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India First: क्या आप उस पहले भारतीय शख्स के बारे में जानते हैं, जो ब्रिटिश पार्लियामेंट में बतौर सांसद पहुंचे थे? अगर नहीं जानते हैं, तो बता दें कि ब्रिटिश संसद में कदम रखने वाले पहले भारतीय दादाभाई नौरोजी थे. 1892 में लंदन के फिन्सबरी सेंट्रल से चुनाव जीतकर उन्होंने इतिहास रचा था.
India First: आज के दौर में ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों का दबदबा है. वहां पर कई भारतीय जाकर बसे और उस देश में अपनी मेहनत से पहचान बनाई. कोई वहां का सबसे अमीर बिजनेस मैन बना, तो कोई प्रधानमंत्री चुना गया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में पहुंचने वाला पहला भारतीय कौन था? अगर नहीं जानते तो बता दें कि ब्रिटिश संसद में कदम रखने वाले पहले भारतीय दादाभाई नौरोजी थे. 1892 में लंदन के फिन्सबरी सेंट्रल से चुनाव जीतकर उन्होंने इतिहास रचा था. उन्होंने अंग्रेजों के बीच रहकर भारत की गरीबी और उनके शोषण का पर्दाफाश दुनिया के सामने किया था. गुलामी के उस दौर में जब भारतीयों को इंसानी अधिकारों के लायक भी नहीं समझा जाता था, तब एक अश्वेत भारतीय का संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) तक पहुंचना किसी चमत्कार से कम नहीं था. दादाभाई नौरोजी की इस ऐतिहासिक राजनीतिक विजय ने न केवल ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी के अहंकार को चूर-चूर कर दिया था, बल्कि समूचे ब्रिटिश हुक्मरानों को सन्न कर दिया था.
दादाभाई नौरोजी ने साबित कर दिया था कि भारतीय न सिर्फ अपना शासन खुद चलाने में सक्षम हैं, बल्कि वे अंग्रेजों को उन्हीं की धरती पर लोकतांत्रिक तरीके से धूल चटाने का माद्दा भी रखते हैं. ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ यानी ‘भारत के बुजुर्ग नेता’ के नाम से मशहूर दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को बॉम्बे के एक गरीब पारसी परिवार में हुआ था. बचपन से ही दादाभाई पढ़ने में अव्वल थे. उन्होंने पढ़ाई में हमेशा टॉप किया, जिसकी वजह से आगे चलकर वे बॉम्बे के प्रतिष्ठित एल्फिंस्टन कॉलेज में मैथमेटिक्स एंड नेचुरल फिलॉसफी के पहले भारतीय प्रोफेसर नियुक्त हुए. उस समय किसी भारतीय का अकादमिक जगत में इस पद पर पहुंचना बहुत बड़ी बात थी. लेकिन दादाभाई का लक्ष्य सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं था. वे साल 1855 में एक बिजनेस फर्म के पार्टनर के रूप में लंदन चले गए. वहां जाकर उन्होंने महसूस किया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण प्राकृतिक नहीं, बल्कि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई नीतियां हैं, जिसके बाद उन्होंने लंदन को ही अपनी कर्मभूमि बनाकर ब्रिटिश जनता को भारत की असलियत बताने का फैसला किया.
जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने दादाभाई को कहा था ‘काला आदमी’!
लंदन में रहते हुए दादाभाई नौरोजी ने साल 1886 में पहली बार होलबॉर्न सीट से ब्रिटिश संसद का चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गए. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और साल 1892 के आम चुनाव में लिबरल पार्टी के टिकट पर लंदन की फिन्सबरी सेंट्रल (Finsbury Central) सीट से दोबारा पर्चा दाखिल किया. उनके चुनाव प्रचार के दौरान नस्लीय भेदभाव अपने चरम पर था. तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी ने एक जनसभा में दादाभाई का मजाक उड़ाते हुए खुलेआम कहा था कि ब्रिटिश मतदाता इतने समझदार हैं कि वे कभी किसी ‘काले आदमी (Black Man)’ को अपनी संसद में वोट देकर नहीं भेजेंगे. प्रधानमंत्री के इस अपमानजनक बयान ने ब्रिटिश मीडिया और वहां के उदारवादी लोगों को झकझोर कर रख दिया. दादाभाई के पक्ष में एक सहानुभूति की लहर चल पड़ी. जब चुनाव के नतीजे आए, तो दादाभाई नौरोजी ने लगभग 3 वोटों के बेहद छोटे अंतर से जीत दर्ज की थी और ब्रिटिश पार्लियामेंट में पहुंचने वाले पहले भारतीय सांसद बन गए.
