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-चढ़ावे की गणना में श्रद्धालुओं को भी मिले सेवा का अवसर: रविंद्र तिवारी
-पारदर्शी संगणकीय चयन प्रणाली से चुने जाएं रामभक्त, ट्रस्ट की निगरानी में करें सेवा
-“सेवा, श्रद्धा और विश्वास का संगम बने राममंदिर’, विश्व के प्रमुख धार्मिक स्थलों की व्यवस्था का दिया उदाहरण

उदय भूमि संवाददाता
अयोध्या। भगवान श्रीराम केवल करोड़ों सनातन श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, मर्यादा और राष्ट्रीय चेतना के सर्वोच्च प्रतीक भी हैं। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित प्रत्येक रुपया उनके विश्वास, समर्पण और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में मंदिर में प्राप्त चढ़ावे की गणना को लेकर समय-समय पर उठने वाली चर्चाओं के बीच वित्तीय सलाहकार रविंद्र तिवारी ने एक महत्वपूर्ण और जनसहभागिता आधारित सुझाव प्रस्तुत किया है। उनका मानना है कि यदि रामभक्तों को भी मंदिर सेवा से जोड़ा जाए तो इससे पारदर्शिता, विश्वास और सेवा की भावना को और अधिक मजबूती मिलेगी। रविंद्र तिवारी ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में चढ़ावा और दान प्राप्त होता है। उनकी राय है कि इस चढ़ावे की गणना महीने में दो या तीन बार नियमित रूप से की जाए तथा इस प्रक्रिया में केवल वेतनभोगी कर्मचारियों पर निर्भर रहने के बजाय उन श्रद्धालुओं को भी सेवा का अवसर दिया जाए, जिन्होंने मंदिर निर्माण अथवा अन्य धार्मिक कार्यों में अपनी श्रद्धानुसार सहयोग प्रदान किया है।

उन्होंने सुझाव दिया कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक पारदर्शी संगणकीय चयन प्रणाली विकसित करे। इस प्रणाली के माध्यम से चयनित श्रद्धालुओं को लगभग तीन माह पूर्व सूचना देकर निर्धारित तिथि पर अयोध्या आमंत्रित किया जाए। इसके बाद ट्रस्ट के अधिकृत अधिकारियों, चार्टर्ड लेखाकारों, बैंक प्रतिनिधियों और सुरक्षा एजेंसियों की उपस्थिति एवं निगरानी में उन्हें चढ़ावे की गणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य में सहभागी बनने का अवसर दिया जा सकता है। रविंद्र तिवारी का कहना है कि यह केवल धन की गणना का कार्य नहीं होगा, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए अपने आराध्य प्रभु श्रीराम की प्रत्यक्ष सेवा का दुर्लभ अवसर भी होगा। उनका मानना है कि जिसने भी अपनी श्रद्धा से भगवान श्रीराम के चरणों में कुछ अर्पित किया है, उसे जीवन में कम-से-कम एक बार मंदिर सेवा का सौभाग्य अवश्य मिलना चाहिए। इससे श्रद्धालुओं का मंदिर के प्रति आत्मीय जुड़ाव और विश्वास दोनों और अधिक सुदृढ़ होंगे। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जनसहभागिता केवल चढ़ावे की गणना तक सीमित न रहे।

चयनित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण, श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन, स्वच्छता अभियान, पेयजल सेवा, कतार व्यवस्था तथा अन्य सेवा कार्यों में भी निश्चित अवधि के लिए योगदान देने का अवसर दिया जा सकता है। इससे सेवा की भारतीय परंपरा को नई ऊर्जा मिलेगी और मंदिर व्यवस्था में समाज की सक्रिय भागीदारी भी बढ़ेगी। रविंद्र तिवारी ने अपने सुझाव के समर्थन में विश्व के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि अमृतसर स्थित श्री हरमंदिर साहिब में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु बिना किसी पारिश्रमिक के लंगर सेवा, सफाई और अन्य धार्मिक कार्यों में स्वेच्छा से योगदान देते हैं। इसी प्रकार तिरुपति स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में ‘श्रीवारी सेवाÓ के माध्यम से देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं को सेवा का अवसर प्रदान किया जाता है। वहीं वेटिकन सिटी में भी बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन व्यवस्थाओं ने सेवा, अनुशासन और श्रद्धालुओं के विश्वास को और अधिक मजबूत बनाया है।

उन्होंने कहा कि यदि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट सुरक्षा, गोपनीयता और प्रशासनिक नियमों का पूर्ण पालन करते हुए ऐसी जनसहभागिता आधारित व्यवस्था पर विचार करता है तो इससे मंदिर की पारदर्शिता और विश्वसनीयता और अधिक सुदृढ़ होगी। साथ ही देश और विदेश में बसे करोड़ों रामभक्तों को भी अपने आराध्य की प्रत्यक्ष सेवा का सौभाग्य प्राप्त होगा। रविंद्र तिवारी ने कहा कि श्रीराम का भव्य मंदिर केवल पत्थरों से निर्मित एक भवन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, विश्वास और राष्ट्रीय चेतना का जीवंत केंद्र है। इसलिए यहां की प्रत्येक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो श्रद्धा, सेवा, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनविश्वास जैसे मूल्यों को समान रूप से सशक्त बनाए। उनका मानना है कि यही रामराज्य की मूल भावना भी है, जहां व्यवस्था का आधार सेवा, विश्वास, धर्म और जनसहभागिता होती है।

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