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आजमगढ़ में जनपद में तैनात पशु मित्रों का कहना है कि विभाग के द्वारा पिछले कई वर्षों से उन्हें मुफ्त में शासकीय कार्य जैसे टीकाकरण, ईयर टैगिंग, डाटा एंट्री आदि काम कराया जा रहा है जबकि इसके बदले में उन्हें कोई मजदूरी या मेहनताना नहीं मिल रहा है. उनका कहना है कि सरकार से उनके द्वारा किए जा रहे कड़ी मेहनत का उचित मूल्य मांगा जा रहा है. उनकी मांग है कि 13 जनवरी को पशुपालन निदेशक द्वारा शासन को भेजे गए नियमित मानदेय प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से मंजूरी मिले और विभागीय कार्य के लिए कार्यकर्ताओं को श्रम नियमों के तहत न्यूनतम मासिक मानदेय की गारंटी दी जाए.

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आजमगढ़: जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत पशुपालन विभाग की रीड की हड्डी माने जाने वाले हजारों पैरावेट पशुमित्र कार्य करता इन दोनों काम के बदले मेहनताना न मिल पाने के कारण आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में जा जाकर पशुओं के इलाज से लेकर टीकाकरण और टैगिंग की जिम्मेदारी निभाने वाले यह पशु मित्र वर्षों से बिना किसी निश्चित मानदेय के काम करने को मजबूर हुए हैं.

सरकार की नीतियों में हुए बदलाव के कारण यह कार्यकर्ता अब बिना किसी निर्धारित मानदेय के अपना काम करने को मजबूर हुए हैं. पशु मित्रों के द्वारा लगातार शासन प्रशासन से अपने कार्य के लिए निर्धारित मानदेय की मांग भी की जा रही है लेकिन इन्हें सफलता न हासिल हो पाने के कारण अब इन्होंने संघर्ष का रास्ता चुन लिया है.

नहीं मिल रहा है मेहनताना

जनपद में तैनात पशु मित्रों का कहना है कि विभाग के द्वारा पिछले कई वर्षों से उन्हें मुफ्त में शासकीय कार्य जैसे टीकाकरण, ईयर टैगिंग, डाटा एंट्री आदि काम कराया जा रहा है जबकि इसके बदले में उन्हें कोई मजदूरी या मेहनताना नहीं मिल रहा है. उनका कहना है कि सरकार से उनके द्वारा किए जा रहे कड़ी मेहनत का उचित मूल्य मांगा जा रहा है. उनकी मांग है कि 13 जनवरी को पशुपालन निदेशक द्वारा शासन को भेजे गए नियमित मानदेय प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से मंजूरी मिले और विभागीय कार्य के लिए कार्यकर्ताओं को श्रम नियमों के तहत न्यूनतम मासिक मानदेय की गारंटी दी जाए.

उन्होंने कहा की विभागीय अधिकारी जॉइनिंग के समय कराए गए एग्रीमेंट का तर्क देते हैं. जबकि क्षेत्र में किसी भी समय जरूरत पड़ने पर या भीषण गर्मी और सर्दी के बीच गौशालाओं में पशुओं के टैगिंग और टीकाकरण की जरूरत पर क्षेत्र में तैनात पशु मित्र को ही जिम्मेदारी दी जाती है जबकि इसके लिए कोई अधिकारी या सीवीओ मौके पर नहीं पहुंचते हैं, ऐसे में यदि विभाग के द्वारा हमसे 100% सरकारी काम लिया जाता है तो इसके बदले हमें मेहनताना भी मिलना चाहिए.

2017 के बाद से शुल्क मिलना हुआ बंद

उन्होंने बताया कि 1995 में स्वरोजगार के अंतर्गत पशुपालन विभाग के द्वारा लोगों को प्रशिक्षण देकर पशु मित्र के रूप में विभिन्न क्षेत्रों में तैनात किया गया था. उस समय पशुपालकों से सेवाओं के बदले निर्धारित शुल्क लेकर अपनी आजीविका का संचालन करते थे. लेकिन 2017 में सरकार के द्वारा कृत्रिम गर्भाधान और पशु चिकित्सा सेवा को किसानों के लिए पूरी तरह से निशुल्क घोषित कर दिया गया. जिसके बाद पशु मित्रों को भी उनके काम के बदले निर्धारित शुल्क मिलना बंद हो गया वहीं सरकार के द्वारा भी इन कार्यकर्ताओं के लिए किसी वैकल्पिक मानदेय या वेतन की व्यवस्था नहीं की गई है.

दाम नहीं तो काम नहीं का दिया नारा

अपनी इन मांगों को पूरा करने के लिए पशु मित्रों के द्वारा आंदोलन का भी ऐलान किया गया है. उन्होंने इसे लेकर दाम नहीं तो काम नहीं का नारा भी दिया है और इसके साथ ही कार्यकर्ताओं ने वर्तमान में चल रही राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टैगिंग जैसे सभी शासकीय कार्यों को पूरी तरह से बहिष्कार भी कर दिया है. कार्यकर्ताओं ने 4 अगस्त तक की समय सीमा निर्धारित की है. उनका कहना है कि यदि उनकी मांग नहीं पूरी होती है तो 5 अगस्त से प्रदेश भर में हजारों पैरावेट मिलकर लखनऊ में पशुधन निदेशालय से विधानसभा तक पैदल मार्च निकालेंगे और भूख हड़ताल करेंगे.

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Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …

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