बाइबिल पर शपथ लेने से कर दिया था इनकार
ब्रिटिश संसद का सदस्य चुने जाने के बाद जब दादाभाई नौरोजी हाउस ऑफ कॉमन्स में शपथ लेने पहुंचे, तो उनके सामने एक और संवैधानिक संकट खड़ा हो गया. उस समय के नियमों के मुताबिक सभी नवनिर्वाचित सांसदों को ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल पर हाथ रखकर ईश्वर के नाम पर ब्रिटिश क्राउन (राजशाही) के प्रति वफादारी की शपथ लेनी होती थी. लेकिन दादाभाई नौरोजी अपने सिद्धांतों और अपने धर्म के प्रति पूरी तरह अडिग थे. उन्होंने एक गैर-ईसाई होने के नाते बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ लेने से साफ इनकार कर दिया. उनके इस सख्त रुख के आगे ब्रिटिश संसद को झुकना पड़ा. दादाभाई ने संसद के इतिहास में पहली बार अपने पारसी धर्मग्रंथ खोर्डेह अवेस्ता (Khordeh Avesta) की सौगंध खाकर सांसद के रूप में शपथ ली. उनके इस कदम ने यह संदेश दे दिया कि वे ब्रिटिश संसद में किसी के पिछलग्गू बनकर नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी भारतीय के रूप में अपनी बात रखने आए हैं.
ड्रेन ऑफ वेल्थ थ्योरी से खोली ब्रिटिश राज की पोल
ब्रिटिश संसद के भीतर दादाभाई नौरोजी की सबसे बड़ी ऐतिहासिक देन उनका ‘धन निष्कासन का सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) था. उन्होंने अपनी किताब पोवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया में सांख्यिकीय आंकड़ों और ठोस सबूतों के साथ यह साबित किया कि ब्रिटिश सरकार किस तरह एक स्पंज की तरह भारत की धन-संपदा को सोख रही है. उन्होंने दिखाया कि कैसे भारत के राजस्व, टैक्स और कच्चे माल का एक बहुत बड़ा हिस्सा बिना किसी प्रतिफल के लगातार ब्रिटेन भेजा जा रहा है, जिससे भारत दिन-प्रतिदिन कंगाल और ब्रिटेन अमीर होता जा रहा है. इतना ही नहीं, सांसद के रूप में दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटिश भारत के प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने के लिए संसद के भीतर लंदन में आयोजित होने वाली भारतीय सिविल सेवा (ICS) को इंग्लैंड और भारत में एक साथ (सिमल्टेनियसली) आयोजित करने की मांग की, ताकि भारतीयों को भी प्रशासनिक सेवाओं में समान अवसर मिल सके. उनके तर्कों और दबाव के आगे जून 1893 में ब्रिटिश संसद ने इस प्रस्ताव को बहुमत से पारित कर दिया.
एनीबेसेंट के साथ दादाभाई नौरोजी. साथ में महात्मा गांधी और अन्य.
महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना के राजनीतिक गुरु बने दादाभाई
दादाभाई नौरोजी केवल एक सांसद या अर्थशास्त्री नहीं थे, बल्कि वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे बड़े स्तंभ थे. उन्होंने साल 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में एओ ह्यूम और दिनशॉ वाचा के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी. वे कुल तीन बार (1886, 1893 और 1906) कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए. साल 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए उन्होंने पहली बार आधिकारिक रूप से कांग्रेस के मंच से स्वराज शब्द का उद्घोष किया था, जिसने आगे चलकर पूरे स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी. जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे, तब वे दादाभाई को पत्र लिखकर मार्गदर्शन लेते थे. वहीं, युवा बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने लंदन में दादाभाई के सचिव के रूप में काम करते हुए राजनीति के ककहरे सीखे थे. 30 जून 1917 को 91 वर्ष की आयु में दादाभाई का निधन हो गया.
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न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें
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