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सुप्रीम कोर्ट ने जेल में पूरी उम्र कैद की सजा काट चुके हीरालाल को 45 साल बाद इंसाफ दिया है. कोर्ट ने उसके दो अन्य साथियों को भी 1977 के हत्या मामले में बेकसूर मानते हुए बरी किया है. इसके साथ ही कोर्ट ने न्याय मिलने में देरी पर भी टिप्पणी की है.
49 साल पुराने मर्डर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूरी उम्र कैद की सजा काट चुके आरोपी को बेकसूर मानकर किया बरी.
कहते हैं कि न्याय मिलने में देर हो सकती है, अंधेर नहीं..लेकिन यही देरी जब एक दो साल की न होकर उम्रभर की हो जाए तो मिलने वाले उस इंसाफ की खुशी कितनी रह जाती है, यह हीरालाल से पूछिए. जिन्हें 45 साल तक जेल में उम्र कैद की सजा काटने के बाद अब बेगुनाही का तमगा मिला है. हीरालाल और उनके दो साथियों को 1977 के एक मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने बेगुनाह मानते हुए बरी किया है.
बता दें कि 49 साल पुराने हत्या के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बैंच ने तीन आरोपियों को बरी किया है. इनमें से हीरालाल वे व्यक्ति हैं जो इंसाफ मिलने तक पूरी उम्रकैद की सजा काट चुके हैं. जबकि उनके दो अन्य साथी भी इस मामले में कई साल जेल में रहे, हालांकि उन्हें 2013 में जमानत मिल गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने 1977 के एक हत्या के मामले में तीन जीवित आरोपियों को बरी कर दिया है. इस दौरान उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर मिले. इस केस में इंसाफ मिलने में लगभग 45 साल लग गए.
बता दें कि यह मामला उत्तर प्रदेश का है. जहां 28 जून 1977 को एक हत्या की गई थी. इस मामले में पुलिस ने 5 आरोपियों को पकड़ा और उनके खिलाफ चार्जशीट पेश कर दी. ट्रायल कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद जज ने आरोपियों को दोषी माना और 1981 में उम्रकैद की सजा सुना दी. इन लोगों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा.
हालांकि खुद को शुरू से ही बेगुनाह बता रहे हीरालाल और उनके साथियों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की. जेल की सजा और न्यायालयों की सुनवाईयों के बीच ही 5 में से दो आरोपियों की मौत हो गई. जबकि बाकी बचे तीन में से दो लोगों को 2013 में जमानत मिल गई, लेकिन सिर्फ हीरालाल को जमानत नहीं मिली और उन्हें जेल में ही रहना पड़ा. हालांकि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी सजा माफ (रिमिट) की, तब वे जेल से बाहर आए.
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक इसके बाद भी हीरालाल ने हार नहीं मानी और खुद को बेकसूर बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ी.अब जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों को बरी करते हुए बताया है कि अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) का मामला कई गंभीर कमियों से भरा था.इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं और हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बातें
- . कथित प्रत्यक्षदर्शी (आईविटनेस) गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास थे.
- . यह साबित नहीं हो सका कि घटना अभियोजन के बताए तरीके और समय पर हुई थी.
- . गवाहों का घटनास्थल पर मौजूद होना भी संदिग्ध और बेहद कम संभावित लगा.
इसलिए आरोपियों का अपराध संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) साबित नहीं हो पाया. - . अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने इन गंभीर कमियों को नजरअंदाज कर दिया था.
ऐसे में यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में इंसाफ मिलने में होने वाली अत्यधिक देरी का बड़ा उदाहरण बन गया है. सबसे बड़ी बात है कि निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक जिन्हें गुनहगार मानते रहे, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेकसूर मानते हुए बरी किया है.
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Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें
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