कुछ तारीखें सिर्फ फिल्मों की रिलीज के लिए ही नहीं, बल्कि एक नए दौर की शुरुआत और एक्टिंग के एक नए कल्ट के जन्म के लिए भी याद की जाती हैं. 22 जून 2012 बॉलीवुड कैलेंडर में ऐसा ही एक ऐतिहासिक दिन है. आज से ठीक 14 साल पहले, इसी तारीख को डायरेक्टर अनुराग कश्यप की कम बजट की गैंगस्टर ड्रामा ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर- पार्ट 1’ रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने न सिर्फ हिंदी सिनेमा में रियलिस्टिक क्राइम जॉनर को नई पहचान दी, बल्कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया, जिन्होंने एक जूनियर आर्टिस्ट और को-स्टार के तौर पर सालों तक गुमनामी झेली.
नई दिल्ली. दशकों से बॉलीवुड में एक जाना-माना पैटर्न था, जहां फिल्मों की सफलता सिर्फ बड़े खान्स, कपूर खानदान या सिक्स-पैक एब्स वाले चॉकलेटी चेहरों के आस-पास घूमती थी. मेनस्ट्रीम डिस्ट्रीब्यूटर आम तौर पर छोटे शहरों, गैंग वॉर और गाली-गलौज वाली कहानियों से दूर रहते थे, उन्हें ‘बी-ग्रेड’ या ‘पैरेलल सिनेमा’ मानते थे. लेकिन जब 22 जून 2012 को थिएटर खुले, तो स्क्रीन पर एक ऐसा तूफान आया जिसने पारंपरिक स्टारडम की कांच की छत को हमेशा के लिए तोड़ दिया. उस तूफान का नाम था ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)
डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने इस फिल्म को बनाने में ज्यादा पैसा खर्च नहीं किया. दोनों हिस्सों को बहुत कम बजट (लगभग 18 करोड़) में लाइव लोकेशन पर शूट किया गया था. जब यह फिल्म थिएटर में आई, तो इसने भले ही पारंपरिक कमाई के रिकॉर्ड नहीं तोड़े, लेकिन इसने बॉलीवुड को एक ऐसा एक्टर दिया जिसने इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया. हम बात कर रहे हैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी की, जो इस फिल्म से पहले सिर्फ को-स्टार या बैकग्राउंड में जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर ही फिल्मों में दिखे थे.
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की रिलीज से पहले, नवाजुद्दीन सिद्दीकी का फिल्मी सफर एक लंबी और अंधेरी सुरंग जैसा था. ‘सरफरोश’ में एक चोर का छोटा सा रोल, ‘मुन्नाभाई MBBS’ में एक जेबकतरे का रोल और ‘देव डी’ के एक गाने में बैकग्राउंड डांसर का रोल, नवाज ने गुजारा करने के लिए हर छोटा-बड़ा काम किया था. उन्हें खुद भी नहीं पता था कि उनके अंदर एक्टिंग का ज्वालामुखी 22 जून का इंतजार कर रहा है.
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पार्ट 1 में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का किरदार फैजल खान, मनोज बाजपेयी (सरदार खान) के दबदबे के बीच एक सुस्त, दिनभर नशे में रहने वाले और डरपोक को-स्टार के तौर पर दिखता है. लेकिन, जैसे ही कहानी एक मोड़ लेती है और सरदार खान का मर्डर होता है, फैजल खान का खूंखार रूप सामने आता है, जिससे दर्शकों की रूह कांप जाती है.
नवाज ने अपनी आंखों, अपने बॉडी लैंग्वेज और अपनी पतली आवाज में जो डर भरा था, उसे आज भी याद किया जाता है. ‘सबका बदला लेगा तेरा फैजल…’ यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं था, बल्कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी का पूरी फिल्म इंडस्ट्री द्वारा सालों से नजरअंदाज किए जाने का बदला था, जिसने कभी उनके रंग और हाइट की वजह से उनकी कद्र नहीं की थी.
अनुराग कश्यप ने धनबाद और वासेपुर के कोल माफिया, तीन पीढ़ियों के झगड़े और गंदे पॉलिटिकल गठजोड़ को बिना किसी फिल्टर के जीवंत कर दिया. फिल्म की सबसे बड़ी USP यह थी कि इसमें कुछ भी आर्टिफिशियल या फिल्मी नहीं था.
फिल्म की स्टार कास्ट इतनी मजबूत थी कि हर किरदार अमर हो गया. मनोज बाजपेयी की कल्ट परफॉर्मेंस, तिग्मांशु धूलिया का रामाधीर सिंह के तौर पर शांत और चालाक विलेन का रोल, पीयूष मिश्रा का दिल को छू लेने वाला नरेशन और ऋचा चड्ढा-हुमा कुरैशी जैसी एक्ट्रेस का बिंदास देसी स्टाइल… इन सबने मिलकर फिल्म को एक विजुअल पोएट्री बना दिया. इस गैंगस्टर सागा की आधी सफलता का क्रेडिट इसके म्यूजिक को जाता है. स्नेहा खानवलकर ने बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के गांव के इलाकों में घूमकर ऐसा म्यूजिक बनाया जो बॉलीवुड ने पहले कभी नहीं सुना था. ‘ओ वुमनिया’ और ‘आई एम अ हंटर’ जैसे गानों ने ट्रेडिशनल म्यूजिक के सारे नियम तोड़ दिए.
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