अनुराग था. जब उन्होंने आयुर्वेद की उच्च शिक्षा प्राप्त करने का निर्णय लिया, तो राजपरिवार ने भी उनकी इस जनकल्याणकारी इच्छा का सम्मान किया. उन्होंने राजपाठ की परंपराओं से ऊपर उठकर चिकित्सा सेवा का मार्ग चुना और आयुर्वेद की गहन शिक्षा के लिए काशी विद्यापीठ, बनारस पहुंचे, जहां से उन्होंने आयुर्वेदरत्न की प्रतिष्ठित उपाधि प्राप्त की. शिक्षा पूरी करने के बाद जब वे कोहरा लौटे, तो बिना किसी अहंकार के आम लोगों का निःशुल्क उपचार शुरू किया. रोगों की सही पहचान और प्रभावी उपचार के कारण उनकी ख्याति तेजी से पूरे क्षेत्र में फैल गई. दूर-दूर से लोग इलाज कराने के लिए कोहरा राजभवन पहुंचने लगे. उस समय राजभवन का वातावरण किसी बड़े चिकित्सालय जैसा दिखाई देता था, जहां हर सुबह मरीजों की भीड़ लगी रहती थी और बाबू बेनी बहादुर सिंह पूरी निष्ठा के साथ उनकी सेवा में जुटे रहते थे.
बाबू बेनी बहादुर सिंह को केवल राजसत्ता संभालने वाले शासक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक, चिकित्सक और समाजसेवी के रूप में भी जाना जाता था. उन्होंने अपनी प्रजा की भलाई और सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए और अपने परिवार के साथ अनेक बलिदान दिए. यही कारण है कि उनका नाम आज भी इतिहास के पन्नों में सम्मान के साथ दर्ज है.
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