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खरीफ सीजन में लौकी की खेती किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल साबित हो सकती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पूसा समर, पूसा मेघदूत, पंजाब अरका बहार और पंत संकर लौकी-1 जैसी उन्नत किस्मों का चयन, बीज उपचार और वैज्ञानिक तरीके से बुवाई करने पर कम समय में बेहतर उत्पादन और अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है.
खरीफ सीजन में बारिश के दौरान लौकी की खेती किसानों के लिए मुनाफे का बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है. व्यावसायिक रूप से सब्जियों की खेती करने वाले किसान इस फसल की खेती करके कम समय में अच्छा लाभ कमा सकते हैं.
लौकी एक ऐसी सब्जी है, जिसकी बाजार में सालभर मांग बनी रहती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम समय में तैयार हो जाती है. यही वजह है कि इसे नगदी फसल के रूप में भी काफी पसंद किया जाता है. किसान जुलाई महीने में उन्नत किस्मों का चयन कर वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती करके बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं.
कृषि विशेषज्ञ डॉ. विजय के अनुसार, कम समय में अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए किसानों को हमेशा उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए. इसके लिए पूसा समर, पूसा मेघदूत, पंजाब अरका बहार, पंत संकर लौकी-1 और नरेंद्र संकर लौकी जैसी किस्में बेहतर मानी जाती हैं.
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यदि किसान गोल लौकी की खेती करना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसी किस्मों का चयन करना चाहिए जो कम समय और कम लागत में अधिक उत्पादन दें. इसके लिए पूसा मंजरी और पूसा संदेश जैसी किस्में उपयुक्त मानी जाती हैं. ये किस्में बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन के लिए जानी जाती हैं.
खरीफ सीजन में लौकी की बुवाई के लिए जून और जुलाई का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. बारिश के मौसम में इसकी बुवाई करना भी आसान होता है. प्रति हेक्टेयर 3 से 4 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना जाता है.
वहीं फसल बुवाई के दौरान यदि किसान वैज्ञानिक विधि का इस्तेमाल करते हैं तो फसल का विकास तेजी से किया जा सकता है, फसल बोवाई के दौरान हमेशा पौधे से पौधे के बीच में उचित दूरी बनाना बेहद जरूरी होता है. ताकि पौधा बड़ा होने पर फलों का विस्तार सही तरह से हो सके.
कृषि एक्सपर्ट की माने तो लौकी की खेती के लिए हल्की दोमट भूमि सबसे उपयोगी मानी जाती है इसके अलावा फसल बुवाई के दौरान किसान को हमेशा खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था बनानी चाहिए ताकि जल भराव की स्थिति से बचा जा सके.
बुवाई से पहले बीजों को ट्राइकोडर्मा से उपचारित करने पर फफूंदजनित रोगों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है. साथ ही समय-समय पर सिंचाई, निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देकर किसान कम समय में बेहतर उत्पादन के साथ अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.
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