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Parthiv Shivling Significance: सनातन धर्म में श्रावण/ सावन मास भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। इस पूरे महीने शिव भक्त जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जाप और व्रत-उपवास करके भगवान भोलेनाथ की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इन्हीं विशेष पूजन विधियों में पार्थिव शिवलिंग पूजन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।ALSO READ: सावन के 4 सोमवार होंगे बेहद खास, बन रहे हैं अद्भुत योग, जानिए कौन-से 4 उपाय करें
 

हिन्दू धर्म में ‘पार्थिव’ शब्द का अर्थ पृथ्वी (मिट्टी) से है अर्थात् शुद्ध मिट्टी से बनाए गए शिवलिंग की विधिपूर्वक पूजा करना पार्थिव शिवलिंग पूजन कहलाता है। शिव पुराण सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों में पार्थिव शिवलिंग की पूजा को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। मान्यता है कि सावन में इस पूजन को करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

 

  • पार्थिव शिवलिंग का धार्मिक महत्व
  • पार्थिव शिवलिंग बनाने और पूजन की सही विधि

 

श्रावण मास में पार्थिव शिवलिंग पूजन क्यों किया जाता है? जानें इसका धार्मिक महत्व, सही विधि और लाभ

 

पार्थिव शिवलिंग का धार्मिक महत्व

शिव पुराण की ‘कोटिरुद्र संहिता’ में कहा गया है कि: ‘कोटि यज्ञ समं पुण्यं पार्थिवार्चन मात्रतः’ अर्थात् कोटि/ करोड़ों यज्ञों से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह केवल पार्थिव शिवलिंग के पूजन से सुलभ हो जाता है।

 

* अकाल मृत्यु से रक्षा और आरोग्य

शास्त्रों के अनुसार, पार्थिव शिवलिंग का पूजन करने से व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है।

 

* मनोकामना पूर्ति

कहा जाता है कि कलयुग में पार्थिव पूजन सबसे शीघ्र फल देने वाली पूजा है। जो फल कठिन तपस्या से प्राप्त होता है, वही फल सावन में पार्थिव शिवलिंग की श्रद्धापूर्वक पूजा से मिल जाता है।

 

* दुखों और पापों का नाश

 

* पंचतत्वों का संतुलन

मिट्टी/ पृथ्वी तत्व से बने शिवलिंग का जल, वायु, अग्नि और आकाश के सानिध्य में पूजन करने से शरीर और वातावरण में पंचतत्वों का संतुलन बनता है।

 

पार्थिव शिवलिंग बनाने और पूजन की सही विधि

पवित्र मिट्टी का चयन: पार्थिव शिवलिंग मिट्टी, गाय के गोबर और भस्म आदि मिश्रण से विशेष होते हैं। किसी पवित्र नदी, तालाब, बेलपत्र के वृक्ष की जड़ या पीपल के पेड़ के नीचे की साफ मिट्टी लें। 

 

निर्माण प्रक्रिया: मिट्टी में थोड़ा सा गंगाजल, दूध, गोबर और भस्म मिलाकर शिवलिंग का रूप दें।

 

प्राण प्रतिष्ठा व पूजन: शिवलिंग बनाने के बाद उन्हें एक साफ कांसे या पीतल की थाली में स्थापित करें। इसके बाद जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग, चंदन और अक्षत से पूजन करें।

 

विसर्जन: पूजन और आरती समाप्त होने के बाद पार्थिव शिवलिंग को किसी पवित्र नदी, जलकुंड या अपने घर में ही किसी गमले के जल में श्रद्धापूर्वक विसर्जित कर दिया जाता है।

 

श्रावण मास में पार्थिव शिवलिंग पूजन भगवान शिव की आराधना का अत्यंत सरल, पवित्र और फलदायी माध्यम माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक किया गया यह पूजन जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। 

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: सावन 2026 कब से शुरू होगा? जानें कब खत्म होगा और कितने श्रावण सोमवार पड़ेंगे

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