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भूजा के ठेले, ठेले वाले चंदन कुमार के अनुसार, वह केवल 12 साल की उम्र में अपने पिता के साथ भूजा बेचना शुरू कर दिए थे. स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ ठेले पर हाथ बंटाते हुए उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा सबक भी सीख लिया. कहते हैं मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता हैं. पिता ने चंदन को भूजा बनाने की बारीकियां सिखाईं और चंदन के लिए आज यही सबसे बड़ी उपलब्धि है. जनपद बलिया कलेक्ट्रेट में हर सुबह एक ठेला लगता है. हालांकि, यह दूर से देखने में साधारण ठेला जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे तीन दशक की मेहनत और एक परिवार का संघर्ष छिपा है. इसी ठेले पर लगभग 15 सालों से चंदन भूजा बेच रहे हैं. यह चंदन के लिए न केवल रोजी-रोटी है, बल्कि पिता की अमानत और परिवार की पहचान है, जिसे चंदन बरकरार रखे हैं.

जनपद बलिया कलेक्ट्रेट में हर सुबह एक ठेला लगता है. हालांकि, यह दूर से देखने में साधारण ठेला जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे तीन दशक की मेहनत और एक परिवार का संघर्ष छिपा है. इसी ठेले पर लगभग 15 सालों से चंदन भूजा बेच रहे हैं. यह चंदन के लिए न केवल रोजी-रोटी है, बल्कि पिता की अमानत और परिवार की पहचान है, जिसे चंदन बरकरार रखे हैं.

भुजा के ठेले ठेले वाले चंदन कुमार के अनुसार, वह केवल 12 साल की उम्र में अपने पिता के साथ भुजा बेचना शुरू कर दिए थे. स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ ठेले पर हाथ बंटाते हुए उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा सबक भी सीख लिया. कहते हैं मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता हैं. पिता ने चंदन को भुजा बनाने की बारीकियां सिखाईं और चंदन के लिए आज यही सबसे बड़ी उपलब्धि है.

चंदन अनेकों प्रकार के भुजा तैयार करते हैं. चूंकि भुजे को लोग मामूली नाश्ता समझते हैं, लेकिन यही इस परिवार की जिंदगी बदल दी. इसी ठेले की कमाई से पिता ने अपने बेटों-बेटियों की जिम्मेदारियां निभाईं और परिवार को संभाल लिया. आज पिता भले साथ नहीं हैं, लेकिन उनकी मेहनत, सीख और संस्कार हर दिन इस ठेले के साथ जीवंत हो जाती हैं.

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ठेले वाले चंदन के भुजे की खासियत उसके देसी और लाजवाब स्वाद है. चंदन गर्म नमक में भुजा भूनते हैं. यह भूना हुआ चना, मूंगफली, चूड़ा, मक्का, लाई, मटर, मक्का वाला चिप्स और भीगा हुआ चना ऊपर से नींबू, काला नमक और चटपटी चटनी इसके स्वाद को दोगुना बढ़ा देती हैं. यह स्वाद लोगों को बार-बार उनके ठेले तक खींच लाती है. शायद ही कोई ऐसा दिन दिन होता हो, जब उनके ठेले पर ग्राहकों की भीड़ न लगे. यहां भुजा खाने वाले की लाइन लगती हैं.

इनके भुजे का स्वाद केवल आम लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके हाथों का भुजा जिला प्रशासन के कई बड़े-बड़े अधिकारियों तक भी पहुंचता है. इस भुजा के कलेक्ट्रेट के आसपास काम करने वाले कर्मचारी, वकील, व्यापारी, राहगीर और फरियादी आदि नियमित ग्राहक हैं. केवल इसी के चलते बलिया में भुजा की बात हो और चंदन का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता हैं.

उन्होंने आगे कहा कि, समय जरूर बीतता गया महंगाई भी आ गई है. लेकिन चंदन ने गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया है. लगभग 25 रुपए में 100 ग्राम स्वादिष्ट भुजा तैयार कर ग्राहकों को परोसते हैं. इनके हिसाब से ग्राहक का भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है. एक बार जो उनके स्वाद का दीवाना बन गया, वह दोबारा जरूर लौटता है और यही कमाई का मजबूत जरिया है.

चंदन ने इसी छोटे से ठेले की कमाई से आज अपने छह से सात सदस्यों के परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं. बच्चों को अच्छे स्कूल में भी पढ़ा रहे हैं और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं. उन्होंने आगे बताया कि, काम छोटा या बड़ा नहीं होता हैं, बस नीयत और ईमानदारी ही इंसान के सफलता की कुंजी हैं.

इस युवा भुजा वाले की कहानी न केवल भुजा बेचने वाले एक दुकानदार तक सीमित है, बल्कि उस जज्बे की है जो हालात से कभी भी हार नहीं मानते हैं. यह कहानी उन युवाओं के लिए भी संदेश है, जो छोटे काम को छोटा समझते हैं. एक असफलता में हार मान जाते हैं. अगर मेहनत सच्ची हो, ग्राहक का विश्वास और इरादे मजबूत हों, तो एक साधारण ठेला भी सम्मान, पहचान और छोटी को बड़ी सफलता के रूप में बदल सकता हैं.

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