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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की हलचल है. केंद्र की राजनीति में इंडिया गठबंधन के नाम पर विपक्षी पार्टियां भारी मन से ही सही, लेकिन एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं. ऐसे समय में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की नीतियां और उनकी कही बातें एक बार फिर से मौजूं नजर आने लगी हैं. साल 2026 चंद्रशेखर की 100वीं जयंती है, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने इस अवसर पर कोई बड़ा आयोजन करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

मौजूदा समय में देश की राजनीति में दो घटनाक्रम सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है. पहला मामला क्षेत्रीय पार्टियों का टूटना और दूसरा राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला. दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों मुद्दों में चंद्रशेखर की भूमिका रही है. 17 अप्रैल, 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्में चंद्रशेखर देश के वो इकलौते नेता हैं जिन्होंने जीवन में कभी भी कोई पद नहीं संभाला, सीधे देश के प्रधानमंत्री बने.

जब इंदिरा गांधी से चंद्रशेखर ने कहा वो कांग्रेस को तोड़ेंगे

पहले बात करते हैं छोटी पार्टियों के टूटने की घटना पर. हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) में टूट हुई है. याद करा दूं चंद्रशेखर ने भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की पार्टी जनता दल के 63 सांसदों को तोड़कर नई पार्टी बनाई थी और कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बने थे. उस समय राजीव गांधी की अगुवाई में चल रही कांग्रेस ने ही चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री के पद पर बिठाया और बाद में गिरा भी दिया.

राज्य सभा में डिप्टी स्पीकर और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने चंद्रशेखर के जीवन पर किताब लिखी है उसमें, जिक्र है कि 1965 में चंद्रशेखर कांग्रेस में शामिल हुए थे. उनकी भेंट इंदिरा गांधी से हुई. उस समय लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में चल रही सरकार में इंदिरा गांधी सूचना और प्रसारण मंत्री थीं. राजीव गांधी ने चंद्रशेख से पूछा कि वह कांग्रेस में क्यों आए हैं. इस पर, उन्होंने जवाब दिया कि वह कांग्रेस को समाजवादी टर्न देना चाहते हैं. इसपर इंदिरा ने पूछा कि अगर वह सफल नहीं हुए तो क्या करेंगे. तभी चंद्रशेखर ने तपाक से जवाब दिया था- ‘उस मामले में, मैं कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश करूंगा.’ चंद्रशेखर का जवाब सुनकर हैरान होकर इंदिरा गांधी ने पूछा, ‘क्यों?’. इस पर युवा चंद्रशेखर ने कहा, ‘कांग्रेस एक बरगद का पेड़ बन गया है, जिसके नीचे कुछ भी नया नहीं उग सकता.’

साल 1969 में जब इंदिरा गांधी ने पुराने कांग्रेसियों से पार्टी को अलग कर नई कांग्रेस बनाने की कोशिश की तो चंद्रशेखर ने सबसे ज्यादा उनकी मदद की थी. आगे चलकर इंदिरा भारतीय राजनीति में दुर्गा कहलाईं और चंद्रशेखर ‘यंग तुर्क’ कहलाए.

राम मंदिर का मुद्दा सुलझाने के कगार पर थे चंद्रशेखर, राजीव गांधी ने रोक दिया!

दूसरा राम मंदिर में दान की चोरी का मुद्दा गरमाया हुआ है. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी बताती हैं कि चंद्रशेखर के साथ उनकी बातचीत उन्होंने उनसे पूछा था कि अगर वे 6 दिसंबर 1992 को प्रधानमंत्री होते जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिराई थी, तो वे क्या करते. इसपर पूर्व पीएम ने कहा कि वे ऐसा कभी नहीं होने देते. लेकिन जब उनसे कहा गया कि अगर कारसेवकों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया गया होता, तो उस दिन हजारों लोग मारे जाते, तो उन्होंने वही बात दोहराई जो उन्होंने कही थी. वरिष्ठ पत्रकार बताती हैं कि चंद्रशेखर के साथ काम करने वाले अधिकारियों जैसे कैबिनेट सेक्रेटरी नरेश चंद्रा और श्याम सरन, जो बाद में विदेश सचिव बने का भी यही कहना था कि वे इस मुद्दें पर सख्त रुख ही अपनाते.

वो कहती हैं कि कई लोगों का मानना ​​है कि कांग्रेस ने चंद्रशेखर की सरकार इसलिए गिरा दी क्योंकि वे बातचीत के जरिए अयोध्या विवाद को सुलझाने के करीब पहुंच गए थे. चंद्रशेखर विवादित जगह पर मंदिर बनाने के इर्द-गिर्द समझौता कराने में सफल होने वाले थे, लेकिन इस भरोसे के साथ कि विश्व हिंदू परिषद (VHP) भविष्य में काशी और मथुरा जैसे मुद्दे नहीं उठाएगी. 36 साल बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राम मंदिर में दान के रुपये की चोरी के मुद्दे को उठाया तो यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने मथुरा में कृष्णजन्मभूमि का मुद्दा उठा दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार लिखती हैं कि चंद्रशेखर ने यह महसूस करते हुए कि उनकी अल्पमत सरकार के पास ज्यादा समय नहीं होगा, उन्होंने नवंबर 1990 में प्रधानमंत्री बनने के पहले दिन ही वीएचपी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी दोनों से संपर्क किया था. उस समय, राजीव गांधी को उनके सलाहकारों ने बताया था कि अगर चंद्रशेखर सफल होते हैं, तो वे न केवल देश भर में लोकप्रिय हो जाएंगे, बल्कि कांग्रेस में भी अपनी जगह बना लेंगे, जहां उनकी अच्छी छवि थी, क्योंकि वे कभी इसका हिस्सा थे. इसके तुरंत बाद, हरियाणा के दो सब-इंस्पेक्टर 10 जनपथ के आसपास जासूसी करते हुए पाए गए, और कांग्रेस ने यह काम रोक दिया.

भारत में 14 प्रधानमंत्री हुए हैं. लगभग उतने ही लोग सत्ता के शिखर के करीब पहुंचे, लेकिन टॉप पर नहीं पहुंच पाए. चंद्रशेखर जैसी एक और कैटेगरी थी, जो सबसे ऊंचे पद पर तो पहुंचे लेकिन, ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए, उनका कार्यकाल 223 दिन चला.

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