Last Updated:
रामपुर के कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, नीमास्त्र एक प्राकृतिक जैविक कीटनाशक है जिसे नीम की पत्तियों, गोमूत्र, गोबर और पानी से घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है. इसका उपयोग रस चूसने वाले कीटों और छोटी इल्लियों के नियंत्रण में किया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्राकृतिक खेती में लागत कम करने और रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने का एक उपयोगी विकल्प हो सकता है.
रामपुर: खेती में सबसे बड़ी चिंता तब होती है जब खड़ी फसल पर कीड़े हमला कर देते हैं ऐसे में ज्यादातर किसान महंगे रासायनिक कीटनाशकों का सहारा लेते हैं इससे जेब पर बोझ बढ़ता है और मिट्टी की सेहत पर भी असर पड़ता है लेकिन दादा-परदादा के समय का एक देसी जुगाड़ आज भी किसानों के लिए किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं माना जाता इसका नाम है नीमास्त्र यह ऐसा जैविक कीटनाशक है जिसे किसान घर पर ही तैयार कर सकते हैं और इसके लिए बाजार से महंगी दवा खरीदने की जरूरत भी नहीं पड़ती.
नीमास्त्र पूरी तरह प्राकृतिक घोल
उप कृषि निदेशक राम किशन सिंह के अनुसार नीमास्त्र पूरी तरह प्राकृतिक घोल है इसका इस्तेमाल खास तौर पर रस चूसने वाले कीटों और छोटी इल्लियों के नियंत्रण के लिए किया जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे फसल सुरक्षित रहती है. मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर नहीं पड़ता और किसानों का हजारों रुपये का खर्च भी बच सकता है.
नीमास्त्र कैसे करें तैयार
कैसे करें छिड़काव
तैयार घोल को मिट्टी या प्लास्टिक के बर्तन में भरकर करीब छह महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है. जब भी फसल में रस चूसने वाले कीट, माहू या छोटी इल्लियां दिखाई दें. तब इसका छिड़काव किया जा सकता है. एक एकड़ खेत में स्प्रे मशीन की मदद से इसका समान रूप से छिड़काव करने की सलाह दी जाती है. समय पर इस्तेमाल करने से कीटों का प्रकोप काफी हद तक कम किया जा सकता है.
पर्यावरण के लिए भी अधिक सुरक्षित
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि नीम में मौजूद प्राकृतिक तत्व कई कीटों के भोजन करने और प्रजनन की क्षमता को प्रभावित करते हैं. इससे कीटों की संख्या बढ़ने की रफ्तार कम हो सकती है. साथ ही रासायनिक कीटनाशकों के मुकाबले यह तरीका पर्यावरण के लिए भी अधिक सुरक्षित माना जाता है.
राम किशन सिंह का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों के लिए नीमास्त्र बेहद उपयोगी विकल्प है. इससे खेती की लागत कम करने में मदद मिलती है और बार बार महंगी दवाएं खरीदने की जरूरत भी नहीं पड़ती. अगर किसान समय पर इसका इस्तेमाल करें और फसल की नियमित निगरानी रखें तो कीटों से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
About the Author
विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें
- व्हाट्स एप के माध्यम से हमारी खबरें प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
- टेलीग्राम के माध्यम से हमारी खबरें प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
- हमें फ़ेसबुक पर फॉलो करें।
- हमें ट्विटर पर फॉलो करें।
———-
🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।
Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||



